RBSE कक्षा 8सामाजिक विज्ञान (इतिहास )अध्याय 3: ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना — स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, नील विद्रोह व मॉडल पेपर 2027
इतिहास (हमारे अतीत - III) | अध्याय 3: ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना
(ब्रिटिश भू-राजस्व व्यवस्थाएँ, नकदी फसलें, नील विद्रोह एवं बोर्ड परीक्षा 2027 मॉडल पेपर)
1. दीवानी प्राप्ति (1765) एवं कंपनी की राजस्व आवश्यकता
1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की 'दीवानी' (भू-राजस्व वसूलने का संप्रभु अधिकार) प्राप्त हुई। इसके साथ ही कंपनी मात्र व्यापारी से सीधे बंगाल की मुख्य वित्तीय शासक बन गई।
💰 कंपनी के वित्तीय तंत्र में युगांतरकारी बदलाव:
दीवानी मिलने से पूर्व कंपनी ब्रिटेन से सोना और चांदी लाकर भारत से माल खरीदती थी। परंतु 1765 के उपरांत, भारत के ही किसानों से वसूले गए लगान (राजस्व) से सेना का खर्च, प्रशासनिक व्यय और यूरोप हेतु व्यापारिक वस्तुएं क्रय की जाने लगीं। भारतीय धन से ही भारत पर शिकंजा कस दिया गया।
2. अंग्रेजों की प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्थाएँ
| व्यवस्था | प्रवर्तक / वर्ष | क्षेत्र | मुख्य नियम व प्रभाव |
|---|---|---|---|
| स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) |
लॉर्ड कॉर्नवालिस (1793 ई.) |
बंगाल, बिहार, उड़ीसा | राजाओं-तालुकदारों को 'जमींदार' माना गया। लगान की राशि सदैव के लिए निश्चित (स्थाई) कर दी गई। लगान न देने पर जमींदारी नीलाम हो जाती थी। |
| महालवाड़ी व्यवस्था (Mahalwari Settlement) |
हार्ट मैकेंजी (1822 ई.) |
उत्तर-पश्चिमी प्रांत (UP, पंजाब) | 'महाल' का अर्थ गाँव या गाँव-समूह था। कर व्यक्तिगत किसान के बजाय पूरे महाल पर निर्धारित था, जिसे गाँव का मुखिया एकत्र करता था। |
| रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari Settlement) |
थॉमस मुनरो (19वीं सदी) |
दक्षिण भारत (मद्रास, बंबई) | 'रैयत' का अर्थ किसान था। बीच में कोई जमींदार नहीं था; सीधे किसानों से उच्च दर पर भू-राजस्व वसूला जाता था। |
3. व्यापारिक फसलें एवं नील की खेती का संकट
ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के कारण वहाँ के कपड़ा कारखानों को सूती वस्त्रों की रंगाई हेतु गहरे नीले रंग (इंडिगो) की भारी आवश्यकता थी। साथ ही चीन से चाय व्यापार के संतुलन हेतु भारत में अफीम (Opium) की जबरन खेती करवाई गई।
1. निज खेती (Nij Cultivation):
बागान मालिक अपनी या पट्टे पर ली गई भूमि पर सीधे हल-बैलों व श्रमिकों की सहायता से नील बोते थे। परंतु बड़े भूखंडों, हलों और समय पर श्रमिकों की अनुपलब्धता के कारण यह पद्धति सीमित रही।
2. रैयती खेती (Ryoti Cultivation):
बागान मालिक किसानों से अग्रिम ऋण (ददनी) देकर अनुबंध (सट्टा) लिखवाते थे। किसान अपनी सबसे उपजाऊ भूमि के 25% भाग पर नील बोने को बाध्य थे। नील की गहरी जड़ें मिट्टी की उर्वरता नष्ट कर देती थीं, जिससे बाद में उस पर धान उगाना संभव नहीं रहता था।
⚔️ नील विद्रोह (मार्च 1859) एवं नील आयोग:
लगातार कर्ज के जाल और बागान मालिकों के लठियतों (लाठीधारियों) के अत्याचारों से त्रस्त होकर मार्च 1859 में बंगाल के किसानों ने नील बोने से इनकार कर दिया और कारखानों पर धावा बोल दिया। इस व्यापक जन-प्रतिरोध के आगे झुकते हुए ब्रिटिश सरकार ने 'नील आयोग' (Indigo Commission) गठित किया। आयोग ने बागान मालिकों को दोषी माना और किसानों को वर्तमान अनुबंध पूरा कर भविष्य में नील की खेती न करने का वैधानिक अधिकार दिया।
मॉडल प्रश्न पत्र: अध्याय 3 (ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना)
पूर्णांक: 25 अंक | समय: 45 मिनट
खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रत्येक 1 अंक)
प्र.1 ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की 'दीवानी' किस वर्ष प्राप्त हुई थी?
(अ) 1757 ई. (ब) 1764 ई. (स) 1765 ई. (द) 1793 ई.
उत्तर: (स) 1765 ई.
प्र.2 बंगाल में 'स्थायी बंदोबस्त' किस गवर्नर-जनरल द्वारा लागू किया गया था?
