RBSE कक्षा 8
राजस्थान अध्ययन: हमारा राजस्थान
अध्याय 1: 18वीं सदी का राजस्थान
इतिहास • राजनीति • समाज • अर्थव्यवस्था • संस्कृति
राजस्थान बोर्ड (RBSE) की कक्षा 8 के लिए जो विशेष पुस्तक चलती है, उसका नाम "हमारा राजस्थान" है।
यह पुस्तक राजस्थान के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और राजनैतिक व्यवस्था को समर्पित है।
📚 "हमारा राजस्थान" (कक्षा 8) की विषय-सूची
इस पुस्तक में कुल 9 अध्याय हैं:
- अध्याय 1: 18वीं सदी का राजस्थान
- अध्याय 2: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान
- अध्याय 3: आधुनिक राजस्थान का निर्माण (एकीकरण)
- अध्याय 4: राजस्थान में किसान एवं प्रजामंडल आंदोलन
- अध्याय 5: राजस्थान के प्रमुख व्यक्तित्व
- अध्याय 6: राजस्थान की कला एवं संस्कृति
- अध्याय 7: राजस्थान के कृषि एवं खनिज संसाधन
- अध्याय 8: जनसरोकार (लोक कल्याणकारी योजनाएँ)
- अध्याय 9: विकास के पथ पर राजस्थान
📖 अध्याय 1: 18वीं सदी का राजस्थान
1. 18वीं सदी के आरंभ में राजस्थान की राजनीतिक स्थिति
- मुगल साम्राज्य का पतन: 18वीं सदी के आरंभ में औरंगजेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल साम्राज्य का पतन तेजी से होने लगा था, जिसके कारण भारत की राजनीतिक स्थिति में एक बड़ा शून्यता आ गई थी।
- क्षेत्रीय ताकतों का उदय: मुगलों के कमजोर होने का फायदा उठाकर राजस्थान की रियासतों ने अपनी स्थिति मजबूत करने के प्रयास किए। इस काल में राजस्थान में कोई एक केंद्रीय सत्ता नहीं थी, बल्कि यह अनेक स्वतंत्र रियासतों (जैसे मेवाड़, मारवाड़, आमेर, कोटा, बूंदी आदि) में बंटा हुआ था।
- आपसी संघर्ष: इस काल की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि राजस्थान के शासक आपसी प्रतिद्वंद्विता और विस्तारवादी नीति के चलते एक-दूसरे से संघर्ष करते रहते थे, जिससे बाहरी ताकतों (जैसे मराठों) को दखल देने का अवसर मिल गया।
2. मराठों का राजस्थान में प्रवेश और हस्तक्षेप
- पहला प्रवेश: 18वीं सदी के चौथे दशक में मराठों ने मालवा के रास्ते राजस्थान की राजनीति में पहली बार हस्तक्षेप करना शुरू किया।
- छुटकारा पाने के प्रयास: मराठों के बढ़ते वर्चस्व और चौथ (कर) वसूली से परेशान होकर राजस्थान के शासकों ने आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आने का प्रयास किया।
🏛️ हुड़वा सम्मेलन (1734 ई.)
