पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र (Purvashadha Nakshatra) | Aprajit Sankalp, Jal Dev & Shukra Rahasya | Nakshatra Purana Sanhita

नक्षत्र पुराण संहिता

अध्याय २०: पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र

अपराजित संकल्प और जल देव की दिव्य चेतना

Purva Ashadha Nakshatra | पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र
१. नक्षत्र का मूल परिचय
राशि चक्र में स्थिति:
धनु राशि (१३° २०' से २६° ४०' तक)।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
शुक्र (कला, सौंदर्य, भौतिक सुख, और संजीवनी विद्या का स्वामी)।
अधिष्ठाता देव:
आपः (Apah - जल के देवता, साक्षात् शुद्धि, शीतलता, और ब्रह्मांडीय प्रवाह के देव)।
तत्व:
जल/अग्नि संरेखण (धनु राशि की अग्नि में शुक्र का जल - अत्यधिक गतिशील, कलात्मक, और ऊर्ध्वगामी)।
वर्ण:
ब्राह्मण (ज्ञान, औषधीय विद्या, और रस-सिद्धि का सूचक)।
प्रतीक चिह्न:
सूप या सूपड़ा (Winnowing Basket - जिससे अनाज साफ किया जाता है), या हाथी का दांत।
शारीरिक अंग चेतना:
जांघें, कूल्हे का जोड़, रक्त संचार प्रणाली (Blood Vessels), व जांघों की नसें।
२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का विंशति श्वास और अपराजित इच्छाशक्ति का उदय है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत चुंबकीय आकर्षण', 'कभी न हार मानने का संकल्प (Invincibility)', और 'संसार को शुद्ध करने की कला' जाग्रत होती है।

शुक्र और बृहस्पति का अद्भुत दार्शनिक संगम:
यह नक्षत्र पूर्ण रूप से धनु राशि (स्वामी: बृहस्पति - देवगुरु) के भीतर आता है, परन्तु इसका अपना स्वामी शुक्र (दैत्यगुरु) है। दोनों गुरुओं का यह योग जातक को अगाध बौद्धिक क्षमता, रणनीतिक चातुर्य, और समाज को प्रभावित करने की अद्भुत कला देता है। पूर्वाषाढ़ा का अर्थ है—'प्रथम अपराजिता' (वह जिसे कोई जीत न सके)।
सूपड़े (शुद्धीकरण) का सिद्धांत:
इसका प्रतीक 'सूप' है। जिस प्रकार सूपड़े से फटक कर अनाज का कचरा (भूसा) बाहर फेंक दिया जाता है और शुद्ध अन्न अंदर रह जाता है, वैसे ही पूर्वाषाढ़ा जातक अपने जीवन से बुरे लोगों, पाखंड, और नकारात्मक विचारों को फटक कर बाहर निकालने में माहिर होता है।
महत्वपूर्ण तथ्य:
ये जातक स्वभाव से बहुत स्वाभिमानी और ऊँचे लक्ष्यों वाले होते हैं। ये दिखने में बहुत शांत (जल की तरह) होते हैं, परन्तु यदि इन्हें कोई चुनौती दे, तो ये सुनामी (Tsunami) का रूप धारण कर लेते हैं। इन्हें जल से जुड़े उद्योगों (Shipping/Naval), फार्मेसी (Medicine), ललित कला, फिल्म निर्माण, अंतरराष्ट्रीय संधियों, और बड़े कानूनी मुकदमों के संचालन में सर्वोच्च सफलता मिलती है।
३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: वरुण देव के 'आपः' (दिव्य जल) तत्व का प्राकट्य व ब्रह्मांड की शुद्धि (विष्णु पुराण से)

सृष्टि के निर्माण के समय जब ब्रह्मा जी ने तत्वों का विभाजन किया, तो पाताल और अंतरिक्ष के बीच बहने वाले साक्षात् 'आपः' (जल देव) प्रकट हुए। जल ही जीवन का मूल आधार है। ब्रह्मा जी ने जल देव को प्रतिज्ञा दी कि तुम संसार के समस्त पापों, गंदगियों, और व्याधियों को अपने भीतर सोखकर जीवों को शुद्ध (Purify) करोगे। जल देव परम शक्तिशाली हैं; वे जब शांत बहते हैं तो पोषण करते हैं, और जब उग्र होते हैं तो महाप्रलय लाते हैं। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र इसी आपः देव की अखंड, अजेय और हीलिंग चेतना का साक्षात् आभामंडल है।