(अ) लॉर्ड कॉर्नवालिस (ब) लॉर्ड वेलेजली (स) लॉर्ड डलहौजी (द) वारेन हेस्टिंग्स
उत्तर: (अ) लॉर्ड कॉर्नवालिस
प्र.3 'रैयतवाड़ी व्यवस्था' मुख्य रूप से भारत के किस हिस्से में लागू की गई थी?
(अ) उत्तर भारत (ब) दक्षिण भारत (स) पूर्वी भारत (द) उत्तर-पश्चिमी प्रांत
उत्तर: (ब) दक्षिण भारत
प्र.4 बंगाल के किसानों ने प्रसिद्ध 'नील विद्रोह' किस वर्ष किया था?
(अ) 1857 ई. (ब) 1859 ई. (स) 1860 ई. (द) 1793 ई.
उत्तर: (ब) 1859 ई.
खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक 1 अंक)
प्र.5 'दीवानी' मिलने से ईस्ट इंडिया कंपनी को क्या मुख्य अधिकार मिला?
उत्तर: बंगाल, बिहार और उड़ीसा के विशाल भू-राजस्व को वसूलने और वित्तीय प्रशासन का पूर्ण संप्रभु अधिकार।
प्र.6 महालवाड़ी व्यवस्था में 'महाल' शब्द से क्या आशय है?
उत्तर: ब्रिटिश राजस्व शब्दावली में 'महाल' का अर्थ एक गाँव अथवा गाँवों का समूह होता था।
प्र.7 थॉमस मुनरो द्वारा दक्षिण भारत में कौन-सी राजस्व व्यवस्था विकसित की गई?
उत्तर: रैयतवाड़ी व्यवस्था (Ryotwari Settlement)।
प्र.8 नील की खेती से कृषि भूमि पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था?
उत्तर: नील की गहरी जड़ें मिट्टी के समस्त पोषक तत्व सोख लेती थीं, जिससे भूमि बंजर हो जाती थी और उस पर धान की खेती असंभव हो जाती थी।
खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक 3 अंक)
प्र.9 'स्थायी बंदोबस्त' (Permanent Settlement) क्या था और इसकी मुख्य समस्या क्या थी?
उत्तर: 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा लागू इस व्यवस्था में जमींदारों के लिए कंपनी को देय लगान की राशि सदैव के लिए निर्धारित (स्थाई) कर दी गई। समस्या: लगान की दर अत्यधिक ऊँची रखी गई थी। समय पर अदायगी न करने पर जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी, और किसानों को अपनी पारंपरिक पैतृक भूमि पर बंधुआ जैसी असुरक्षा झेलनी पड़ी।
प्र.10 'रैयतवाड़ी' और 'महालवाड़ी' व्यवस्था में मुख्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रैयतवाड़ी व्यवस्था (दक्षिण भारत) में बिना किसी मध्यस्थ या जमींदार के सीधे किसान (रैयत) से व्यक्तिगत आधार पर कर तय किया गया। जबकि महालवाड़ी व्यवस्था (उत्तर-पश्चिम भारत) में व्यक्तिगत किसान के बजाय संपूर्ण गाँव (महाल) को राजस्व की इकाई माना गया और कर वसूली का दायित्व ग्राम मुखिया को सौंपा गया।
प्र.11 नील की खेती की 'रैयती पद्धति' (Ryoti System) क्या थी?
उत्तर: इस प्रणाली में यूरोपीय बागान मालिक स्थानीय किसानों को अग्रिम धन देकर एक बाध्यकारी अनुबंध (सट्टा) करवाते थे। किसान को अपनी जोत के कम से कम 25% हिस्से पर नील उगाना अनिवार्य था। फसल पकने पर उसे अत्यंत अल्प मूल्य पर बागान मालिकों को बेचना पड़ता था, जिससे वे स्थायी ऋणग्रस्तता में उलझे रहते थे।
खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक 4 अंक)
प्र.12 मार्च 1859 के 'नील विद्रोह' के कारण एवं परिणामों का विस्तार से विश्लेषण कीजिए।
घटनाक्रम: मार्च 1859 में नदिया जिले से शुरू होकर पूरे बंगाल में किसानों ने नील न उगाने की शपथ ली और बागान कारखानों पर सुनियोजित आक्रमण किए।
परिणाम: जन-आक्रोश के भय से सरकार ने नील आयोग नियुक्त किया। आयोग ने बागान मालिकों को अनैतिक दबाव हेतु दोषी माना और रैयतों को वर्तमान अनुबंध उपरांत नील उत्पादन बंद करने की पूर्ण विधिक स्वतंत्रता प्रदान की।
प्र.13 दीवानी प्राप्ति उपरांत कंपनी ने ग्रामीण राजस्व वृद्धि हेतु क्या उपाय किए? समझाइए।
1. स्थायी बंदोबस्त (1793): बंगाल में निश्चित राजस्व वसूली हेतु जमींदारी व्यवस्था स्थापित की।
2. महालवाड़ी व रैयतवाड़ी: उत्तर और दक्षिण भारत में अधिकतम राजस्व हेतु नई क्षेत्रीय प्रणालियाँ लागू कीं।
3. जबरन वाणिज्यिक खेती: ब्रिटिश वस्त्रोद्योग हेतु नील और चीन के चाय व्यापार हेतु अफीम जैसी नकदी फसलों का जबरन उत्पादन कराया, जिससे भारतीय कृषि का औपनिवेशिक शोषण चरम पर पहुँच गया।
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