नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 23: धनिष्ठा नक्षत्र | Dhanishta Nakshatra | अष्ट वसु, डमरू नाद और अक्षय ऐश्वर्य,

नक्षत्र पुराण संहिता • अध्याय २३

धनिष्ठा नक्षत्र

ब्रह्मांडीय डमरू का नाद और अष्ट वसुओं का ऐश्वर्य

नाद • धन • पराक्रम • संगीत • अष्ट वसु • मंगल चेतना

१. नक्षत्र का मूल परिचय

राशि चक्र में स्थिति:
२३° २०' मकर राशि से ०६° ४०' कुंभ राशि तक (यह राशि चक्र का सातवां मुख्य संधिकाल है, जहाँ शनि का स्थायित्व मंगल की गति से मिलता है)।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
मंगल (प्रचंड साहस, भूमि बल, और पराक्रम का स्वामी)।
अधिष्ठाता देव:
अष्ट वसु (Eight Vasus - ब्रह्मांड के आठ तत्ववाचक रक्षक देव— धरणी, अध्वर, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास, जो ऐश्वर्य और निवास के देव हैं)।
तत्व:
आकाश/पृथ्वी संधिकाल (अत्यधिक नादमयी, धन-आकर्षक, और संगीत प्रधान प्रकृति)।
वर्ण:
कृषक/वैश्य (वैश्विक व्यापार, संपत्ति निर्माण और वास्तुकला का सूचक)।
प्रतीक चिह्न:
भगवान शिव का डमरू (Drum), या संगीत का बांसुरी/मृदंग।
शारीरिक अंग चेतना:
पीठ का मध्य भाग, घुटने के पीछे की नसें, टखने (Ankles), और रक्त की लाल कोशिकाएं।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

धनिष्ठा नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का त्रयोविंशति श्वास और अक्षय धन का महा-नाद है। शास्त्रों में इसे 'श्रविष्ठा' (अत्यधिक प्रसिद्ध) भी कहा गया है।

जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न धनिष्ठा नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत धन-आकर्षण क्षमता', 'संगीत और लय का नैसर्गिक ज्ञान', और 'शून्य से विशाल संपत्ति (Real Estate) खड़ी करने का पराक्रम' जाग्रत होता है।

मंगल और शनि का महा-साम्राज्य योग

इसके प्रथम दो चरण मकर राशि (स्वामी: शनि, जहाँ मंगल उच्च के होते हैं) में आते हैं, जो जातक को एक अत्यंत कठोर, अनुशासित, और अचल संपत्ति (Land/Property) का बेताज बादशाह बनाते हैं। इसके अंतिम दो चरण कुंभ राशि (स्वामी: शनि) में आते हैं, जो जातक को वैश्विक संगठनों, समाज कल्याण, और अत्याधुनिक तकनीकों (जैसे रोबोटिक्स) की ओर झुकाव देते हैं। नक्षत्र स्वामी मंगल होने के कारण जातक में एक अदम्य अजेय ऊर्जा होती है।

डमरू (शून्यता) का सिद्धांत

इसका प्रतीक 'डमरू' है, जो बीच से बिल्कुल संकरा (शून्य) होता है परन्तु हिलने पर ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली नाद उत्पन्न करता है। इसका अर्थ है कि जातक अपने जीवन में भयंकर अभाव (शून्यता) से शुरुआत कर सकता है, परन्तु जब उसकी प्रतिभा का डमरू बजता है, तो वह अकूत धन (धनिष्ठा = धन की निष्ठा) और ख्याति अर्जित करता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

इन जातकों में नृत्य, संगीत, ड्रम बजाने, या वाणी की लय का गज़ब का हुनर होता है। परन्तु यदि इनका मंगल-शनि पीड़ित हो, तो इनका वैवाहिक जीवन भयंकर विवादों या अलगाव (Delay/Denial in Marriage) का शिकार हो जाता है। इन्हें रियल एस्टेट, सेनापत्य, वाद्य यंत्र निर्माण, सॉफ्टवेयर माइनिंग, और अंतरराष्ट्रीय कर प्रबंधन में सर्वोच्च सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: ८ वसुओं का प्राकट्य और प्रभास देव का दिव्य अंश (विष्णु पुराण से)

