अध्याय 7: महिलाएँ, जाति एवं सुधार
19वीं सदी के सामाजिक सुधार आंदोलन, महिला अधिकारों का संघर्ष, जाति प्रथा उन्मूलन एवं बोर्ड परीक्षा 2027 मॉडल पेपर
नोट: यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) के नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार कक्षा 8 के विद्यार्थियों तथा शिक्षक भर्ती एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की आधारभूत तैयारी के लिए तैयार की गई है।
1. प्रस्तावना: 19वीं सदी में भारतीय समाज की स्थिति
आज आधुनिक युग में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने, मतदान करने, संपत्ति में अधिकार पाने और विभिन्न पेशों में कार्य करने की स्वतंत्रता है। परंतु लगभग दो सौ वर्ष पूर्व (19वीं सदी के आरंभ में) भारतीय समाज रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, छुआछूत और कठोर सामाजिक विषमताओं से ग्रस्त था। इस दौर में समाज सुधारकों के एक प्रबुद्ध वर्ग ने इन सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने और समतामूलक समाज के निर्माण हेतु सशक्त आंदोलन चलाए।
2. महिलाओं की स्थिति एवं प्रमुख समाज सुधारक
19वीं सदी में महिलाएँ सती प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, पर्दा प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या जैसी अमानवीय कुरीतियों की शिकार थीं। अधिकांश महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था और समाज में यह भ्रांति थी कि शिक्षित स्त्रियाँ शीघ्र विधवा हो जाती हैं।
| समाज सुधारक | संस्था / माध्यम | प्रमुख ऐतिहासिक सुधार |
|---|---|---|
| राजा राममोहन राय | ब्रह्म समाज (1830) | प्राचीन ग्रंथों का संदर्भ देकर 1829 में सती प्रथा निषेध कानून बनवाया। |
| ईश्वरचंद्र विद्यासागर | संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता | शास्त्रों के साक्ष्य प्रस्तुत कर 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित करवाया। |
| ज्योतिराव एवं सावित्रीबाई फुले | सत्यशोधक समाज | 1848 में पुणे में बालिकाओं के लिए देश का पहला विद्यालय स्थापित किया। |
| बेगम रुकैया सखवत हुसैन | मुस्लिम बालिका विद्यालय | पटना व कलकत्ता में विद्यालयों की स्थापना; 'सुल्ताना का स्वप्न' (1905) के जरिए नारी स्वतंत्रता का प्रसार। |
3. जाति व्यवस्था और समानता के लिए संघर्ष
पारंपरिक वर्ण व्यवस्था ने समाज को कठोर जातियों में विभाजित कर रखा था। उच्च जातियाँ (ब्राह्मण, क्षत्रिय) विशेषाधिकार संपन्न थीं, जबकि निचली जातियों (शूद्र एवं अतिशूद्र) को सामाजिक नागरिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था—जैसे सार्वजनिक कुओं से जल भरना, विद्यालयों में प्रवेश और मंदिरों में दर्शन करना पूर्णतः वर्जित था।
(क) ज्योतिराव फुले एवं 'गुलामगिरी' (1873)
- फुले ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी और तर्क दिया कि आर्य विदेशी आक्रमणकारी थे जिन्होंने मूल निवासियों को पराजित कर उन्हें निचली जाति बना दिया।
- 1873 में उन्होंने 'गुलामगिरी' (दासता) नामक पुस्तक लिखी, जिसे उन्होंने अमेरिकी गृहयुद्ध के उन गोरे अमेरिकियों को समर्पित किया जिन्होंने हब्शी गुलामों को मुक्त कराया था।
- उन्होंने सत्यशोधक समाज नामक संगठन की स्थापना की, जो जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध जागरूकता फैलाता था।