कथा २: देवासुर संग्राम में देवताओं की प्यास बुझाने के लिए जल देव का अवतरण (भागवत पुराण से)

एक बार असुरों ने अपनी मायावी शक्तियों से देवलोक के समस्त जल स्रोतों को सुखा दिया। देवता प्यास से तड़पने लगे और उनके कंठ सूख गए। तब देवगुरु बृहस्पति (धनु राशि के स्वामी) ने पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र की जल ऊर्जा का आह्वान किया। जल देव साक्षात् आकाशगंगा के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने देवताओं की सेना पर अमृत जल की वर्षा की, जिससे देवताओं के भीतर शुक्र का बल जाग्रत हुआ और वे पुनः युद्ध जीत गए। यह 'संकट के समय संजीवनी (राहत) देने' के पूर्वाषाढ़ा स्वभाव को दर्शाता है।

कथा ३: भगीरथ के तप से गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर प्रचंड वेग से अवतरण (रामायण से)

जब गंगा जी स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरने के लिए तैयार हुईं, तो उनका वेग इतना भयंकर (सुनामी जैसा) था कि पृथ्वी उसे संभाल नहीं सकती थी। गंगा के भीतर यह 'अपराजित वेग' साक्षात् पूर्वाषाढ़ा की ही चेतना थी। भगवान शिव ने पृथ्वी की रक्षा के लिए गंगा को अपनी जटाओं के भीतर बांध लिया (अग्नि में जल का संतुलन) और फिर शांत धारा के रूप में बाहर निकाला। यह कथा दर्शाती है कि पूर्वाषाढ़ा जातक की ऊर्जा को हमेशा एक 'गुरु' या 'शिव' के मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, अन्यथा वह विनाशकारी हो सकती है।

कथा ४: श्रीकृष्ण का यमुना नदी के भीतर कालिया नाग के 'विष-जल' को शुद्ध करना (भागवत पुराण से)

जब कालिया नाग के जहर से पूरी यमुना का जल उबल रहा था, तो श्रीकृष्ण ने उस जल के भीतर छलांग लगाई। उन्होंने कालिया के फनों को कुचलकर उसे मुक्त किया और यमुना के जल को पुनः साक्षात् 'आपः अमृत' में बदल दिया जिससे गोकुल के पशुओं और मनुष्यों को नया जीवन मिला। यह 'दूषित वातावरण को शुद्ध करने' की पूर्वाषाढ़ा क्षमता का सूचक है।

कथा ५: ऋग्वेद की 'आपो हि ष्ठा सूक्त' चेतना और औषधीय जल (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के दसवें मण्डल में आपः सूक्त का सुंदर वर्णन है: "आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन..."— अर्थात हे जल के देवताओं! तुम साक्षात् सुख के दाता हो, हमें अपनी रश्मियों से ऊर्जावान करो और हमारे भीतर के रोगों को वैसे ही धो दो जैसे माता अपने बच्चे को साफ करती है। पुूर्वाषाढ़ा जातक के भीतर यही 'औषधीय स्पर्श' (Medicinal Touch) वास करता है।

कथा ६: समुद्र मंथन से 'वरुण देव की छतरी और वरुणानी' का प्राकट्य (पद्म पुराण से)

मंथन के दौरान जब समुद्र की गहराइयों से वरुण देव की दिव्य 'अपराजिता छतरी' और जल की साक्षात् देवियाँ प्रकट हुईं, तो देवताओं ने उनका पूजन किया। उस छतरी के नीचे खड़े होने वाले राजा को कोई भी परास्त नहीं कर सकता था। यह 'अजेय भाग्य और सुरक्षा' के पूर्वाषाढ़ा नियम को सिद्ध करता है।

कथा ७: अगस्त्य ऋषि द्वारा समुद्र का आचमन (पीना) और जल देव का शांत रहना (महाभारत से)

जब कालेय असुरों को पकड़ने के लिए अगस्त्य ऋषि ने एक ही घूंट में पूरे समुद्र के जल को पी लिया, तो जल देव विचलित नहीं हुए। वे ऋषि की जठराग्नि के भीतर शांत रहे क्योंकि वे जानते थे कि यह सृष्टि के कल्याण के लिए हो रहा है। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर ऋषियों ने जल को पुनः मुक्त किया। यह 'बड़े से बड़े आघात को अपने भीतर सोख लेने' की पूर्वाषाढ़ा सहनशीलता को प्रकट करता है।

