नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 27: रेवती नक्षत्र | Revati Nakshatra | पूषा, बुध और मोक्ष चेतना

नक्षत्र पुराण संहिता

अध्याय २७: रेवती नक्षत्र

चेतना का अंतिम विसर्जन और पूषा की यात्रा चेतना

१. नक्षत्र का मूल परिचय

राशि चक्र में स्थिति:
मीन राशि (१६° ४०' से ३०° ००' तक) — यह पूरे भचक्र/राशि चक्र का सबसे अंतिम बिंदु और महा-गंडांत संधिकाल है।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
बुध — कुशाग्र बुद्धि, व्यापारिक चातुर्य, भाषा ज्ञान और हिसाब-किताब का स्वामी।
अधिष्ठाता देव:
पूषा (Pushan) — १२ आदित्यों में से एक, यात्राओं के देवता, पशुओं के रक्षक और भटके हुए जीवों को सही मार्ग दिखाने वाले देव।
तत्व:
जल — अत्यंत कोमल, रसमय, सुरक्षात्मक और पूर्णतः विसर्जनकारी।
वर्ण:
शूद्र — निस्वार्थ परमार्थ, समाज सेवा और कलात्मक पूर्णता का सूचक।
प्रतीक चिह्न:
एक भव्य तैरती हुई नाव (Drum/Boat), या समुद्र में चलने वाला विशाल जहाज।
शारीरिक अंग चेतना:
पैरों के पंजे (Feet), पैर के अंगूठे और शरीर की अंतिम तरल ग्रंथियां।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

रेवती नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का सप्तविंशति श्वास और आत्मा का महा-विसर्जन है। ज्योतिष में इसे 'अंतिम गंडमूल' नक्षत्र माना जाता है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न रेवती नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत कलात्मक सौंदर्य', 'विदेशी यात्राओं से प्रचुर धन कमाने की बुद्धि', 'अगाध करुणा' और 'शून्य में विलीन होने की तड़प' जाग्रत होती है।

बुध और बृहस्पति का परम मोक्ष राजयोग: यह नक्षत्र पूर्ण रूप से मीन राशि (स्वामी: बृहस्पति - ज्ञान) के भीतर समाप्त होता है, परन्तु इसका अपना स्वामी बुध (बुद्धि) है। गुरु के मोक्ष के घर में जब बुध अपनी पूरी व्यापारिक और कलात्मक चेतना लेकर बैठता है, तो जातक साक्षात् 'महालक्ष्मी' का रूप बनता है। रेवती का अर्थ ही है—'धनवान', 'समृद्ध', या 'परम रूपवती'।
नाव (जहाज) का सिद्धांत: इसका प्रतीक 'नाव' है। जिस प्रकार एक नाव मनुष्य को नदी या सागर के इस पार से उस पार (भवसागर पार) ले जाती है, वैसे ही रेवती जातक लोगों के संकटों को दूर करने वाला 'तटस्थ नाविक' (Saviour) होता है। यह प्रतीक यह भी दर्शाता है कि जातक को विदेशी व्यापार (Import-Export) और लंबी यात्राओं से अकूत धन मिलता है।

महत्वपूर्ण तथ्य: ये जातक बहुत कोमल स्वभाव के, जानवरों से अगाध प्रेम करने वाले (Animal Lovers), और बहुत अच्छे लेखक या कलाकार होते हैं। परन्तु चूँकि यह राशि चक्र का अंतिम बिंदु (३०°) है, इसलिए इनके जीवन में एक बार सब कुछ पूरी तरह विसर्जित (शून्य) होकर नए सिरे से शुरुआत (मेष-अश्विनी में) होती है। इन्हें अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विमानन (Aviation), टूर एंड ट्रेवल्स, अभिनय, संगीत और अध्यात्म में वैश्विक सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: १२ आदित्यों में 'पूषा' देव का प्राकट्य और पशु-रक्षक रूप (विष्णु पुराण से)

देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न १२ आदित्यों में से 'पूषा देव' साक्षात् 'पोषण', 'यात्राओं की सुरक्षा', 'पशु-धन की रक्षा' और 'भटके हुए जीवों को सही मार्ग दिखाने' के देवता बने। ब्रह्मा जी ने उन्हें ब्रह्मांड के उन सभी मार्गों का स्वामी बनाया जहाँ से आत्माएं यात्रा करती हैं। पूषा देव के पास कोई दांत नहीं हैं; वे केवल पिसा हुआ अन्न (लपसी/दलिया) ग्रहण करते हैं, जो उनके परम कोमल और दयालु स्वभाव को दर्शाता है। रेवती नक्षत्र इसी पूषा देव की रसमय, पोषक और सुरक्षात्मक चेतना का साक्षात् मुकुट है।

कथा २: दक्ष यज्ञ विध्वंस में वीरभद्र द्वारा पूषा देव के सारे दांत तोड़ना (शिव पुराण से)