(ख) डॉ. भीमराव अंबेडकर: दलित उद्धार एवं महाड़ सत्याग्रह
- महार परिवार में जन्मे डॉ. अंबेडकर ने स्वयं जातिगत अपमान का दंश झेला था। उच्च शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने दलितों के राजनीतिक व सामाजिक अधिकारों का बीड़ा उठाया।
- महाड़ सत्याग्रह (1927): उन्होंने सार्वजनिक 'चावदार तालाब' से अछूतों को जल पीने का अधिकार दिलाने हेतु ऐतिहासिक सत्याग्रह किया।
- उन्होंने 1927 से 1935 के मध्य तीन प्रमुख मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाए ताकि समाज में यह संदेश जाए कि धर्म और सार्वजनिक स्थलों पर सभी का समान अधिकार है।
(ग) ई.वी. रामस्वामी नायकर 'पेरियार' एवं आत्म-सम्मान आंदोलन
- पेरियार ने दक्षिण भारत (तमिलनाडु) में गैर-ब्राह्मणों के स्वाभिमान हेतु 'आत्म-सम्मान आंदोलन' (Self-Respect Movement) प्रारंभ किया।
- उन्होंने तर्क दिया कि हिंदू धर्मग्रंथों का उपयोग निचली जातियों पर वर्चस्व बनाए रखने के लिए किया गया है, अतः वास्तविक समानता के लिए धार्मिक रूढ़ियों का त्याग आवश्यक है।
4. अन्य सुधार आंदोलन एवं आधुनिक परिवर्तन
- श्री नारायण गुरु (केरल): एझावा समुदाय के संत श्री नारायण गुरु ने "ओरू जाथि, ओरू मथम, ओरू दैवम मनुष्यानु" (मानव जाति के लिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर) का सार्वभौमिक सिद्धांत दिया।
- शहरीकरण और औद्योगीकरण का प्रभाव: 19वीं सदी के उत्तरार्ध में रेलगाड़ियों, सूती मिलों, नगरपालिकाओं और आधुनिक कारखानों के विस्तार ने लोगों को एक साथ काम करने के अवसर दिए। इससे शहरों में पारंपरिक छुआछूत और जातियों के कठोर बंधन ढीले पड़ने लगे।
RBSE कक्षा 8 बोर्ड परीक्षा - 2027
विषय: सामाजिक विज्ञान (इतिहास) • मॉडल प्रश्न पत्र
अध्याय 7: महिलाएँ, जाति एवं सुधार | पूर्णांक: 25 | समय: 45 मिनट
खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)
-
राजा राममोहन राय ने किस सुधारवादी संस्था की स्थापना की थी?
(अ) प्रार्थना समाज (ब) ब्रह्म समाज (स) सत्यशोधक समाज (द) आर्य समाज
उत्तर: (ब) ब्रह्म समाज -
सती प्रथा को किस वर्ष कानून बनाकर गैरकानूनी घोषित किया गया था?
(अ) 1829 ई. (ब) 1856 ई. (स) 1848 ई. (द) 1873 ई.
उत्तर: (अ) 1829 ई. -
'गुलामगिरी' (Gulamgiri) नामक पुस्तक के लेखक कौन थे?
(अ) डॉ. भीमराव अंबेडकर (ब) ज्योतिराव फुले (स) पेरियार (द) ईश्वरचंद्र विद्यासागर
उत्तर: (ब) ज्योतिराव फुले -
1927 के प्रसिद्ध महाड़ सत्याग्रह का नेतृत्व किसने किया था?
(अ) महात्मा गांधी (ब) ज्योतिराव फुले (स) डॉ. भीमराव अंबेडकर (द) श्री नारायण गुरु
उत्तर: (स) डॉ. भीमराव अंबेडकर
खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)
प्र.5 ब्रिटिश सरकार द्वारा 'विधवा पुनर्विवाह कानून' किस वर्ष पारित किया गया था?
उत्तर: वर्ष 1856 में (ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों से)।
प्र.6 ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने बालिकाओं के लिए प्रथम विद्यालय कहाँ और कब स्थापित किया?
उत्तर: वर्ष 1848 में पुणे (महाराष्ट्र) में।
प्र.7 बेगम रुकैया सखवत हुसैन द्वारा रचित प्रसिद्ध विज्ञान-कथा (कहानी) का नाम क्या है?
उत्तर: 'सुल्ताना का स्वप्न' (Sultana's Dream - 1905)।
प्र.8 केरल के संत श्री नारायण गुरु ने समाज को क्या प्रमुख संदेश दिया था?