कथा ८: सती के ५१ शक्तिपीठों में माता की 'पीठ का ऊपरी भाग/धमनियां' का गिरना (कालिका पुराण से)

सुदर्शन चक्र से कटे सती के अंगों में से, माता के शरीर की रक्त संचार प्रणाली का मुख्य केंद्र (धमनियों की जड़) जिस स्थान पर गिरी, वह पूर्वाषाढ़ा शक्तिपीठ बना। वहाँ साधक तान्त्रिक 'रक्त शुद्धि' और शरीर के तरल रसों को जाग्रत करने का परम गुप्त विज्ञान सीखते हैं।

कथा ९: अर्जुन का कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में बाण मारकर 'पाताल गंगा' प्रकट करना (महाभारत से)

जब बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने जल मांगा, तो अर्जुन ने गांडीव से पृथ्वी की छाती पर एक ऐसा तीक्ष्ण बाण मारा जो सीधे पाताल की जड़ों को चीर गया। उसी क्षण भूमि से साक्षात् 'भोगवती गंगा' की ठंडी और पवित्र जलधारा फूट पड़ी जो सीधे भीष्म के मुख में गई। यह 'दुर्गम स्थानों से भी संसाधन (जल) निकाल लेने' की पूर्वाषाढ़ा कला है।

कथा १०: उपनिषदों का 'रसो वै सः' और अवचेतन का रस प्रवाह रहस्य (तैत्तिरीय उपनिषद से)

तैत्तिरीय उपनिषद का अमर वाक्य है— 'रसो वै सः' (वह परमात्मा साक्षात् रस रूप है)। उपनिषद कहते हैं कि मनुष्य के भीतर जो प्रेम, करुणा, और आनंद का तरल प्रवाह है, वह इसी रस तत्व के कारण है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र इसी ब्रह्मांडीय रस का साक्षात् केंद्र है। जातक का स्वभाव बहुत रसमय (Charming) होता है।

कथा ११: कार्तिकेय का मरुत देवों के साथ मिलकर 'समुद्र के भीतर' असुरों का संहार (स्कन्द पुराण से)

जब असुर समुद्र के नीचे छिपकर युद्ध लड़ रहे थे, तो कार्तिकेय ने जल देव की चेतना का आह्वान किया। उन्होंने अपने बाणों से समुद्र के जल को दो भागों में विभाजित कर दिया (मार्ग बनाया) और नीचे जाकर असुरों का समूल नाश किया। यह 'गहराई में छिपे शत्रुओं को भी परास्त करने' की पूर्वाषाढ़ा क्षमता है।

कथा १२: शिव का 'गङ्गाधर' रूप और प्रचंड जल वेग को जटाओं में थामना (शिव महापुराण से)

जब गंगा के अहंकार को तोड़ने के लिए शिव जी ने उन्हें अपनी जटाओं के भीतर समेट लिया, तो गंगा कई वर्षों तक शिव की जटाओं के भूलभुलैया में भटकती रहीं (जल का अग्नि में विलीन होना)। यह रूप सिखाता है कि जब तक पूर्वाषाढ़ा का शुक्र (वासना) साक्षात् शिव (ज्ञान) के नियंत्रण में नहीं आता, तब तक वह भटकता रहता है।

कथा १३: ध्रुव का राजा बनकर अपनी नगरी के चारों ओर 'जल की अभेद्य खाई' बनाना (विष्णु पुराण से)

जब ध्रुव ने अपनी राजधानी का निर्माण किया, तो उन्होंने वास्तुकला के अनुसार महल के चारों ओर एक विशाल और गहरी जल की खाई (Moat) बनवाई, जिसमें हिंसक मगरमच्छ रहते थे। उस जल-दुर्ग को कोई भी शत्रु पार नहीं कर सकता था। यह पूर्वाषाढ़ा के 'सुरक्षात्मक और अभेद्य' (Invincible) स्वभाव को प्रकट करता है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का अर्जुन के साथ मिलकर 'यमुना तट पर' खाण्डव वन दहन की योजना (श्रीमद्भागवत से)

यमुना के ठंडे तट पर बैठकर ही श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव की सहायता का कूटनीतिक व्यावहारिक समझौता (Agreement) किया था, जहाँ शुक्र (यमुना का रस) और गुरु (धनु राशि की बुद्धि) का मिलन हुआ। यहीं अर्जुन को गांडीव मिला। यह महान योजनाओं की पृष्ठभूमि का पूर्वाषाढ़ा आख्यान है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा राजा सागर के अश्वमेध घोड़े की 'समुद्र तट पर' खोज का उपदेश (रामायण से)