दक्ष की पुत्री वसु के गर्भ से आठ परम प्रतापी, तत्ववाचक देवता प्रकट हुए, जिन्हें 'अष्ट वसु' कहा गया। ये आठों देवता सृष्टि के भौतिक आधार (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र) के स्वामी हैं। इनमें सबसे छोटे और तेजस्वी देव थे 'प्रभास'। प्रभास देव के पास ब्रह्मांड के ऐश्वर्य को स्थिर रखने की शक्ति थी। धनिष्ठा नक्षत्र इसी अष्ट वसु मंडल की समृद्ध, नादमयी और स्थिर चेतना का साक्षात् आभामंडल है, जो जातक के जीवन में कभी धन का अभाव नहीं होने देता।

कथा २: वशिष्ठ की कामधेनु गाय की चोरी और अष्ट वसुओं को शाप (भागवत पुराण से)

एक बार प्रभास देव की पत्नी ने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में दिव्य कामधेनु गाय (नंदिनी) को देखा और उसे पाने का हठ किया। अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए प्रभास देव ने शेष सात वसुओं के साथ मिलकर उस गाय का हरण (चोरी) कर लिया। गुरु वशिष्ठ ने अपने त्रिकालदर्शी ज्ञान से जान लिया और क्रुद्ध होकर अष्ट वसुओं को शाप दे दिया, "तुमने अपनी देव-मर्यादा छोड़ी है, इसलिए तुम्हें मृत्युलोक में मनुष्य के रूप में जन्म लेना होगा।" यह कथा चेताती है कि धनिष्ठा की धन-लोलुपता यदि नीति तोड़े, तो कड़ा दण्ड मिलता है।

कथा ३: प्रभास देव का पृथ्वी पर 'भीष्म पितामह' के रूप में जन्म और अखंड प्रतिज्ञा (महाभारत से)

गुरु वशिष्ठ के शाप के कारण, आठवें वसु (प्रभास) ने शांतनु और माता गंगा के घर आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया, जो 'देवव्रत' (भीष्म पितामह) कहलाए। भीष्म का पूरा जीवन धनिष्ठा नक्षत्र के शनि-मंगल तत्व (अखंड ब्रह्मचर्य का तप, इच्छा-मृत्यु का बल, और पिता के सुख के लिए अपनी पूरी जवानी और सिंहासन को लात मार देने का प्रचंड स्वाभिमान) का साक्षात् प्रमाण है। भीष्म की प्रतिज्ञा साक्षात् डमरू के नाद की तरह अडिग थी।

कथा ४: भगवान शिव का ताण्डव नृत्य और डमरू से १४ महेश्वर सूत्रों का प्राकट्य (शिव पुराण से)

सृष्टि के प्रारंभ में, जब भगवान शिव ने आनंद ताण्डव नृत्य पूर्ण किया, तो उन्होंने सनकादि ऋषियों के ज्ञान के लिए अपने हाथ के डमरू को चौदह बार बजाया: "नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्..."॥ उस डमरू के नाद से संस्कृत व्याकरण के १४ 'महेश्वर सूत्र' (अइउण्, ऋलृक् आदि) प्रकट हुए, जो पूरी भाषा विज्ञान की नींव बने। धनिष्ठा नक्षत्र इसी डमरू नाद की साक्षात् ध्वनि-चेतना है।

कथा ५: ऋग्वेद की 'वसु सूक्त' चेतना और ऐश्वर्य का संचय (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के छठे मण्डल में अष्ट वसुओं की संयुक्त स्तुति है। ऋषि प्रार्थना करते हैं, "अग्ने व्वसुभिः सहस्रिणं..."— अर्थात हे अग्निदेव! अष्ट वसुओं के साथ आओ और हमारे घरों को अन्न, स्वर्ण, और भूमि के ऐश्वर्य से भर दो। वेदों के अनुसार, वसुओं की कृपा के बिना कोई भी मनुष्य भूमि का स्वामी (Landlord) नहीं बन सकता। धनिष्ठा जातक के भीतर यही वसु सूक्त काम करता है।

