कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान अध्याय 4: झूम खेती, ब्रिटिश वन कानून, दिकू, बिरसा मुंडा आंदोलन, छोटा नागपुर अधिनियम एवं RBSE बोर्ड 2027 मॉडल पेपर हल सहित।
इतिहास (हमारे अतीत - III) | अध्याय 4: आदिवासी, दिकू और एक स्वर्ण युग की कल्पना
(आदिवासी जीवन, ब्रिटिश वन नीतियाँ, बिरसा मुंडा उलगुलान एवं बोर्ड परीक्षा 2027 मॉडल पेपर)
1. आदिवासी समाजों की पारंपरिक जीवनशैली
19वीं सदी तक भारत के वनों और पर्वतीय अंचलों में निवासरत आदिवासी समुदाय प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन यापन करते थे। उनकी आजीविका के मुख्य आधार निम्नलिखित थे:
- झूम खेती (घुमंतू कृषि): जंगलों के छोटे भूखंडों पर वृक्षों की ऊपरी शाखाएँ काटकर धूप आने का मार्ग बनाते थे तथा वनस्पति को जलाकर राख (जिसमें पोटाश होता था) को खाद के रूप में मिट्टी में मिलाते थे। फसल कटने के उपरांत भूमि को कई वर्षों के लिए परती छोड़ दिया जाता था।
- शिकारी और संग्राहक: मध्य भारत के खोंड जैसे समुदाय वनों से फल, कंद-मूल, जड़ी-बूटियाँ तथा साल व महुआ के बीजों का तेल एकत्र करते थे और स्थानीय बुनकरों को चमड़े की रंगाई हेतु पलाश व कुसुम के फूल उपलब्ध कराते थे।
- पशुपालक: पंजाब के पहाड़ों के वन गुज्जर और आंध्र प्रदेश के लबाडिया गाय-भैंस पालते थे, जबकि गद्दी गड़रिए भेड़-बकरियों के रेवड़ चराते थे।
- स्थायी कृषक: छोटा नागपुर के मुंडा जैसे समुदाय हल चलाकर एक स्थान पर स्थायी खेती करते थे, जिन्हें ब्रिटिश प्रशासन अधिक 'सभ्य' व नियंत्रित मानता था।
2. औपनिवेशिक शासन का प्रभाव एवं 'दिकू' (शोषण का तंत्र)
अंग्रेजी सत्ता के वनों में प्रवेश से आदिवासियों की सदियों पुरानी स्वायत्तता ध्वस्त हो गई:
- मुखियाओं के अधिकारों का हनन: आदिवासी सरदारों की पारंपरिक पुलिस और प्रशासनिक सत्ता समाप्त कर दी गई। उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों के एजेंट के रूप में लगान वसूलने के लिए विवश किया गया।
- आरक्षित वन (Reserved Forests): अंग्रेजों ने इमारती लकड़ी (रेलवे स्लीपर्स हेतु साल और सागौन) प्राप्त करने के लिए जंगलों को 'राज्य की संपत्ति' घोषित किया और आदिवासियों के प्रवेश, शिकार व झूम खेती पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
- दिकू (Dikus): बाहरी महाजन, व्यापारी और ठेकेदार वनों में आए। ये महाजन आदिवासियों को अत्यधिक ब्याज दरों पर ऋण देकर उनकी जमीनें हड़प लेते थे, जिससे आदिवासी अपने ही वनों में बंधुआ मजदूर बन गए।
3. बिरसा मुंडा का आंदोलन एवं 'स्वर्ण युग' की संकल्पना
आदिवासियों ने अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए अनेक विद्रोह किए (जैसे 1831-32 का कोल विद्रोह और 1855 का संथाल हूल)। इनमें सबसे युगांतरकारी आंदोलन बिरसा मुंडा का 'उलगुलान' (महान हलचल) था।
🌟 सतयुग (स्वर्ण युग) की परिकल्पना:
बिरसा ने मुंडाओं से आह्वान किया कि वे शराब का त्याग करें, गाँवों को स्वच्छ रखें और डायन-जादू-टोने में विश्वास न करें। उन्होंने एक ऐसे 'स्वर्ण युग' (सत्याग्रह व आत्मगौरव का काल) की कल्पना की जहाँ कोई विदेशी शासक (दिकू) न हो, मुंडा अपनी भूमि पर प्राकृतिक नहरें बनाएं, पेड़-पौधे लगाएं और बिना किसी दमन के शांतिपूर्वक खेती करें।
1900 में बिरसा की मृत्यु के बाद भी आंदोलन निष्फल नहीं रहा। विवश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने 'छोटा नागपुर कश्तकारी अधिनियम, 1908' (Chota Nagpur Tenancy Act) पारित किया, जिसके अंतर्गत गैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासियों की भूमि के क्रय-विक्रय व हस्तांतरण पर विधिक रोक लगा दी गई।
मॉडल प्रश्न पत्र: अध्याय 4 (आदिवासी, दिकू और एक स्वर्ण युग की कल्पना)
पूर्णांक: 25 अंक | समय: 45 मिनट
खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रत्येक 1 अंक)
प्र.1 'झूम खेती' से क्या तात्पर्य है?
