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नरेंद्र पंडित: तुम्हारी शंका बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन विचार करो, मृत्यु के ठीक बाद जब यह मृत देह सामने पड़ी होती है, तब सब लोग रोते हुए क्यों कहते हैं कि "वे चले गए"? चेहरा तो वहीं होता है, आँखें वहीं होती हैं, हाथ-पैर सब कुछ अपनी जगह स्थिर होता है, फिर ऐसा कौन है जो चला गया? वो जो चला गया, जो इस पिंजरे को छोड़कर मुक्त हो गया, वही इस ब्रह्मांड की परम अविनाशी ऊर्जा है, जिसे हमारे वेदान्त में 'आत्मा' कहा गया है। शरीर तो केवल एक माध्यम है जिसके द्वारा वह ऊर्जा इस संसार को अनुभव कर रही है।  जिज्ञासु: यानी जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह अंत नहीं है? लेकिन विज्ञान तो कहता है कि शरीर के खत्म होते ही सब कुछ समाप्त हो जाता है।

नरेंद्र पंडित: तुम्हारी शंका बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन विचार करो, मृत्यु के ठीक बाद जब यह मृत देह सामने पड़ी होती है, तब सब लोग रोते हुए क्यों कहते हैं कि "वे चले गए"? चेहरा तो वहीं होता है, आँखें वहीं होती हैं, हाथ-पैर सब कुछ अपनी जगह स्थिर होता है, फिर ऐसा कौन है जो चला गया? वो जो चला गया, जो इस पिंजरे को छोड़कर मुक्त हो गया, वही इस ब्रह्मांड की परम अविनाशी ऊर्जा है, जिसे हमारे वेदान्त में 'आत्मा' कहा गया है। शरीर तो केवल एक माध्यम है जिसके द्वारा वह ऊर्जा इस संसार को अनुभव कर रही है। जिज्ञासु: यानी जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह अंत नहीं है? लेकिन विज्ञान तो कहता है कि शरीर के खत्म होते ही सब कुछ समाप्त हो जाता है।

  अध्याय १ : आत्मा का मूल स्वरूप — तुम यह नश्वर शरीर नहीं हो नरेंद्र पंडित : जब हम सुबह उठकर दर्पण के सामने खड़े होत...
- सितंबर 04, 2026
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