ऋषि वशिष्ठ ने सगर के पुत्रों को सिखाया था कि जब भी कोई बड़ी वस्तु (घोड़ा) खो जाए, तो उसे खोजने के लिए प्रकृति के सबसे बड़े विसर्जन स्थल (समुद्र) की ओर जाओ। यह 'खोई हुई ऊर्जा को गहराई में खोजने' के पूर्वाषाढ़ा स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा १६: सीता माता का रावण की लंका के चारों ओर घिरे 'अगाध समुद्र' को देखकर धैर्य (रामायण से)

अशोक वाटिका में रहते हुए सीता जी ने जब लंका के चारों ओर फैले विशाल और अभेद्य समुद्र को देखा, तो वे डरी नहीं। वे जानती थीं कि उनके पति श्रीराम के बाणों के सामने यह समुद्र भी मार्ग देने के लिए विवश हो जाएगा। यह 'बड़ी बाधाओं के सामने भी अपराजित धैर्य' का सूचक है।

कथा १७: समुद्र मंथन से 'अमृत कलश' का जल तत्वों के बीच से साक्षात् प्राकट्य (वरहा पुराण से)

मंथन के सबसे अंत में जब साक्षात् धन्वन्तरि देव नीले जल की लहरों को चीरकर स्वर्णिम अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो उस अमृत के स्पर्श से पूरी प्रकृति ऊर्जस्वित हो गई। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र इसी अमृत कलश के प्रकटीकरण की पृष्ठभूमि है—कठोर मन्थन (सूपड़े से फटकने) के बाद मिलने वाला शुद्ध अमृत।

कथा १८: राधारानी का सखियों के साथ 'यमुना में जल-क्रीड़ा' और वस्त्राभरण लीला (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

यमुना के शीतल जल में जब राधारानी और गोपियाँ जल-क्रीड़ा (कलोल) कर रही थीं, तब श्रीकृष्ण ने उनके वस्त्र चुराकर कदम के वृक्ष पर लटका दिए थे। कृष्ण ने उन्हें सिखाया कि जल देव (आपः) के सम्मुख नग्न होकर स्नान करना जल देव का अपमान है। यह मर्यादा और 'जल की पवित्रता' की पूर्वाषाढ़ा चेतना है।

कथा १९: राजा नल और दमयन्ती की कथा में नल का 'जल-विहीन मरुभूमि' में भटकाव (महाभारत से)

जब नल कलि के प्रभाव में दमयन्ती को छोड़कर चले गए, तो वे एक ऐसी मरुभूमि में पहुँचे जहाँ दूर-दूर तक जल नहीं था। उस तीव्र प्यास (शुक्र की तड़प) के क्षण में उन्होंने अपने भीतर के 'धनु-बृहस्पति' (धैर्य) को जाग्रत किया जिससे उन्हें कर्कोटक नाग मिले। यह 'कठोरतम मरुभूमि में भी जीवन की खोज' को दर्शाता है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का 'निरंजना नदी के जल' में भिक्षु का कटोरा प्रवाहित करना (बौद्ध इतिहास से)

सुजाता के हाथों खीर खाने के बाद, सिद्धार्थ निरंजना नदी के तट पर गए। उन्होंने अपना मिट्टी का कटोरा नदी के जल में प्रवाहित करते हुए प्रतिज्ञा की, "यदि मुझे आज परम ज्ञान मिलना निश्चित है, तो यह कटोरा नदी के प्रवाह के विपरीत (Ulti Dhara) बहे।" कटोरा पानी के उल्टे प्रवाह में तैरने लगा। यह 'प्रकृति के नियमों को भी मोड़ने वाले अपराजित संकल्प' की पूर्वाषाढ़ा शक्ति है।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा अन्न की शुद्धि के लिए 'सूपड़ा' (Winnowing) तकनीक का निर्माण (शतपथ ब्राह्मण से)

ब्रह्मा जी ने जब देखा कि मनुष्य गेंहू और धान के साथ कंकड़ और भूसा भी खा रहे हैं, तो उन्होंने 'सूपड़े' का निर्माण किया, जो हवा और घर्षण के बल पर कचरे को दूर करता है। उन्होंने पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र को इसका प्रतीक बनाया ताकि जातक समाज से पाखंड (कचरा) को फटक कर अलग कर सके।