कथा ६: समुद्र मंथन से 'महालक्ष्मी के स्वर्णिम नूपुरों' (पायल) का प्राकट्य (पद्म पुराण से)

मंथन के दौरान जब महालक्ष्मी प्रकट हुईं, तो उनके चरणों में बजने वाले दिव्य स्वर्णिम नूपुर (पायल) थे, जिनकी ध्वनि से दरिद्रता भाग जाती थी। मंगल देव ने उन नूपुरों की ध्वनि को धनिष्ठा क्षेत्र में स्थापित किया। यह 'चरणों की गति से धन आकर्षित करने' के धनिष्ठा स्वभाव को सिद्ध करता है—जातक यात्राओं (Movements) से धन कमाता है।

कथा ७: इंद्र का अष्ट वसुओं की सहायता से दानवराज जम्भासुर का संहार (शतपथ ब्राह्मण से)

जब जम्भासुर ने देवताओं के रथों को रोक दिया, तब अष्ट वसुओं ने धनिष्ठा की 'आकाश-ध्वनि' का प्रयोग किया। उन्होंने अपने रथों की घंटियों से एक ऐसा प्रचंड कंपन (Resonance) पैदा किया जिससे असुरों के कान के पर्दे फट गए और वे युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गए। यह 'ध्वनि के सही उपयोग से संकट दूर करने' की धनिष्ठा कला है।

कथा ८: सती के ५१ शक्तिपीठों में माता की 'पीठ का मध्य भाग/रीढ़ की हड्डी' का गिरना (कालिका पुराण से)

सुदर्शन चक्र से कटे सती के अंगों में से, माता के शरीर का जो मुख्य ढांचा है (रीढ़ का मध्य भाग जो डमरू के आकार जैसा होता है), जिस स्थान पर गिरी, वह धनिष्ठा शक्तिपीठ बना। वहाँ साधक तान्त्रिक 'नाद अनुसंधान' और रीढ़ की हड्डी के भीतर विद्युत-प्रवाह (Neural Energy) को जाग्रत करने की घोर दीक्षा लेते हैं।

कथा ९: अर्जुन का पाशुपतास्त्र चलाकर जयद्रथ के मस्तक को समंतपंचक कुण्ड में गिराना (महाभारत से)

जब अर्जुन ने जयद्रथ का वध किया, तो कृष्ण ने चेतावनी दी थी कि 'जिसके हाथ से इसका सिर जमीन पर गिरे, उसका मस्तक फट जाएगा।' अर्जुन ने धनिष्ठा की 'अचूक मारक लय' का प्रयोग करते हुए एक के बाद एक ऐसे बाण चलाए कि जयद्रथ का कटा हुआ सिर हवा में तैरता हुआ सीधे उसके पिता की गोदी में जाकर गिरा, जो कुण्ड के पास तप कर रहे थे। पिता के खड़े होते ही सिर जमीन पर गिरा और पिता का मस्तक फट गया। यह शुद्ध गतिज गणित (Ballistics) की धनिष्ठा कला है।

कथा १०: उपनिषदों का 'नादबिन्दु' और आंतरिक डमरू ध्वनि रहस्य (नादबिन्दूषनिषद से)

नादबिन्दु उपनिषद में वर्णन है कि जब साधक अपने कान बंद करके भीतर ध्यान करता है, तो उसे सबसे पहले समुद्र की गूंज, फिर भेरी, और अंत में एक सूक्ष्म डमरू या बांसुरी का नाद सुनाई देता है। जब यह नाद जाग्रत होता है, तो साधक का मन मंगल की उग्रता से मुक्त होकर साक्षात् ब्रह्म में लीन हो जाता है। धनिष्ठा नक्षत्र इसी आंतरिक नाद का द्वार है।

कथा ११: कार्तिकेय का मयूर वाहन के नृत्य की लय को डमरू से नियंत्रित करना (स्कन्द पुराण से)