उत्तर: "मानव जाति के लिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर।"
खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 3 अंक)
प्र.9 समाज सुधार के क्षेत्र में राजा राममोहन राय के योगदान की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
1. उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता हेतु आवाज उठाई।
2. 1830 में कलकत्ता में 'ब्रह्म समाज' की स्थापना की, जो मूर्तिपूजा और निरर्थक कर्मकांडों का विरोधी था।
3. उन्होंने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के प्रमाण प्रस्तुत कर तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिंक के सहयोग से 1829 में सती प्रथा निषेध कानून बनवाया।
प्र.10 ज्योतिराव फुले के 'सत्यशोधक समाज' और उनकी पुस्तक 'गुलामगिरी' के महत्व को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1. सत्यशोधक समाज: फुले ने इस संगठन के माध्यम से शूद्रों और अतिशूद्रों में सामाजिक चेतना जगाई और उन्हें ब्राह्मणवादी शोषण से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया।
2. 'गुलामगिरी' पुस्तक (1873): उन्होंने भारत की निचली जातियों के कष्टों की तुलना अमेरिका के अश्वेत गुलामों से करके जातिगत उत्पीड़न को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया।
प्र.11 डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा सामाजिक समानता हेतु चलाए गए प्रमुख आंदोलनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1. महाड़ सत्याग्रह (1927): दलितों को सार्वजनिक जलाशय से जल प्राप्त करने का नागरिक अधिकार दिलवाया।
2. मंदिर प्रवेश आंदोलन (1927-1935): कलारम मंदिर सहित कई स्थानों पर आंदोलन किए ताकि समाज में छुआछूत की मानसिकता समाप्त हो।
3. दलित चेतना: उन्होंने 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' और पत्रिकाओं के माध्यम से वंचित वर्ग को "शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो" का मूलमंत्र दिया।
खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 4 अंक)
प्र.12 19वीं सदी में भारतीय महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए उन्हें सुधारने में प्रमुख समाज सुधारकों के प्रयासों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
तत्कालीन स्थिति: 19वीं सदी के प्रारंभ में महिलाएँ सती प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह और कन्या भ्रूण हत्या जैसी भयानक कुरीतियों की शिकार थीं। विधवाओं का जीवन अत्यंत उपेक्षित व नारकीय था और शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध था।
प्रमुख सुधारकों का योगदान:
1. राजा राममोहन राय: 1829 में सती प्रथा का उन्मूलन करवाया।
2. ईश्वरचंद्र विद्यासागर: 1856 में हिंदू विधवा पुनर्विवाह कानून बनवाया तथा अनेक बालिका विद्यालय खोले।
3. सावित्रीबाई फुले व ज्योतिराव फुले: पूना में बालिकाओं और शूद्रों हेतु विद्यालय स्थापित कर स्त्री शिक्षा की मजबूत नींव रखी।
4. पंडिता रमाबाई व बेगम रुकैया: उच्च शिक्षा प्राप्त कर विधवा आश्रमों और मुस्लिम कन्या विद्यालयों की स्थापना की और महिलाओं के अधिकारों पर लेखन किया।
प्र.13 भारत में जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता के विरुद्ध विभिन्न क्षेत्रों में उठने वाले आंदोलनों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. पश्चिमी भारत (महाराष्ट्र): ज्योतिराव फुले ने सत्यशोधक समाज और 'गुलामगिरी' के माध्यम से जातिगत शोषण को चुनौती दी। आगे चलकर डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने महाड़ सत्याग्रह और मंदिर प्रवेश आंदोलनों के द्वारा दलितों को मानवीय गरिमा व संवैधानिक अधिकार दिलाए।
2. दक्षिण भारत (तमिलनाडु व केरल):
• पेरियार (ई.वी. रामस्वामी) ने 'आत्म-सम्मान आंदोलन' चलाकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व और सामाजिक गैर-बराबरी पर तीखा प्रहार किया।
• केरल में श्री नारायण गुरु ने 'एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर' का सिद्धांत देकर एझावा समुदाय को संगठित किया।
3. मध्य भारत: घासीदास ने 'सतनामी आंदोलन' प्रारंभ किया, जिसने चमड़े का काम करने वाले समुदायों के सामाजिक सम्मान हेतु कार्य किया। इन आंदोलनों ने मिलकर भारतीय समाज में समता और बंधुत्व की चेतना का प्रसार किया।

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