(अ) स्थायी खेती (ब) घुमंतू या स्थानांतरित खेती (स) सीढ़ीनुमा कृषि (द) रोपण कृषि
उत्तर: (ब) घुमंतू या स्थानांतरित खेती
प्र.2 आदिवासी समाज में बाहरी शोषकों (व्यापारी व महाजन) को क्या कहा जाता था?
(अ) फिरंगी (ब) जमींदार (स) दिकू (द) लठैत
उत्तर: (स) दिकू
प्र.3 बिरसा मुंडा का संबंध मुख्य रूप से किस जनजाति से था?
(अ) संथाल (ब) मुंडा (स) भील (द) गोंड
उत्तर: (ब) मुंडा
प्र.4 'छोटा नागपुर कश्तकारी अधिनियम' किस वर्ष लागू किया गया था?
(अ) 1855 ई. (ब) 1895 ई. (स) 1908 ई. (द) 1920 ई.
उत्तर: (स) 1908 ई.
खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक 1 अंक)
प्र.5 झूम खेती में फसल कटाई के उपरांत भूमि को 'परती' क्यों छोड़ा जाता था?
उत्तर: ताकि प्राकृतिक रूप से मिट्टी की खोई हुई उर्वरता और पोषक तत्व पुनः लौट सकें।
प्र.6 अंग्रेजों द्वारा 'आरक्षित वनों' में आदिवासियों के प्रवेश पर रोक लगाने का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर: रेल लाइनों के स्लीपर्स तथा नौसेना हेतु बहुमूल्य इमारती लकड़ी पर निर्बाध नियंत्रण स्थापित करना।
प्र.7 बिरसा मुंडा ने अपने समाज के आंतरिक सुधार हेतु क्या आह्वान किया?
उत्तर: मद्यपान (शराब) का त्याग, गाँवों की शुचिता और अंधविश्वास व जादू-टोने से दूर रहना।
प्र.8 बिरसा आंदोलन का सर्वप्रमुख राजनीतिक ध्येय क्या था?
उत्तर: 'मुंडा राज' की स्थापना करना और दिकुओं व ब्रिटिश अधिकारियों को बाहर निकालना।
खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक 3 अंक)
प्र.9 औपनिवेशिक वन कानूनों ने घुमंतू कृषकों के जीवन को किस प्रकार संकटग्रस्त किया?
उत्तर: अंग्रेजों ने झूम खेती को अनियंत्रित मानकर उस पर प्रतिबंध लगा दिया और कृषकों को एक स्थान पर बसने को विवश किया। सिंचाई के साधनों व उपजाऊ मृदा के अभाव में स्थायी खेती संभव न होने से उनकी पारंपरिक आजीविका नष्ट हो गई और वे भुखमरी की कगार पर पहुँच गए।
प्र.10 आदिवासी संदर्भ में 'दिकू' कौन थे और उनके शोषण की पद्धति क्या थी?
उत्तर: वनों के बाहर से आए सूदखोर महाजन, व्यापारी और ठेकेदार 'दिकू' कहलाते थे। वे आदिवासियों को अत्यधिक ब्याज दर पर कर्ज देते थे और ऋण न चुका पाने की स्थिति में उनकी पैतृक भूमियों को अनैतिक रूप से जब्त कर लेते थे।
प्र.11 बिरसा मुंडा के 'स्वर्ण युग' (Golden Age) की मूल अवधारणा क्या थी?
उत्तर: यह पूर्वजों के उस मुक्त और मर्यादित जीवन की पुनर्स्थापना थी जिसमें मुंडा समुदाय अपने जल-जंगल-जमीन का स्वयं स्वामी था, प्रकृति की रक्षा करता था और किसी बाहरी सत्ता (दिकू/ब्रिटिश) का आर्थिक व सामाजिक दमन विद्यमान नहीं था।
खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक 4 अंक)
प्र.12 ब्रिटिश शासन के आगमन से आदिवासी मुखियाओं की सामाजिक व प्रशासनिक सत्ता पर क्या प्रभाव पड़ा?
प्र.13 बिरसा मुंडा आंदोलन के मुख्य कारण और इसके दूरगामी ऐतिहासिक परिणामों का मूल्यांकन कीजिए।
परिणाम: 1895 से 1900 तक चले इस जन-विद्रोह ने सिद्ध कर दिया कि आदिवासी अपनी अस्मिता हेतु सर्वोच्च बलिदान दे सकते हैं। इसके दबाव में ब्रिटिश शासन ने छोटा नागपुर कश्तकारी अधिनियम (1908) लागू किया, जिससे आदिवासियों की भूमि गैर-आदिवासियों को अंतरित किए जाने पर कानूनी प्रतिबंध लगा और उनकी संपदा सुरक्षित हुई।
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