जब कार्तिकेय का मोर युद्ध जीतने के बाद प्रचंड वेग से नाचने लगा और उसके पंखों की हवा से पर्वत हिलने लगे, तब कार्तिकेय ने भगवान शिव के डमरू को लेकर एक विशेष 'ताल' (Rhythm) बजाई। डमरू की लय सुनते ही मोर का नृत्य अनुशासित और शांत हो गया। यह 'उग्र ऊर्जा को संगीत से अनुशासित करने' की धनिष्ठा क्षमता है।

कथा १२: शिव का 'नटराज' रूप और डमरू हाथ में लेकर काल चक्र को गति देना (शिव महापुराण से)

नटराज रूप में भगवान शिव के दाहिने ऊपरी हाथ में डमरू विराजमान है। शिव का यह डमरू साक्षात् समय (Time) की टिक-टिक है। जब डमरू बजता है, सृष्टि चलती है; जब डमरू रुकता है, प्रलय आता है। यह रूप सिखाता है कि धनिष्ठा जातक के पास समय को अपनी उंगलियों पर नचाने की (Timing Management) अद्भुत कला होती है।

कथा १३: ध्रुव का राजा बनकर अष्ट वसुओं के आशीर्वाद से 'अक्षय कोष' (खजाना) पाना (विष्णु पुराण से)

जब ध्रुव का साम्राज्य स्थापित हुआ, तो अष्ट वसुओं ने उनके राजकोष में आकर निवास किया। ध्रुव ने प्रजा से बहुत कम कर लिया, परन्तु फिर भी उनका खजाना कभी खाली नहीं हुआ; वह हमेशा कुबेर के भंडार की तरह भरा रहा। यह धनिष्ठा के 'अक्षय धन' (Abundant Wealth) के स्वभाव को प्रकट करता है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का अर्जुन के साथ मिलकर 'मृदंग और बांसुरी' के नाद से वृन्दावन को रस मय करना (श्रीमद्भागवत से)

शरद रास के समय, श्रीकृष्ण ने केवल बांसुरी नहीं बजाई, उन्होंने धनिष्ठा नक्षत्र के दिन अष्ट वसुओं की चेतना को जाग्रत कर हवा में एक विशेष 'मृदंग नाद' उत्पन्न किया, जिससे वृन्दावन के पशु-पक्षी भी एक विशेष लय में झूमने लगे। यह कला और संगीत के 'सामूहिक सम्मोहन' का आख्यान है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा राजा दशरथ के 'राजकोष की स्थिरता' के लिए वसु-पूजन का उपदेश (रामायण से)

ऋषि वशिष्ठ ने दशरथ को समझाया कि राजा का बल केवल सैनिकों से नहीं, उसके भूमि-राजस्व (Real Estate) और सोने के भंडार की स्थिरता से होता है। उन्होंने धनिष्ठा नक्षत्र में वसुओं की पूजा कराई जिससे अयोध्या में अकाल का भय सदा के लिए समाप्त हो गया।

कथा १६: सीता माता का रावण की लंका की रत्नजड़ित भूमि (धरती) पर पैर रखने की मर्यादा (रामायण से)

जब रावण ने सीता जी को अशोक वाटिका में रखा, तो वहाँ की भूमि सोने और मणियों से जड़ी थी (वसुओं का नकारात्मक रूप)। माता सीता ने उस वैभवशाली भूमि पर कभी अपने नंगे पैर सम्मान से नहीं रखे; वे हमेशा कुशा के आसन पर बैठती थीं। यह धनिष्ठा की स्त्री के 'भौतिक सुखों को लात मार देने वाले आत्मसम्मान' का सूचक है।

कथा १७: समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष की छाया में 'कुबेर की गुप्त निधि' का प्रकट होना (वरहा पुराण से)

मंथन के अंत में जब अष्ट वसुओं की ऊर्जा क्षीरसागर से टकराई, तो पाताल से कुबेर की आठ गुप्त निधियाँ (पद्म, महापद्म, शङ्ख, मकर आदि) प्रकट हुईं, जिन्हें देवताओं के राजकोष की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया। यह स्थिर धन की धनिष्ठा शक्ति है।