कथा २२: समुद्र मंथन से 'वरुणानी' (जल की देवी) का देवसभा में वरण (विष्णु पुराण से)

मंथन से जब जल की परम सुंदर और सम्मोहक देवी 'वरुणानी' प्रकट हुईं, तो उनके हाथों में रत्नों का कलश था। शुक्र देव (पूर्वाषाढ़ा के स्वामी) ने उनकी कलाओं को निखारा जिससे वे देवराज इन्द्र की सभा की मुख्य सलाहकार बनीं। यह कूटनीतिक और व्यापारिक 'तरल बुद्धि' (Fluid Intelligence) को दर्शाता है।

कथा २३: गुरु द्रोणाचार्य द्वारा पाण्डवों को 'जल-स्तम्भन' (Water Freezing) अस्त्र सिखाना (महाभारत से)

द्रोणाचार्य ने अर्जुन और दुर्योधन दोनों को एक ऐसा अस्त्र सिखाया था जिससे बहते हुए पानी को पल भर में बर्फ की तरह कड़ा (स्तम्भित) किया जा सकता था। दुर्योधन ने इसी विद्या का प्रयोग महाभारत के अंत में द्वैपायन सरोवर के नीचे छिपने के लिए किया था। यह जल पर 'नियंत्रण' की पूर्वाषाढ़ा चेतना है।

कथा २४: भीम का कुरुक्षेत्र के युद्ध में दुर्योधन को द्वैपायन सरोवर से बाहर निकलने की चुनौती (महाभारत से)

जब दुर्योधन पानी के नीचे छिपा था, तो युधिष्ठिर ने उससे कहा, "दुर्योधन! पानी के भीतर छिपना कायरों का काम है। बाहर आओ और क्षत्रिय की तरह लड़ो।" दुर्योधन पानी को चीरता हुआ गदा लेकर बाहर आया (जल से अग्नि का विस्फोट)। यह पूर्वाषाढ़ा के 'अपराजित स्वाभिमान' को सिद्ध करता है।

कथा २५: सूफी मत का 'तहारत' (आंतरिक और बाहरी शुद्धि) और उपनिषदों का रस चेतना सूत्र (माण्डूक्योपनिषद से)

माण्डूक्य उपनिषद का सूत्र कहता है कि आत्मा साक्षात् शांति और करुणा का रस है। सूफी मत में 'तहारत' का अर्थ है वज़ू (जल से शुद्धि) करना, जो केवल शरीर को नहीं बल्कि रूह के गुनाहों को भी धो देता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र इसी तहारत और अन्न-रस का साक्षात् द्वार है।

कथा २१: सूपड़े से फटकने पर भूसे का हवा में उड़ना और शुद्ध दाने का नीचे बैठना (श्रम-आचार मत)

एक कुशल किसान जब सूपड़े में अनाज लेकर हवा के सामने फटकता है, तो हल्का भूसा (झूठ/दिखावा) हवा में उड़कर दूर गिरता है, और भारी व शुद्ध गेंहू का दाना (सत्य) सीधे नीचे बैठ जाता है। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'जीवन के झटके तुम्हारे भीतर के झूठ को उड़ाने और सत्य को निखारने आते हैं'।

कथा २७: जल देव 'आपः' का परम महा-शुक्र चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, शुद्धि और प्रवाह के देवता आपः ब्रह्मांड के समस्त सागरों, रसों, और सूपड़ों के रहस्यों को समेटकर साक्षात् 'परम महा-शुक्र शून्य' (अनंत रसमय शून्यता) में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई प्रवाह बचता है, न कोई सुनामी। केवल एक अखंड, शांत आनंद शेष रहता है। यह पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ओम् अपामुदमनसयुग्व्वयसङ्गं सूर्य्येण व्वर्चसा। समञ्जायन्ता तं प्रत्नथा यं वेधस्वतः अपः अधिपतिं नमो नमः॥

पौराणिक मन्त्र

ओम् पूर्वाषाढ़ाधिपतिं आपः देवं जलस्वरूपिणम्। शुद्धि-अपराजेय-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं संजीवनीस्वरूपिणम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ओम् धुं पूर्वाषाढ़ानक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् शुं शुक्राय नमः॥

विधि

पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र वाले दिन शुक्रवार (या धनु-शुक्र के शुभ गोचर में) सुबह के समय किसी पवित्र नदी या घर में ही जल में थोड़ा सा गंगाजल और सफेद चंदन मिलाकर स्नान करें। सफेद रेशमी वस्त्र धारण कर माता लक्ष्मी या जल देव का ध्यान करें। स्फटिक की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें। जाप के बाद किसी प्याऊ (Water Booth) में मिट्टी का घड़ा दान करें या पक्षियों के लिए पानी के सकोरे रखें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले
(नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

