युगों का तराजू आ रही है

 

⚖️ युगों का तराजू — क्या सच में न्याय कभी बराबर हुआ?

एक ऐसा समय था…

जब ऊँची इमारतें नहीं थीं, अदालतों की लंबी कतारें नहीं थीं और कानून की मोटी किताबें नहीं थीं। न्याय चौपाल में बैठता था… और फैसला कुछ लोगों की जुबान से निकलता था।

लेकिन क्या उस समय अन्याय नहीं था?

था…

और शायद यहीं से शुरू होती है “युगों का तराजू” की महागाथा।

एक बेटी—सुप्रिया

एक पिता—भानुप्रताप

और उनके सामने खड़ी एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ अपराधी ताकत और रसूख के सहारे बच निकलता है, जबकि पीड़ित परिवार को ही समाज से बाहर कर दिया जाता है।

सुप्रिया के साथ अन्याय हुआ।

उसके पिता ने न्याय की गुहार लगाई।

पहले चौपाल में…

फिर राजा के दरबार में…

लेकिन हर दरवाजे के पीछे उन्हें एक नई दीवार मिली।

पंचायत ने फैसला सुनाया।

राजदरबार ने उनकी पुकार नहीं सुनी।

और जिस समाज से उन्हें न्याय की उम्मीद थी, उसी समाज ने उन्हें दोषी की तरह देखने लगा।

लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं होती…

क्योंकि एक पीड़ित की खामोशी हमेशा खामोशी नहीं रहती।

कभी-कभी वही खामोशी आने वाले युगों की सबसे बड़ी आवाज बन जाती है।

सुप्रिया की आँखों में आँसू थे…

लेकिन उन आँसुओं के पीछे एक ऐसा संकल्प जन्म ले चुका था, जो आने वाले समय को चुनौती देने वाला था।

फिर समय बदला।

चौपालों की जगह हवेलियाँ आईं।

राजाओं और सामंतों का दौर आया।

तलवारें सत्ता की भाषा बनने लगीं।

और उसी अंधेरे में एक नई आवाज उठी—रेश्मा

गढ़ मदनपुर के ठाकुर भवानी सिंह की सत्ता के सामने खड़ी यह आवाज केवल एक व्यक्ति के खिलाफ विद्रोह नहीं थी…

यह उस व्यवस्था के खिलाफ चुनौती थी, जिसमें न्याय ताकतवर की इच्छा पर निर्भर था।

युग बदलता गया…

लेकिन सवाल वही रहा—

न्याय का तराजू आखिर किसके हाथ में है?

क्या वह सच में बराबर तौला जाता है?

या हर युग में कोई न कोई ताकतवर हाथ उसकी एक पलड़े को नीचे दबा देता है?

“युगों का तराजू” केवल अतीत की कहानी नहीं है।

यह सत्ता, समाज, अपराध, न्याय, भय, प्रतिरोध और इंसानी संघर्ष की एक ऐसी महागाथा है, जो अलग-अलग युगों को एक ही सवाल के धागे से जोड़ती है।

एक युग में चौपाल…

दूसरे में हवेली और दरबार…

और आगे आने वाले समय में न्याय की नई व्यवस्थाएँ…

चेहरे बदलेंगे।

सत्ताएँ बदलेंगी।

व्यवस्थाएँ बदलेंगी।

लेकिन क्या इंसान की सोच भी बदलेगी?

यही रहस्य इस महागाथा के साथ आगे बढ़ेगा।

और शायद जब आखिरी पन्ना पलटेगा…

तो सवाल कहानी का नहीं रहेगा।

सवाल हमारा होगा।

⚖️ “युगों का तराजू”
एक महाकाव्य उपन्यास
✍️ लेखक — नरेन्द्र पंचारिया

यह कहानी अभी अपनी यात्रा पर है…

और तराजू अभी पूरी तरह संतुलित नहीं हुआ है।


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