कथा १८: राधारानी का दानलीला के समय श्रीकृष्ण के 'बांसुरी के छिद्रों' (शून्यता) का रहस्य खोलना (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

राधारानी ने एक बार श्रीकृष्ण से कहा, "कान्हा! तुम इस बांसुरी को इतना प्रेम क्यों करते हो? यह तो भीतर से बिल्कुल खोखली (शून्य) है।" कृष्ण ने मुस्कुराकर कहा, "राधे! जो भीतर से पूरी तरह शून्य (अहंकार रहित) हो जाता है, मैं उसके अधरों से लगकर स्वयं उसका नाद बन जाता हूँ।" यह डमरू और बांसुरी की 'शून्यता के भीतर छिपे ऐश्वर्य' की धनिष्ठा चेतना है।

कथा १९: नल और दमयन्ती की कथा में राजा नल का पासा फेंकने की 'लय' (कौशल) (महाभारत से)

कलि के प्रभाव से मुक्त होने के बाद, जब राजा नल ऋतुपर्ण राजा से 'अक्षौहिणी पासा विद्या' सीख रहे थे, तो उन्होंने पासा फेंकने की उस विशेष 'लय और गति' (Rhythm) को पकड़ लिया, जिसके बल पर उन्होंने दोबारा जुआ खेलकर अपना खोया हुआ पूरा साम्राज्य एक क्षण में वापस जीत लिया। यह कड़े पुरुषार्थ की धनिष्ठा क्षमता है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का आनन्द को 'डमरू के नाद की तरह' शून्य होने का उपदेश (बौद्ध इतिहास से)

बुद्ध ने अपने परम प्रिय शिष्य आनन्द से कहा, "आनन्द! अपने मन को इस डमरू की तरह बनाओ—बाहर से चाहे जितना शोर (नाद) हो, भीतर से बिल्कुल खाली (मौन) रहो। जो भीतर से शून्य है, साक्षात् निर्वाण उसी का है।" यह मन को स्थिर करने की धनिष्ठा शक्ति है।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा संगीत शास्त्र के लिए 'नाद विज्ञान' (Accoustics) का निर्माण (शतपथ ब्राह्मण से)

ब्रह्मांड के मन्त्रों के सस्वर उच्चारण और वाद्य यंत्रों के निर्माण के लिए ब्रह्मा जी ने 'नाद शास्त्र' बनाया। उन्होंने धनिष्ठा नक्षत्र को इसका मुख्य स्पंदन बनाया ताकि कोई भी संगीतकार जब तक ताल (Beat) को न समझे, उसका संगीत अमर न हो सके।

कथा २२: समुद्र मंथन से 'अमृतेश्वर मंगल' का शनि चेतना द्वारा पूर्ण नियंत्रण (विष्णु पुराण से)

जब मंथन से प्रचंड ऊष्मा निकली, तो मंगल देव (धनिष्ठा के स्वामी) उग्र होने लगे। शनि देव (मकर/कुंभ के स्वामी) ने आगे बढ़कर अनुशासन का कड़ा घेरा बनाया जिससे मंगल की वह उग्रता साक्षात् 'भूमि और स्वर्ण के अक्षय भंडार' (अचल संपत्ति) में बदल गई। यह 'अचल संपत्ति योग' (Real Estate Yoga) की धनिष्ठा कला है।

कथा २३: गुरु द्रोणाचार्य द्वारा दुर्योधन को 'गदा-युद्ध की ताल' (Footwork) सिखाना (महाभारत से)

द्रोणाचार्य ने दुर्योधन को सिखाया कि गदा चलाना केवल ताकत का खेल नहीं है। यह पैरों की गति (Footwork) और पैंतरेबाज़ी की एक विशेष 'लय' (Rhythm) है। दुर्योधन इस ताल में इतना निपुण था कि भीम भी उसे आसानी से छू नहीं पाते थे। यह शारीरिक कौशल को सिद्ध करता है।