अहंकार और अति-स्वाभिमान को फटकें

Winnow the Ego: सूपड़े के प्रतीक के कारण आपके भीतर 'मैं सर्वोपरि हूँ और कोई मुझे हरा नहीं सकता' का एक स्वाभाविक अति-स्वाभिमान (Pride) आ जाता है, जिससे आप अपने गुरुओं या पार्टनर्स की सही सलाह को भी लात मार देते हैं। जीवन बदलने का सूत्र है— "सूपड़े की तरह बनें; अपने भीतर के अहंकार के भूसे को उड़ा दें और ज्ञान के भारी दाने को स्वीकार करें।"

भावनात्मक सुनामी पर नियंत्रण

Control the Emotional Tsunami: जल तत्व के स्वामी होने के कारण जब आपको कोई धोखा देता है या आपकी उपेक्षा करता है, तो आपके भीतर प्रचंड अवसाद या क्रोध की सुनामी उठती है जो आपके ही बने-बनाए करियर को बहा ले जाती है। अपने भीतर के 'धनु-बृहस्पति' (धैर्य और प्राणायाम) से इस वेग को शांत रखें।

संबंधों में स्वार्थ का त्याग

शुक्र स्वामी है और धनु राशि है; आप बहुत जल्दी लोगों को आध्यात्मिक या व्यापारिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं और काम निकलते ही दूर हो जाते हैं। निस्वार्थ सेवा भाव लाएं।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना
नक्षत्र बनने का इतिहास:
जब जल देव आपः ने देवासुर संग्राम में देवताओं की प्यास बुझाकर उन्हें 'अपराजित' (Invincible) होने का वरदान दिया और भगीरथ के तप से गंगा का वेग पृथ्वी पर शांत हुआ, तब ब्रह्मा जी ने धनु राशि के उत्तर भाग में, जहाँ ज्ञान अपनी चरम सीमा पर होता है, 'पूर्वाषाढ़ा' (चमकता हुआ धनुषाकार दो तारों का समूह/Kaus Australis-Epsilon Sagittarii) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार जल देव तथा शुक्र को सौंपा।

अअचूक उपाय

१. नक्षत्र वनस्पति उपाय

इसका पूज्य वृक्ष 'जलवेतस' (Willow/बेंत या 'जामुन') का वृक्ष है जो जल के किनारे उगता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के दिन जामुन या बेंत के पौधे की जड़ में कच्चा दूध और जल अर्पित करें। शुक्रवार को इसके वृक्ष के पास बैठकर मन्त्र जप करना कुंडली के शुक्र जनित सारे दोषों (जैसे शुक्र का मंदा फल या वैवाहिक विलम्ब) को तत्काल दूर कर देता है।

२. सूपड़ा शुद्धि महा-उपाय

इस नक्षत्र के दिन एक नया मिट्टी का सूपड़ा या तांबे का छोटा सूपड़ा लेकर उसमें थोड़े से गेंहू, हल्दी की गांठ और मिश्री रखकर किसी सुहागिन स्त्री या मंदिर के पुजारी को दान कर दें। यह आपके जीवन की सारी दरिद्रता (अलक्ष्मी तत्व) को फटक कर बाहर निकाल देगा।

३. जल सेवा महा-उपाय

हर शुक्रवार या पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के दिन किसी प्याऊ, गौशाला या सार्वजनिक स्थान पर पीने के पानी की व्यवस्था करना (जैसे वाटर कूलर लगवाना या पानी पिलाना) आपके जीवन के बड़े से बड़े राजकीय दण्ड, टैक्स की रेड, या अचानक आए दिवालियेपन को एक क्षण में राजयोग में बदल देता है।

॥ श्री नरेन्द्रम नक्षत्र पुराण संहिता - भाग ६ ॥

(अध्याय १८ से २०) : सम्पूर्णतः समाप्तः

॥ ओम् तत्सत् ॥
॥ ओम् अपराजिताय नमः ॥
॥ शुभं भवतु ॥

✦ लेखक: नरेन्द्र पंचारिया ✦
सीख:

"चरम विजय अस्त्रों के बल पर नहीं, बल्कि समष्टि चेतना और धर्म के अखंड अनुशासन से ही सिद्ध होती है।"

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