- मराठों की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय के प्रयासों से 17 जुलाई 1734 ई. को भीलवाड़ा के हुड़वा (हुरड़ा) नामक स्थान पर राजस्थान के प्रमुख शासकों का एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया गया।
- इस सम्मेलन में जयपुर के सवाई जयसिंह, जोधपुर के अभयसिंह, नागौर के बख्त सिंह, कोटा के महाराव दुर्जनसाल और अन्य शासक शामिल हुए।
- सम्मेलन का उद्देश्य: सभी शासकों ने यह तय किया कि वे बरसात के बाद मराठों के खिलाफ मिलकर संयुक्त सैन्य अभियान चलाएंगे और एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ देंगे।
- विफलता: दुर्भाग्य से, आपसी आपसी फूट, व्यक्तिगत स्वार्थ और अविश्वासी रवैये के कारण 'हुड़वा सम्मेलन' पूरी तरह असफल साबित हुआ और मराठों के खिलाफ कोई ठोस संयुक्त रणनीति लागू नहीं की जा सकी।
3. उत्तराधिकार संघर्ष और अंग्रेजों का प्रवेश
- विवाद: 18वीं सदी के उत्तरार्ध में आमेर (जयपुर) और मारवाड़ (जोधपुर) जैसी बड़ी रियासतें आपसी उत्तराधिकार के खूनी संघर्षों में उलझ गईं।
- मराठा और पिंडारी हस्तक्षेप: जयपुर और जोधपुर के बीच 'कृष्णाकुमारी विवाद' (जो मेवाड़ की राजकुमारी थीं) को लेकर हुए संघर्ष में मराठा सरदारों (सिंधिया और होलकर) ने जमकर हस्तक्षेप किया और राजस्थान की रियासतों से भारी धन वसूला, जिससे यहाँ की आर्थिक स्थिति चरमरा गई।
- संधियाँ (1817-18): मराठों के अत्याचारों और आंतरिक कलह से त्रस्त होकर अंततः 1818 ई. तक राजस्थान की लगभग सभी रियासतों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ सहायक संधियाँ (Subsidiary Alliance) स्वीकार कर लीं, जिससे राजस्थान में अंग्रेजों का राजनीतिक प्रभाव स्थापित हो गया।
4. 18वीं सदी में राजस्थान की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक स्थिति
- सामंतवादी व्यवस्था: इस समय राजस्थान में मुख्य रूप से सामंती व्यवस्था थी, जहाँ राजा के बाद जागीरदारों का समाज और शासन पर बड़ा प्रभाव होता था।
- कुरीतियाँ: समाज में पर्दा प्रथा, बाल विवाह, दहेज प्रथा और मृत्यु भोज जैसी कई सामाजिक कुरीतियाँ गहरी जड़ें जमा चुकी थीं।
- आर्थिक जीवन: अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर आधारित थी। हालांकि, बार-बार होने वाले युद्धों, मराठों की लूटपाट (खिराज) और अकाल के कारण किसानों और आम जनता की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई थी। इसके बावजूद हस्तशिल्प, वस्त्र और धातु कला के क्षेत्र में यहाँ के कारीगरों की कला का स्तर काफी उच्च था।
📝 RBSE कक्षा 8 मॉडल प्रश्न पत्र - 2027
विषय: हमारा राजस्थान (कक्षा 8)
अध्याय 1: 18वीं सदी का राजस्थान
पूर्णांक: 25 अंक | समय: 45 मिनट
खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 1 अंक - कुल 4 अंक)
प्र.1 औरंगजेब की मृत्यु किस वर्ष हुई थी जिसके बाद मुगल साम्राज्य
का पतन शुरू हुआ?
उत्तर: (ब) 1707 ई.
प्र.2 मराठों के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने के लिए 'हुड़वा सम्मेलन'
का आयोजन किस वर्ष किया गया था?
उत्तर: (स) 1734 ई.
प्र.3 हुड़वा (हुरड़ा) नामक स्थान वर्तमान राजस्थान के किस जिले में स्थित है?
उत्तर: (स) भीलवाड़ा
प्र.4 1818 ई. तक राजस्थान की अधिकांश रियासतों ने किस से सुरक्षा
पाने के लिए संधियाँ कर ली थीं?
उत्तर: (ब) ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से
खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 1 अंक - कुल 4 अंक)
प्र.5 18वीं सदी के आरंभ में राजस्थान की राजनीतिक स्थिति कैसी थी?
उत्तर: इस समय राजस्थान किसी एक केंद्रीय सत्ता के अधीन न होकर अनेक
स्वतंत्र रियासतों में बंटा हुआ था, जिनके शासक आपसी संघर्षों में
उलझे रहते थे।
प्र.6 हुरड़ा (हुड़वा) सम्मेलन बुलाने का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
उत्तर: राजस्थान में मराठों के बढ़ते हुए हस्तक्षेप और लूटपाट को
रोकने के लिए सभी राजपूत शासकों को एकजुट करना।
प्र.7 हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता किसने की थी?
उत्तर: मेवाड़ के महाराणा जगत सिंह द्वितीय ने।
प्र.8 18वीं सदी के दौरान राजस्थान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से
किस पर निर्भर थी?
उत्तर: कृषि और पशुपालन पर।
खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 3 अंक - कुल 9 अंक)
प्र.9 18वीं सदी में राजस्थान में मराठों के प्रवेश के मुख्य कारण
क्या थे? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
- मुगल साम्राज्य के कमजोर होने और उत्तर भारत में मराठों की शक्ति बढ़ने के कारण।
- राजस्थान की रियासतों के बीच आपसी उत्तराधिकार के संघर्षों और फूट के कारण, जहाँ शासकों ने एक-दूसरे को हराने के लिए मराठों को आमंत्रित किया।
- मालवा क्षेत्र पर अधिकार करने के बाद मराठों की नजर राजस्थान की समृद्ध रियासतों से कर (चौथ) वसूलने पर थी।
प्र.10 हुड़वा (हुरड़ा) सम्मेलन क्यों असफल हो गया?