कथा २४: दुर्योधन का कुरुक्षेत्र के युद्ध के अंत में भीम की गदा के प्रहार से जांघों का टूटना (महाभारत से)

जब भीम और दुर्योधन का अंतिम युद्ध हो रहा था, तो दुर्योधन ने हवा में छलांग लगाकर भीम को छकाना चाहा। उसी क्षण श्रीकृष्ण के इशारे पर भीम ने गदा युद्ध के नियमों को तोड़कर दुर्योधन की जांघों पर वार किया (जो धनिष्ठा का शारीरिक अंग है)। दुर्योधन की जांघें टूट गईं और उसका साम्राज्य ढह गया। यह कथा चेताती है कि नियमों को तोड़ने पर धनिष्ठा का पतन भयंकर होता है।

कथा २५: सूफी मत का 'ज़िक्र' (लयबद्ध मन्त्र जाप) और उपनिषदों का ओम् नाद साम्राज्य सूत्र (कठोपनिषद से)

कठोपनिषद का सूत्र कहता है कि ओम्कार ही वह परम अक्षर है जिसे जानकर मनुष्य जो चाहे पा लेता है। सूफी मत में 'ज़िक्र' का अर्थ है अल्लाह के नाम का एक विशेष लय और सांसों की गति (Rhythmic Chanting) के साथ जाप करना, जिससे साधक के भीतर साक्षात् 'बरकत' (ऐश्वर्य) जाग्रत होती है। धनिष्ठा नक्षत्र इसी ज़िक्र का साक्षात् डमरू है।

कथा २६: डमरू के दोनों तलों के बीच बंधे धागे की घुंडी का चमड़े पर प्रहार (नाद-विज्ञान मत)

एक डमरू के बीच में एक धागा बंधा होता है जिसके दोनों छोरों पर पत्थर या लकड़ी की छोटी घुंडियां होती हैं। जब डमरू को हाथ से हिलाया जाता है, तो वे घुंडियां बारी-बारी से दोनों तलों (चमड़े) पर प्रहार करती हैं और एक गूंजता हुआ नाद पैदा होता है। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'जीवन के दोनों छोरों (सुख-दुख) के थपेड़े ही तुम्हारी सोई हुई ख्याति (नाद) को जगाएंगे'।

कथा २७: अष्ट वसुओं का परम महा-मंगल चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, ऐश्वर्य और तत्वों के आठों देवता वसु ब्रह्मांड के समस्त धनों, डमरूओं, और भूमियों के रहस्यों को समेटकर साक्षात् 'परम महा-मंगल शून्य' (अनंत पराक्रमी प्रकाश) में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई खजाना बचता है, न कोई ताल। केवल एक अखंड, शांत ओज शेष रहता है। यह धनिष्ठा नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ओम् व्वसोः पवित्रेरसि शतधारम् व्वसोः पवित्रेरसि सहस्रधारम्। देवस्त्वा सविता पुनातु व्वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्त्वा कामधुक्षः मङ्गलम्॥

पौराणिक मन्त्र

ओम् धनिष्ठाधिपतिं अष्टवसुं देवं ऐश्वर्यप्रदायकम्। धन-संगीत-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं शिवडमरूनादस्वरूपिणम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ओम् गं धनिष्टानक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् मन् मङ्गलाय नमः॥
विधि:

धनिष्ठा नक्षत्र वाले दिन मंगलवार (या जब चन्द्रमा मकर/कुंभ राशि में हों) शाम के समय घर के मंदिर में तांबे या लकड़ी का एक छोटा डमरू स्थापित करें। कुश या लाल आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें। जाप के बाद उस डमरू को सात बार बजाएं (नाद करें) और साक्षात् भगवान कालभैरव या शिव जी की कपूर से आरती करें। गरीबों को मसूर की दाल या गुड़ दान करें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

आंतरिक शून्यता से न डरें

(Embrace the Vacuum): डमरू के प्रतीक के कारण आपके जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आएंगी जहाँ आपको लगेगा कि आप पूरी तरह 'खाली' (Zero) हो चुके हैं, चाहे वह धन का मामला हो या संबंधों का।

