RBSE Class 8 सामाजिक विज्ञान History Chapter 8 Notes & Model Paper 2027: बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक

RBSE कक्षा 8 • इतिहास (हमारे अतीत - III)

अध्याय 8: बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक

भारतीय वस्त्र उद्योग का पतन, औपनिवेशिक नीतियाँ, TISCO की ऐतिहासिक स्थापना एवं बोर्ड परीक्षा 2027 मॉडल पेपर

नोट: यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के अद्यतन पाठ्यक्रम के आधार पर कक्षा 8 के विद्यार्थियों एवं प्रतियोगी परीक्षाओं (REET, RPSC शिक्षक भर्ती) की आधारभूत तैयारी हेतु तैयार की गई है।

1. प्रस्तावना: भारतीय दस्तकारी और ब्रिटिश व्यापारिक नीतियाँ

अठारहवीं सदी के मध्य तक भारत विश्व में सूती वस्त्रों और उत्कृष्ट लोहे के उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र था। ढाका की मलमल और भारत के छींटदार वस्त्रों की पूरे यूरोप, मध्य पूर्व और एशिया में अत्यधिक मांग थी। परंतु ब्रिटेन में हुई औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) और ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता की एकतरफा व्यापारिक नीतियों ने भारत के परंपरागत दस्तकारों, बुनकरों और धातु प्रगलकों (लोहा गलाने वालों) को पतन के कगार पर ला खड़ा किया।

2. भारतीय वस्त्र और वैश्विक बाजार

  • सूती वस्त्रों की वैश्विक पहचान: भारतीय वस्त्र अपनी सूक्ष्मता, टिकाऊपन और मनमोहक डिजाइन के लिए प्रसिद्ध थे। यूरोपीय बाजारों में 'छींट' (Chintz), 'कोसा' (Cossaes) और 'जामदानी' की भारी मांग थी।
  • शब्दावली का इतिहास:
    • कैलिको (Calico): पुर्तगाली सबसे पहले भारत के पश्चिमी तट पर केरल के कैलिकट (कोझिकोड) पहुँचे थे। वहाँ से वे जो सूती कपड़ा यूरोप ले गए, उसे 'कैलिको' कहा जाने लगा।
    • छींट (Chintz): यह शब्द हिंदी के 'छीट' से लिया गया है, जिसका तात्पर्य रंगीन फूलों और बूंटियों वाले छोटे छापेदार कपड़े से होता था।
  • पारंपरिक बुनकर समुदाय: बंगाल के तांती, उत्तर भारत के जुलाहे या मोमिन, तथा दक्षिण भारत के साले व देवांग समुदाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी बुनाई कला को आगे बढ़ा रहे थे।

3. भारतीय वस्त्र उद्योग का पतन

प्रमुख कारण प्रभाव एवं परिणाम
मशीनी प्रतिस्पर्धा ब्रिटेन की सूती मिलों में मशीनों द्वारा निर्मित कपड़ा भारत के हाथ से बने वस्त्रों की तुलना में बहुत सस्ता और एक समान गुणवत्ता का होता था।
दंडात्मक आयात शुल्क ब्रिटेन की संसद ने घरेलू मिल मालिकों के दबाव में भारतीय कपड़ों के इंग्लैंड प्रवेश पर भारी आयात शुल्क (Tariff) लगा दिया, जिससे भारतीय वस्त्र यूरोप से बाहर हो गए।
भारतीय बाजार पर कब्जा 1830 के दशक तक ब्रिटेन का बना सस्ता सूती कपड़ा भारतीय बाजारों में भर गया। 1880 के दशक तक भारत में पहने जाने वाले वस्त्रों का दो-तिहाई हिस्सा ब्रिटेन से आता था, जिससे लाखों बुनकर और कताई करने वाले बेरोजगार हो गए।

4. कच्चे माल का संकट (अमेरिकी गृहयुद्ध - 1861)

1861 में जब संयुक्त राज्य अमेरिका में गृहयुद्ध प्रारंभ हुआ, तो ब्रिटेन को अमेरिका से मिलने वाली कच्चे कपास की आपूर्ति बंद हो गई। ब्रिटिश कारखानों को चालू रखने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से अत्यधिक मात्रा में कच्चा कपास ब्रिटेन निर्यात करना शुरू किया। इसके दो प्रमुख दुष्प्रभाव पड़े:

  • भारत में कच्चे कपास की कीमतें अत्यधिक बढ़ गईं।
  • भारतीय स्थानीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना कठिन और महंगा हो गया, जिससे उनका बचा-खुचा व्यवसाय भी संकट में पड़ गया।

5. लोहा प्रगलन का पतन और आधुनिक उद्योग (TISCO)

भारत में टीपू सुल्तान की प्रसिद्ध 'वुट्ज़ स्टील' (Wootz Steel) की तलवार जैसी उत्कृष्ट धातु कला सदियों से मौजूद थी। परंतु 19वीं सदी में औपनिवेशिक वन कानूनों के कारण यह उद्योग भी नष्ट हो गया:

  • वन कानूनों का प्रभाव: ब्रिटिश सरकार द्वारा आरक्षित वनों के नियम लागू करने से स्थानीय धातु प्रगलकों (विशेषकर अगरिया समुदाय) को भट्टियों के लिए लकड़ी का कोयला मिलना बंद हो गया और उन पर भारी कर लगा दिए गए।
  • ब्रिटिश लोहे का आयात: भारत में रेलवे और पुल निर्माण हेतु इंग्लैंड से तैयार लोहे का आयात किया जाने लगा।

टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना:

  • संस्थापक: दूरदर्शी उद्योगपति जमशेतजी टाटा के सपने को उनके पुत्र दोराबजी टाटा और अमेरिकी भूवैज्ञानिक चार्ल्स पेरिन ने साकार किया।
  • साकची का चयन (1907): 1907 में झारखंड में स्वर्णरेखा और खरकई नदियों के संगम पर साकची (वर्तमान जमशेदपुर) नामक स्थान को चुना गया। यह स्थान लौह अयस्क (मयूरभंज), कोयला (झरिया) और जल के विशाल स्रोतों के निकट था। 1912 से यहाँ इस्पात उत्पादन प्रारंभ हुआ।
  • प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) का प्रभाव: युद्ध काल में ब्रिटेन की इस्पात मिलें यूरोप की सैन्य आवश्यकताओं में उलझ गईं। परिणामस्वरूप भारत में रेलवे और सेना के लिए आवश्यक इस्पात की आपूर्ति का दायित्व TISCO को मिला। औपनिवेशिक सरकार ने TISCO के 90% से अधिक उत्पादन को खरीदा, जिससे यह ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा इस्पात कारखाना बनकर उभरा।

RBSE कक्षा 8 बोर्ड परीक्षा - 2027

विषय: सामाजिक विज्ञान (इतिहास) • मॉडल प्रश्न पत्र

अध्याय 8: बुनकर, लोहा बनाने वाले और फैक्ट्री मालिक | पूर्णांक: 25 | समय: 45 मिनट

खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)

  1. 18वीं सदी में भारत के किस क्षेत्र के सूती वस्त्र वैश्विक बाजार में अपनी गुणवत्ता हेतु सर्वाधिक प्रसिद्ध थे?
    (अ) ढाका और बंगाल    (ब) पंजाब    (स) राजस्थान    (द) असम
    उत्तर: (अ) ढाका और बंगाल
  2. ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के कारण भारत के किस पारंपरिक उद्योग को सबसे भीषण क्षति पहुँची?
    (अ) जहाजरानी उद्योग    (ब) वस्त्र (कपड़ा) उद्योग    (स) कागज उद्योग    (द) चीनी उद्योग
    उत्तर: (ब) वस्त्र (कपड़ा) उद्योग
  3. टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना किस वर्ष की गई थी?
    (अ) 1857 ई.    (ब) 1907 ई.    (स) 1912 ई.    (द) 1914 ई.
    उत्तर: (ब) 1907 ई.
  4. TISCO कारखाने की स्थापना किस नदी के तट पर की गई थी?
    (अ) गंगा नदी    (ब) नर्मदा नदी    (स) स्वर्णरेखा नदी    (द) कावेरी नदी
    उत्तर: (स) स्वर्णरेखा नदी

खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)

प्र.5 यूरोपीय बाजारों में प्रसिद्ध वस्त्रों के नाम 'छींट' और 'कैलिको' की उत्पत्ति कहाँ से हुई थी?
उत्तर: 'छींट' शब्द हिंदी के 'छीट' (रंगीन बूंदों/छापों वाला कपड़ा) से बना है, जबकि 'कैलिको' शब्द केरल के 'कैलिकट' (कोझिकोड) बंदरगाह से उत्पन्न हुआ।

प्र.6 अमेरिका में गृहयुद्ध किस वर्ष प्रारंभ हुआ था, जिसने भारत के कपास व्यापार को प्रभावित किया?
उत्तर: वर्ष 1861 में।

प्र.7 भारत में पारंपरिक लोहा प्रगलन (लोहा गलाने) के कार्य से कौन सा समुदाय विशेष रूप से जुड़ा था?
उत्तर: मध्य भारत का 'अगरिया' समुदाय।

प्र.8 साकची (जमशेदपुर) वर्तमान में भारत के किस राज्य में स्थित है?
उत्तर: झारखंड राज्य में।

खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 3 अंक)

प्र.9 19वीं सदी में भारतीय बुनकरों के समक्ष उत्पन्न हुई प्रमुख समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1. मशीनी माल से प्रतिस्पर्धा: ब्रिटेन की मिलों में कम लागत पर निर्मित कपड़े हाथ से बुने भारतीय वस्त्रों से अधिक सस्ते थे।
2. निर्यात बाजारों का बंद होना: ब्रिटेन और यूरोप में भारतीय कपड़ों पर अत्यधिक आयात कर लगा दिए जाने से विदेशी मांग समाप्त हो गई।
3. कच्चे माल का संकट: स्थानीय बाजार में कच्चे कपास की कीमतें अत्यधिक बढ़ने से बुनकरों की लागत बढ़ गई और वे कर्ज के जाल में उलझ गए।

