RBSE कक्षा 8 हमारा राजस्थान अध्याय 2: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान | Notes & Model Paper 2027
राजस्थान अध्ययन: हमारा राजस्थान
अध्याय 2: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान
इतिहास • स्वतंत्रता संग्राम • क्रांति • राजस्थान
राजस्थान अध्ययन: हमारा राजस्थान (कक्षा 8)
अध्याय 2: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान
1. 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि और राजस्थान में छावनियाँ
- ब्रिटिश आधिपत्य: 1818 की संधियों के बाद राजस्थान की सभी रियासतें अंग्रेजों के प्रभाव में आ चुकी थीं। राजाओं पर अंग्रेजों का नियंत्रण था, जिससे आम जनता और सामंतों में अंदर ही अंदर असंतोष पनप रहा था।
- सैन्य छावनियाँ: 1857 की क्रांति के समय राजस्थान में कुल 6 ब्रिटिश छावनियाँ थीं:
- नसीराबाद (अजमेर)
- नीमच (वर्तमान में मध्य प्रदेश की सीमा पर, तब राजस्थान एजेंसी के अधीन)
- एरिनपुरा (पाली)
- ब्यावर (अजमेर)
- देवली (टोंक)
- खेरवाड़ा (उदयपुर)
- इन छह छावनियों में कुल लगभग 5,000 भारतीय सैनिक थे, और यहाँ कोई भी ब्रिटिश रेजिमेंट की मुख्य सेना नहीं थी, जो क्रांतिकारियों के लिए एक अनुकूल स्थिति थी।
2. राजस्थान में क्रांति की शुरुआत और प्रमुख छावनियों का विद्रोह
🔴 (क) नसीराबाद की छावनी में विद्रोह (28 मई 1857)
- राजस्थान में 1857 की क्रांति की शुरुआत सबसे पहले 28 मई 1857 को नसीराबाद छावनी में हुई थी।
- अजमेर की सुरक्षा को लेकर अंग्रेजी सेना आशंकित थी, इसलिए उन्होंने बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों पर अविश्वास किया। इसी गुस्से में सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला किया और हथियारों पर कब्जा करके दिल्ली की ओर कूच कर गए।
🟠 (ख) नीमच छावनी में विद्रोह (3 जून 1857)
- नसीराबाद के बाद 3 जून 1857 को नीमच छावनी के सैनिकों ने हीरा सिंह और मोहम्मद अली बेग के नेतृत्व में बगावत कर दी।
- सैनिकों ने छावनी में आग लगा दी और अंग्रेजों को भागने पर मजबूर कर दिया। नीमच से भागे हुए अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार के सदस्यों को डूँगला (चित्तौड़गढ़) के एक किसान मेवाराम ने अपने यहाँ शरण दी थी, जिन्हें बाद में मेवाड़ के महाराणा ने सुरक्षित उदयपुर पहुँचाया।
🟡 (ग) एरिनपुरा छावनी और जोधपुर की सेना का विद्रोह (अगस्त 1857)
- मारवाड़ की एरिनपुरा छावनी में तैनात पूर्व सैनिकों (जोधपुर लीजन) ने 21 अगस्त 1857 को विद्रोह कर दिया।
- इन क्रांतिकारियों ने "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी" का नारा दिया और आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह के संपर्क में आ गए।
3. आउवा का विद्रोह और ठाकुर कुशाल सिंह
- नेतृत्व: पाली के पास स्थित आउवा ठिकाने के शक्तिशाली जागीरदार ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने जोधपुर के राजा और अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
- बिथौड़ा का युद्ध (8 सितंबर 1857): ठाकुर कुशाल सिंह और मारवाड़ की राजकीय सेना (तथा अंग्रेजों की संयुक्त सेना) के बीच बिथौड़ा का युद्ध हुआ, जिसमें क्रांतिकारियों ने जोधपुर के शाही सैनिकों और अंग्रेजी सेना को बुरी तरह हरा दिया। इस युद्ध में हितकोट मारा गया।
- चेलावास का युद्ध / गोरे काले का युद्ध (18 सितंबर 1857): बिथौड़ा की हार का बदला लेने के लिए ए.जी.जी. (Agent to the Governor-General) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेन्स ने सेना के साथ आउवा पर आक्रमण किया। चेलावास के इस युद्ध को 'गोरे काले का युद्ध' भी कहा जाता है। इस युद्ध में क्रांतिकारियों ने पैट्रिक लॉरेन्स की सेना को हरा दिया और पॉलिटिकल एजेंट मकवाम (Monson) का सिर काटकर आउवा के किले के मुख्य दरवाजे पर लटका दिया।
- आउवा का पतन: जनवरी 1858 में ब्रिगेडियर होम्स के नेतृत्व में एक विशाल अंग्रेजी सेना ने आउवा पर चारों तरफ से आक्रमण कर दिया। ठाकुर कुशाल सिंह किला छोड़कर सलूंबर चले गए और अंततः अंग्रेजों ने आउवा पर कब्जा कर लिया।
4. कोटा में जन-विद्रोह (अक्टूबर 1857)
- राजस्थान में अन्य जगहों पर मुख्य रूप से सैनिकों ने विद्रोह किया था, लेकिन कोटा (Kota) में यह विद्रोह एक भीषण जन-विद्रोह (Popular Revolt) का रूप ले लिया।
- घटना: 15 अक्टूबर 1857 को कोटा के सैनिकों और आम जनता ने मिलकर पॉलिटिकल एजेंट मेजर बटन, उसके दो पुत्रों और एक डॉक्टर की हत्या कर दी और पूरे शहर पर कब्जा कर लिया।