जीवन बदलने का सूत्र है— "इस शून्यता को अपना वरदान समझें; जब डमरू पूरी तरह खाली होता है, तभी वह सबसे मधुर नाद (सफलता) पैदा करता है।" नए सिरे से शुरुआत करें, अष्ट वसु आपके साथ हैं।

वैवाहिक जीवन में जिद्दीपन का त्याग

(Avoid Rigidity in Marriage): मंगल और शनि के संधिकाल के कारण आपके भीतर अपने जीवनसाथी (Partner) पर पूर्ण नियंत्रण रखने या अत्यधिक जिद्दी होने की भयंकर प्रवृत्ति होती है, जिससे आपका घर नरक बन जाता है।

अपने वैवाहिक जीवन में लचीलापन और मधुरता लाएं।

संगीत या कला से जुड़ें

आपकी असली ताकत आपकी वाणी की लय और रचनात्मकता है। प्रतिदिन ५ मिनट कोई भी वाद्य यंत्र बजाएं, संगीत सुनें, या गुनगुनाएं। यह आपके उग्र मंगल को शांत कर साक्षात् स्थिर लक्ष्मी (Real Estate Wealth) का वास कराएगा।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

नक्षत्र बनने का इतिहास:

जब अष्ट वसुओं ने भीष्म पितामह के रूप में पृथ्वी पर अवतरण कर अपनी 'अखंड प्रतिज्ञा' और त्याग से क्षत्रिय मर्यादा को अमर कर दिया, और जब शिव के डमरू से १४ महेश्वर सूत्र प्रकट हुए, तब ब्रह्मा जी ने मकर और कुंभ राशि के इस परम पराक्रमी संधिकाल पर 'धनिष्ठा' (चमकता हुआ डमरू जैसा चार तारों का समूह/Delphinus-Sualocin) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार अष्ट वसुओं तथा मंगल को सौंपा।

१. नक्षत्र वनस्पति उपाय

इसका पूज्य वृक्ष 'शमी' (खेजड़ी) का वृक्ष है जो शनि का वास माना जाता है। धनिष्ठा नक्षत्र के दिन शमी के वृक्ष की जड़ में मीठा जल (मिश्री युक्त) चढ़ाएं। मंगलवार या शनिवार को इसके वृक्ष के पास चमेली के तेल का दीपक जलाना जातक के वैवाहिक विवादों, अचल संपत्ति की रुकावटों (Property Disputes), और ऋण (कर्ज) को तत्काल नष्ट कर देता है।

२. डमरू महा-उपाय

इस नक्षत्र के दिन पीतल या तांबे का एक छोटा डमरू खरीदकर उसे साक्षात् शिव मंदिर में शिवलिंग के पास अर्पित कर आएं। यह आपके करियर में आने वाले अचानक उतार-चढ़ाव (Ups & Downs) को रोककर साक्षात् स्थिर ख्याति का योग बना देगा।

३. मल्ल-सेवा महा-उपाय

धनिष्ठा नक्षत्र के दिन किसी व्यायामशाला (Gym) या अखाड़े में जाकर पहलवानों/खिलाड़ियों को चना-गुड़ या फल दान करना, अथवा हनुमान जी को चोला चढ़ाना आपके मंगल के समस्त अशुभ फलों को एक क्षण में भस्म कर साक्षात् चक्रवर्ती राजयोग जगा देता है।

॥ नक्षत्र पुराण संहिता ॥

॥ श्री नरेन्द्रम नक्षत्र पुराण संहिता - भाग ७ (अध्याय २१ से २३) : सम्पूर्णतः समाप्तः ॥

॥ ओम् तत्सत् ॥

॥ ओम् नमो नारायणाय ॥

॥ शुभं भवतु ॥

लेखक: नरेन्द्र पंचारिया

सीख:
"जब शततारका की सौ जड़ी-बूटियाँ अवचेतन के विष को सोख लेती हैं, तब आत्मा समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करती है।"

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