प्र.10 औपनिवेशिक काल में भारत के पारंपरिक लोहा प्रगलकों (अगरिया समुदाय) का व्यवसाय क्यों ठप हो गया?
उत्तर:
1. कठोर वन नियम: ब्रिटिश वन कानूनों के तहत आरक्षित वनों में प्रवेश निषेध कर दिया गया, जिससे भट्टियों के लिए लकड़ी का कोयला प्राप्त करना असंभव हो गया।
2. भारी कर व्यवस्था: जिन जंगलों में प्रवेश की अनुमति थी, वहाँ वन विभाग ने प्रति भट्टी अत्यधिक कर लगा दिए।
3. आयातित लोहे का प्रभाव: 19वीं सदी के अंत तक ब्रिटेन से सस्ते पिग आयरन और इस्पात का बड़े पैमाने पर आयात होने लगा, जिससे स्थानीय लोहे की मांग घट गई।

प्र.11 जमशेतजी टाटा द्वारा इस्पात संयंत्र स्थापित करने के लिए 'साकची' (जमशेदपुर) को चुनने के क्या भौगोलिक कारण थे?
उत्तर:
1. साकची क्षेत्र लौह अयस्क (मयूरभंज की खदानों) और उच्च गुणवत्ता वाले कोयले (झरिया) के अत्यंत निकट था।
2. कारखाने और बस्ती की दैनिक आवश्यकताओं हेतु स्वर्णरेखा और खरकई नदियों से वर्ष भर पर्याप्त जल उपलब्ध था।
3. यह स्थान कलकत्ता-बॉम्बे रेलवे लाइन और कलकत्ता बंदरगाह के निकट था, जिससे तैयार माल का परिवहन अत्यंत सुगम था।

खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 4 अंक)

प्र.12 अठारहवीं सदी तक भारतीय वस्त्र उद्योग के वैश्विक वर्चस्व और औद्योगिक क्रांति के उपरांत इसके पतन के कारणों का विस्तारपूर्वक विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
वैश्विक वर्चस्व: 18वीं सदी के मध्य तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा सूती वस्त्र निर्यातक था। ढाका की मलमल, मसूलीपट्टनम की छींट और बुरहानपुर के सुनहरे जरीदार वस्त्रों की पूरे विश्व में असाधारण प्रतिष्ठा थी। भारतीय बुनकरों की शिल्पकला अद्वितीय थी।
पतन के कारण:
1. ब्रिटिश औद्योगिक क्रांति: इंग्लैंड की मिलों में वाष्प चालित कताई और बुनाई मशीनों से बड़े पैमाने पर सस्ते वस्त्र तैयार होने लगे।
2. संरक्षणवादी नीतियाँ: ब्रिटिश सरकार ने अपने मिल मालिकों के हितों की रक्षा हेतु भारतीय वस्त्रों पर अत्यधिक सीमा शुल्क लगा दिया, जिससे विदेशी मंडियों में भारतीय वस्त्र बिकना बंद हो गए।
3. घरेलू बाजार में विदेशी वस्त्र: 1830 के दशक तक ब्रिटेन के सस्ते कपड़े ने भारतीय बाजारों को पाट दिया। हाथ से बुनाई करने वाले भारतीय कारीगर मशीनों की कीमत से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके और करोड़ों बुनकर व कताई करने वाले बेरोजगार होकर कृषि मजदूरी की ओर विवश हुए।

प्र.13 प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारत के आधुनिक इस्पात उद्योग (TISCO) के विकास में किस प्रकार निर्णायक भूमिका निभाई?
उत्तर:
1. ब्रिटिश आयात की समाप्ति: युद्ध से पूर्व भारत में रेलवे और संरचनात्मक विकास के लिए आवश्यक संपूर्ण इस्पात ब्रिटेन से आयात होता था। 1914 में युद्ध शुरू होते ही ब्रिटिश इस्पात मिलें युद्ध सामग्री निर्माण में लग गईं, जिससे भारत को होने वाला निर्यात बंद हो गया।
2. युद्धकालीन मांग में वृद्धि: भारतीय रेलवे को पटरियों, डिब्बों और सैन्य अभियानों (मेसोपोटामिया आदि) के लिए तत्काल इस्पात की आवश्यकता थी। इस रिक्तता को भरने के लिए ब्रिटिश सरकार ने TISCO से संपर्क किया।
3. सरकारी संरक्षण व खरीद: युद्ध लंबा खिंचने के कारण औपनिवेशिक सरकार ने TISCO को युद्ध सामग्री, तोपों के खोल और पटरियाँ बनाने का अनुबंध दिया। 1919 तक सरकार TISCO के लगभग 90% इस्पात का उपभोग करने लगी।
4. औद्योगिक आत्मनिर्भरता: इस युद्धकालीन मांग ने TISCO को भारी वित्तीय लाभ प्रदान किया और इसे अपने संयंत्र का विस्तार करने का अवसर मिला, जिससे यह समूचे ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा और आधुनिक इस्पात कारखाना बन गया।

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