RBSE Class 8 History Chapter 6 Notes & Model Paper 2027: देशी जनता को सभ्य बनाना राष्ट्र को शिक्षित करना

 


RBSE कक्षा 8 • इतिहास (हमारे अतीत - III)

अध्याय 6: देशी जनता को सभ्य बनाना, राष्ट्र को शिक्षित करना

ब्रिटिश शिक्षा नीति, प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद, गांधीजी व टैगोर के शैक्षिक विचार एवं बोर्ड परीक्षा 2027 मॉडल पेपर

नोट: यह अध्ययन सामग्री राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (RSCERT / RBSE) के नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुरूप तैयार की गई है। यह स्कूल परीक्षाओं एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की आधारभूत तैयारी हेतु उपयोगी है।

1. प्रस्तावना: औपनिवेशिक शासन और शिक्षा नीति

अंग्रेजों का उद्देश्य केवल भारत के भू-भाग पर अधिकार करना और राजस्व वसूलना ही नहीं था; उनका मानना था कि उनका एक सांस्कृतिक मिशन भी है। वे भारतीय समाज को 'सभ्य' बनाना चाहते थे और उनके रीति-रिवाजों, मूल्यों तथा सोच में बदलाव लाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने शिक्षा को एक प्रमुख साधन बनाया। इस अध्याय में हम अध्ययन करेंगे कि ब्रिटिश शासन ने भारत में किस प्रकार की शिक्षा नीति लागू की और प्रमुख भारतीय विचारकों ने इस पर क्या दृष्टिकोण अपनाया।

2. प्राच्यवादी बनाम आंग्लवादी विवाद

अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश अधिकारियों के बीच शिक्षा के माध्यम और पाठ्यक्रम को लेकर दो प्रमुख विचारधाराएँ सामने आईं:

दृष्टिकोण प्रमुख समर्थक मुख्य विचार / कार्य
प्राच्यवादी (Orientalists) विलियम जोन्स, हेनरी थॉमस कोलब्रुक, नथानिएल हल्हेड प्राचीन भारतीय भाषाओं (संस्कृत, फारसी) और साहित्य का संवर्धन। 1781 में कलकत्ता मदरसा एवं 1791 में बनारस हिंदू कॉलेज की स्थापना।
आंग्लवादी (Anglicists) जेम्स मिल, थॉमस बैबिंगटन मैकाले पूर्वी ज्ञान को अवैज्ञानिक और त्रुटिपूर्ण माना। पश्चिमी विज्ञान, दर्शन और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा पर बल।
  • मैकाले का मिनट (1835): लॉर्ड मैकाले का प्रसिद्ध कथन था कि "एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय का केवल एक शेल्फ भारत और अरब के समूचे देशी साहित्य के बराबर है।"
  • अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835): मैकाले के प्रस्ताव पर यह अधिनियम पारित किया गया, जिसके द्वारा उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी तय किया गया और प्राच्य संस्थानों को मिलने वाले सरकारी अनुदान में कटौती की गई।

3. 1854 का वुड का डिस्पैच (Wood's Despatch)

1854 में ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ कंट्रोल के अध्यक्ष चार्ल्स वुड द्वारा भारत में शिक्षा सुधार हेतु एक व्यापक नीतिगत पत्र भेजा गया, जिसे 'भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा' कहा जाता है।

  • व्यावहारिक लाभ: इसका मुख्य तर्क यह था कि यूरोपीय शिक्षा से भारतीयों में व्यापार, वाणिज्य और ब्रिटिश जीवनशैली के प्रति रुचि पैदा होगी और ब्रिटिश शासन के लिए निष्ठावान कर्मचारी मिलेंगे।
  • विश्वविद्यालयों की स्थापना: इसके तहत 1857 में कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालयों की नींव रखी गई।
  • प्रशासनिक नियंत्रण: प्रांतीय स्तरों पर सरकारी शिक्षा विभागों की स्थापना की गई तथा प्राथमिक से लेकर उच्च स्तर तक शिक्षा के निरीक्षण की व्यवस्था की गई।

4. स्थानीय पाठशालाएँ और विलियम एडम की रिपोर्ट

1830 के दशक में स्कॉटिश प्रचारक विलियम एडम ने बंगाल और बिहार के जिलों में स्थानीय देसी शिक्षा प्रणाली पर एक विस्तृत सर्वेक्षण किया:

  • लचीली व्यवस्था: इन पाठशालाओं में कोई निश्चित इमारत, मुद्रित पुस्तकें, निश्चित समय-सारणी, हाजिरी रजिस्टर या वार्षिक परीक्षा प्रणाली नहीं होती थी। कक्षाएँ सामान्यतः बरगद के पेड़ के नीचे या गाँव के मंदिर/धनी व्यक्ति के परिसर में संचालित होती थीं।
  • व्यावहारिक शिक्षा: बच्चों की फीस माता-पिता की आर्थिक क्षमता पर निर्भर थी। फसलों की कटाई के समय पाठशालाएँ बंद रहती थीं ताकि ग्रामीण बच्चे खेतों में काम में हाथ बँटा सकें।
  • कंपनी द्वारा कड़े नियम: 1854 के बाद अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेने के लिए सरकारी पंडित (इंस्पेक्टर) नियुक्त किए, नियमित पाठ्यपुस्तकें और वार्षिक परीक्षाएँ अनिवार्य कीं। नियमों की अवहेलना करने वाली स्वतंत्र पाठशालाओं की सरकारी आर्थिक सहायता बंद कर दी गई।

5. राष्ट्रीय शिक्षा पर भारतीय विचारकों का दृष्टिकोण

ब्रिटिश शिक्षा के प्रसार के समानांतर भारतीय विचारकों ने एक ऐसी वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली की वकालत की जो राष्ट्रीय चेतना और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे:

(क) महात्मा गांधी: बुनियादी शिक्षा (नई तालीम)

  • गांधीजी का मानना था कि औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के मस्तिष्क में गुलामी और हीन भावना उत्पन्न की है और उन्हें अपनी ही संस्कृति व परिवेश में अजनबी बना दिया है।
  • उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया।
  • वे केवल साक्षरता (पढ़ने-लिखने) के बजाय दस्तकारी (हस्तकला) और व्यावहारिक कार्य सीखने के पक्षधर थे, ताकि छात्रों के मस्तिष्क, हाथ और आत्मा का सर्वांगीण विकास हो सके और वे स्वावलंबी बनें।

(ख) रवींद्रनाथ टैगोर: शांतिनिकेतन (1901)

  • टैगोर बचपन में स्कूल की चारदीवारी और दमनकारी अनुशासन से व्यथित रहे थे। उनका विचार था कि शिक्षा प्राकृतिक परिवेश में रचनात्मक और आनंदमयी होनी चाहिए।
  • उन्होंने 1901 में कलकत्ता से लगभग 100 किमी दूर ग्रामीण परिवेश में शांतिनिकेतन की स्थापना की।
  • टैगोर ने भारतीय परंपरा के सर्वश्रेष्ठ तत्वों के साथ आधुनिक पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के समन्वय पर बल दिया। शांतिनिकेतन में कला, संगीत और नृत्य के साथ विज्ञान की शिक्षा दी जाने लगी।

RBSE कक्षा 8 बोर्ड परीक्षा - 2027

विषय: सामाजिक विज्ञान (इतिहास) • मॉडल प्रश्न पत्र

अध्याय 6: देशी जनता को सभ्य बनाना राष्ट्र को शिक्षित करना | पूर्णांक: 25 | समय: 45 मिनट

खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)

  1. कलकत्ता में मदरसे की स्थापना किस वर्ष की गई थी?
    (अ) 1781 ई.    (ब) 1791 ई.    (स) 1835 ई.    (द) 1854 ई.
    उत्तर: (अ) 1781 ई.
  2. 'वुड का डिस्पैच' (Wood's Despatch) किस वर्ष जारी किया गया था?
    (अ) 1835 ई.    (ब) 1854 ई.    (स) 1901 ई.    (द) 1813 ई.
    उत्तर: (ब) 1854 ई.
  3. रवींद्रनाथ टैगोर ने 'शांतिनिकेतन' की स्थापना किस वर्ष की थी?
    (अ) 1854 ई.    (ब) 1895 ई.    (स) 1901 ई.    (द) 1920 ई.
    उत्तर: (स) 1901 ई.
  4. अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम किस वर्ष पारित किया गया था?
    (अ) 1781 ई.    (ब) 1835 ई.    (स) 1854 ई.    (द) 1857 ई.
    उत्तर: (ब) 1835 ई.

खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)

प्र.5 विलियम जोन्स किस प्रकार के विद्वान थे और वे किन भाषाओं का अध्ययन करते थे?
उत्तर: विलियम जोन्स एक प्राच्यवादी (Orientalist) और भाषाविद थे, जो संस्कृत, फारसी और प्राचीन न्यायशास्त्र का गहन अध्ययन करते थे।

प्र.6 लॉर्ड मैकाले के अनुसार भारत और अरब का संपूर्ण साहित्य किसके बराबर था?
उत्तर: यूरोप के किसी एक अच्छे पुस्तकालय की केवल एक शेल्फ (अलमारी) के बराबर।

प्र.7 विलियम एडम ने 1830 के दशक में बंगाल और बिहार में किसका दौरा किया था?
उत्तर: स्थानीय पारंपरिक देशी पाठशालाओं का।

प्र.8 महात्मा गांधी औपनिवेशिक अंग्रेजी शिक्षा के विरोधी क्यों थे?
उत्तर: क्योंकि उनका मानना था कि इस शिक्षा ने भारतीयों में हीनता की भावना भर दी है और उन्हें अपनी ही संस्कृति व जड़ों से काट दिया है।

खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 3 अंक)

प्र.9 'प्राच्यवादी' (Orientalists) और 'आंग्लवादी' (Anglicists) विचारकों के मध्य क्या मुख्य अंतर था?
उत्तर:
1. प्राच्यवादी: भारतीय संस्कृति, दर्शन, संस्कृत व फारसी साहित्य का सम्मान करते थे और मानते थे कि भारतीयों को उनकी पारंपरिक विद्याओं के माध्यम से शिक्षित किया जाए।
2. आंग्लवादी: पूर्वी साहित्य को अतार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि से हीन मानते थे। उनका मत था कि अंग्रेजी माध्यम से पश्चिमी विज्ञान और दर्शन की आधुनिक शिक्षा दी जानी चाहिए।

प्र.10 'वुड का डिस्पैच' (1854) की प्रमुख सिफारिशें क्या थीं?
उत्तर:
1. भारत में उच्च शिक्षा के प्रसार हेतु कलकत्ता, बंबई और मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना करना।
2. प्रत्येक प्रांत में सुव्यवस्थित सरकारी शिक्षा विभाग का गठन करना।
3. प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयी स्तर तक व्यवस्थित निरीक्षण प्रणाली एवं अनुदान व्यवस्था लागू करना।

प्र.11 अंग्रेजों के आने से पूर्व भारत की पारंपरिक पाठशालाओं की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
1. लचीलापन: कोई निश्चित समय-सारणी, हाजिरी रजिस्टर या पक्का भवन नहीं होता था; कक्षाएँ पेड़ों के नीचे या बरामदों में लगती थीं।
2. अनुकूल व्यवस्था: वार्षिक परीक्षाओं का अभाव था और फसलों की कटाई के समय पाठशालाएँ स्वतः बंद हो जाती थीं।
3. परिवर्तनशील शुल्क: विद्यार्थियों से कोई निश्चित मासिक शुल्क नहीं लिया जाता था, बल्कि सामर्थ्य अनुसार गुरु दक्षिणा दी जाती थी।

खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 4 अंक)

प्र.12 शिक्षा के संदर्भ में महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
समानताएँ: दोनों महापुरुष ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली के कड़े आलोचक थे। दोनों मातृभाषा में शिक्षा तथा प्रकृति और समाज से जुड़े व्यावहारिक ज्ञान के समर्थक थे।
भिन्नताएँ:
• गांधीजी: मशीनी सभ्यता और पश्चिमी ज्ञान के आलोचक थे। उनका बल हस्तकला, शारीरिक श्रम और स्वावलंबन पर था, ताकि विद्यार्थी स्वावलंबी बन सके।
• टैगोर: आधुनिक पश्चिमी विज्ञान और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के समन्वय के पक्षधर थे। उन्होंने शांतिनिकेतन में प्राकृतिक वातावरण के बीच कला, संगीत और विज्ञान के रचनात्मक संगम को प्राथमिकता दी।

प्र.13 ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के लागू होने से भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
1. शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय: अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीय बाबू, वकील, डॉक्टर और शिक्षक बनकर सामने आए, जिन्होंने आधुनिक प्रशासनिक तंत्र में स्थान बनाया।
2. पारंपरिक शिक्षा का पतन: सरकारी संरक्षण न मिलने से सैकड़ों स्थानीय पाठशालाएँ और पारंपरिक ज्ञान व्यवस्थाएँ समाप्त हो गईं।
3. सांस्कृतिक द्वंद्व: समाज में एक ऐसा वर्ग बना जो अंग्रेजी रहन-सहन और पश्चिमी विचारों को अपनी संस्कृति से श्रेष्ठ मानने लगा।
4. राष्ट्रीय जागरण में योगदान: अंग्रेजी भाषा के माध्यम से विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के नेता आपस में जुड़े और पश्चिमी लोकतंत्र, समानता व स्वतंत्रता के सिद्धांतों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को बौद्धिक आधार प्रदान किया।

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