इसके मुख्य कारण बताइए।
उत्तर:
- शासकों के बीच आपसी मतभेद, व्यक्तिगत स्वार्थ और अहंकार की भावना।
- सम्मेलन में तय किए गए नियमों और संयुक्त योजनाओं को ईमानदारी से लागू न करना।
- राजपूत शासकों में एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का होना, जिसके कारण वे मराठों के विरुद्ध एक मंच पर टिक नहीं सके।
प्र.11 18वीं सदी के दौरान राजस्थान के समाज में कौन-सी मुख्य
कुरीतियाँ प्रचलित थीं?
उत्तर:
- इस काल में समाज में पर्दा प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज प्रथा और मृत्यु भोज जैसी सामाजिक बुराइयाँ गहराई से फैली हुई थीं।
- सामंती व्यवस्था के कारण समाज में ऊँच-नीच और छुआछूत का भेदभाव भी काफी प्रचलित था।
खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 4 अंक - कुल 8 अंक)
प्र.12 18वीं सदी के राजस्थान की राजनीतिक उथल-पुथल का वर्णन कीजिए और बताइए कि इसने अंग्रेजों के प्रवेश का मार्ग कैसे प्रशस्त किया?
उत्तर:
- राजनीतिक स्थिति: 18वीं सदी में राजस्थान की रियासतें (जयपुर, जोधपुर, मेवाड़ आदि) आपसी संघर्षों, सीमा विवादों और उत्तराधिकार की लड़ाइयों में व्यस्त थीं।
- मराठों का हस्तक्षेप: इस आपसी फूट का फायदा उठाकर मराठा सरदारों ने राजस्थान में भारी दखल दिया और यहाँ की रियासतों से जबरन कर (चौथ और सरदेशमुखी) वसूला।
- आर्थिक बर्बादी: लगातार युद्धों और मराठा-पिंडारियों की लूटपाट से राजस्थान की अर्थव्यवस्था और जनता की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई।
- अंग्रेजों से संधि: आंतरिक अशांति, सुरक्षा के अभाव और वित्तीय संकट से मुक्ति पाने के लिए अंततः राजस्थान के राजाओं ने अंग्रेजों के साथ सहायक संधियाँ करना ही एकमात्र विकल्प माना, जिससे राजस्थान में ब्रिटिश आधिपत्य स्थापित हो गया।
प्र.13 18वीं सदी के राजस्थान के सामाजिक और आर्थिक जीवन का विस्तार से विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
- सामाजिक जीवन: समाज पूरी तरह से सामंती व्यवस्था पर आधारित था, जहाँ राजा और जागीरदार उच्च वर्ग में थे। महिलाओं की स्थिति शोचनीय थी और समाज रूढ़ियों व कुप्रथाओं (जैसे बाल विवाह और पर्दा प्रथा) से जकड़ा हुआ था।
- आर्थिक जीवन:
- कृषि: अधिकांश जनता कृषि पर निर्भर थी, लेकिन सिंचाई के साधनों की कमी और बार-बार होने वाले युद्धों/अकालों के कारण किसानों की स्थिति कमजोर थी।
- व्यापार और उद्योग: यद्यपि राजनीतिक अशांति थी, फिर भी हस्तशिल्प, कोटा डोरिया साड़ियाँ, कशीदाकारी, और धातु उद्योग के केंद्र अपनी कला के लिए प्रसिद्ध थे।
- राजस्व: राजाओं और जागीरदारों की आय का मुख्य साधन भूमि कर (लगान) था, जिसका बोझ अंततः आम जनता और किसानों पर पड़ता था।
📌 त्वरित पुनरावृत्ति:
अध्याय 1 में 18वीं सदी के राजस्थान की राजनीतिक स्थिति, मुगल साम्राज्य
के पतन, मराठों के प्रवेश, हुड़वा सम्मेलन, उत्तराधिकार संघर्ष, अंग्रेजों
के प्रवेश तथा सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का अध्ययन किया गया है।

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