- नेतृत्व: इस विद्रोह का नेतृत्व मुख्य रूप से दो स्थानीय अधिकारियों— जयदयाल और मेहराब खान— ने किया था। क्रांतिकारियों ने कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को उनके ही राजमहल में बंधक बना लिया था। लगभग 6 महीने तक कोटा शहर पूरी तरह से क्रांतिकारियों के नियंत्रण में रहा, जिसे बाद में मार्च 1858 में करौली के राजा की सेना की मदद से अंग्रेजों ने पुनः अपने अधिकार में लिया।
5. राजस्थान में क्रांति की असफलता के कारण
- सहयोग का अभाव: राजस्थान के अधिकांश राजाओं (जैसे जयपुर, उदयपुर, बीकानेर, करौली आदि) ने अंग्रेजों का साथ दिया और क्रांतिकारियों की मदद नहीं की।
- केंद्रीय नेतृत्व का न होना: क्रांति का कोई एक केंद्रीय और कुशल नेतृत्वकर्ता नहीं था, जिससे सभी रियासतों के क्रांतिकारी अलग-अलग दिशा में लड़ते रहे।
- संसाधनों की कमी: क्रांतिकारियों के पास आधुनिक हथियार, संचार साधन और धन की भारी कमी थी, जबकि अंग्रेजों के पास विशाल सेना और आधुनिक तकनीक थी।
📝 RBSE कक्षा 8 मॉडल प्रश्न पत्र - 2027
विषय: हमारा राजस्थान (कक्षा 8)
अध्याय 2: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम और राजस्थान
पूर्णांक: 25 अंक | समय: 45 मिनट
खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (Multiple Choice Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 1 अंक - कुल 4 अंक)
खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (Very Short Answer Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 1 अंक - कुल 4 अंक)
खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 3 अंक - कुल 9 अंक)
- नसीराबाद: 28 मई 1857 को यहाँ के सैनिकों ने अंग्रेजी सेना के अविश्वास से नाराज होकर विद्रोह कर दिया, ब्रिटिश अधिकारियों पर हमले किए और हथियारों पर कब्जा करके दिल्ली रवाना हो गए।
- नीमच: 3 जून 1857 को हीरा सिंह और मोहम्मद अली बेग के नेतृत्व में सैनिकों ने बगावत की, छावनी में आग लगाई और अंग्रेजों को भागने पर विवश कर दिया।
- ठाकुर कुशाल सिंह ने जोधपुर की शाही सेना और ब्रिटिश सेना को बिथौड़ा और चेलावास के युद्धों में धूल चटा दी थी।
- यह विद्रोह इस बात का प्रमाण था कि मारवाड़ के सामंत और जनता अंग्रेजों के विरुद्ध कितनी मजबूती से खड़े हो सकते थे।
- 1818 की सहायक संधियों के कारण वे अंग्रेजों के प्रति वफादार रहने के लिए कानूनी और नैतिक रूप से बंधे हुए थे।
- उन्हें डर था कि यदि वे अंग्रेजों के खिलाफ जाएंगे तो उनकी रियासतें छिन जाएंगी।
- राजाओं को लगता था कि ब्रिटिश सत्ता अधिक शक्तिशाली है और क्रांतिकारियों की जीत असंभव है।
खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
(प्रत्येक प्रश्न 4 अंक - कुल 8 अंक)
प्र.12 कोटा में हुए 1857 के जन-विद्रोह का विस्तार से वर्णन कीजिए। यह अन्य छावनियों के विद्रोह से किस प्रकार भिन्न था?
- विद्रोह का स्वरूप: कोटा का विद्रोह केवल सैनिकों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें शहर की आम जनता ने भी खुलकर भाग लिया, इसलिए इसे 'जन-विद्रोह' कहा जाता है।
- घटना: 15 अक्टूबर 1857 को जयदयाल और मेहराब खान के नेतृत्व में विद्रोही जनता और सैनिकों ने पॉलिटिकल एजेंट मेजर बटन और उसके बेटों की हत्या कर दी।
- महाराव की स्थिति: कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को क्रांतिकारियों ने उनके ही महल में नजरबंद कर लिया था।
- भिन्नता: अन्य जगहों पर विद्रोह मुख्य रूप से सैनिक छावनियों (नसीराबाद, नीमच आदि) तक सीमित थे, जबकि कोटा में जनता ने लगभग 6 महीने तक प्रशासन अपने हाथ में रखा, जो यहाँ की विशेषता थी।
प्र.13 1857 की क्रांति के असफल होने के क्या कारण थे? राजस्थान के संदर्भ में इसके परिणामों का विश्लेषण कीजिए।
असफलता के कारण:
- राजाओं का असहयोग: राजपूताना के शासकों ने क्रांतिकारियों का साथ देने के बजाय अंग्रेजों को सैन्य व आर्थिक मदद दी।
- एकता व नेतृत्व की कमी: क्रांतिकारियों के पास कोई सर्वमान्य सर्वोच्च नेता नहीं था।
- संसाधनों की असमानता: अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार, रेल, तार व्यवस्था और प्रशिक्षित सेना थी, जो क्रांतिकारियों के पास नहीं थी।
परिणाम: क्रांति भले ही असफल हो गई, लेकिन इसने राजपूताना की जनता में स्वतंत्रता की अलख जगाई। भविष्य के राष्ट्रीय आंदोलनों और किसान-प्रजामंडल आंदोलनों के लिए इस क्रांति ने एक मजबूत प्रेरणा का काम किया।

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