जब राजा दक्ष ने शिव का अपमान किया और पूषा देव ने उस सभा में बैठकर शिव की निंदा सुनकर अपने दांत दिखाकर उपहास किया (हंसे), तो शिव के क्रोध से प्रकट हुए वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस करते हुए पूषा देव को दबोच लिया। वीरभद्र ने अपने घूंसे के प्रचंड प्रहार से पूषा देव के मुख के सारे दांत तोड़ दिए (उन्हें दंतहीन कर दिया)। बाद में जब शिव शांत हुए, तो उन्होंने पूषा को आशीर्वाद दिया कि तुम बिना दांतों के भी पूरी सृष्टि का पोषण करोगे। यह कथा चेताती है कि रेवती नक्षत्र के जातक को अपनी वाणी और हँसी में कभी किसी का अपमान (कटु वक्ता) नहीं करना चाहिए, अन्यथा बुध का मंदा फल मिलता है।

कथा ३: सुदर्शन चक्र द्वारा माता सती के मृत शरीर का विसर्जन और महा-शांति (भागवत पुराण से)

जब भगवान शिव सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भटक रहे थे और प्रलय आने वाला था, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को ५१ भागों में काट दिया (विसर्जन किया)। जैसे ही सती के अंग पृथ्वी पर गिरे, शिव का विक्षोभ शांत हुआ और वे घोर समाधि में चले गए। यह 'कष्टों के अंतिम विसर्जन और नई शुरुआत' की रेवती चेतना का साक्षात् प्रमाण है।

कथा ४: भगवान विष्णु का 'मत्स्य अवतार' और राजा सत्यव्रत की नाव को भवसागर से पार लगाना (मत्स्य पुराण से)

महाप्रलय के समय जब पूरी पृथ्वी समुद्र के जल में डूब रही थी, तब भगवान विष्णु ने 'मत्स्य' (विशाल मछली) के रूप में अवतार लिया। उन्होंने राजा सत्यव्रत, सप्तऋषियों और वेदों को एक विशाल नाव (जहाज) पर बिठाया और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर उस नाव को अपने सींग से बांध लिया। मत्स्य भगवान ने उस नाव को प्रलय के थपेड़ों से बचाकर सुरक्षित किनारे लगाया। यह नाव का प्रतीक साक्षात् रेवती नक्षत्र का मुख्य आधार है—डूबते हुए संसार को बचाना।

कथा ५: ऋग्वेद की 'पूषन सूक्त' चेतना और खोए हुए पशुओं की खोज का मन्त्र (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के छठे मण्डल में पूषन सूक्त का सुंदर वर्णन है: "सम्पूषन्विदुषा नय यो अञ्जसाशुशासति..."—अर्थात हे पूषा देव! हमारे मार्गों को सुरक्षित करो, चोरों को दूर भगाओ, और हमारे जो पशु (गाएं) जंगलों में खो गए हैं, उन्हें सही मार्ग दिखाकर वापस घर ले आओ। वेदों के अनुसार, जब भी कोई वस्तु या व्यक्ति मार्ग भटक जाता है, तो पूषन सूक्त के जाप से उसे तुरंत सही रास्ता मिल जाता है। रेवती जातक के भीतर यही 'मार्गदर्शक' (Guide) तत्व वास करता है।

कथा ६: समुद्र मंथन के अंत में 'अमृत कलश' का देवताओं के विमानों (नावों) द्वारा देवलोक ले जाना (पद्म पुराण से)

जब मोहिनी रूप धरे विष्णु ने देवताओं को अमृत पिला दिया, तो इन्द्र और देवताओं ने अमृत के कलश को आकाश मार्ग से चलने वाली उड़ती हुई नावों (विमानों) में रखा और अमरावती ले गए। यह 'सफलता की यात्रा और धन के सुरक्षित संचय' के रेवती स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा ७: इंद्र का अकाल के समय पूषा देव की गौ-शाला से पूरी सृष्टि के लिए अन्न पाना (शतपथ ब्राह्मण से)

जब पृथ्वी पर भयंकर सूखा पड़ा और देवताओं के यज्ञ बंद हो गए, तब इन्द्र पूषा देव के पास गए। पूषा देव ने अपनी दिव्य गौ-शाला और अन्न भंडारों के द्वार खोल दिए जिससे मनुष्यों और पशुओं का पेट भरा। यह 'अकाल के समय भी अन्नदाता बनने' की रेवती क्षमता को प्रकट करता है।

कथा ८: सती के ५१ शक्तिपीठों में माता के 'दोनों पैरों के पंजे' (Feet) का गिरना (कालिका पुराण से)

सुदर्शन चक्र से कटे सती के अंगों में से, पूरे भचक्र का अंतिम बिंदु—माता के दोनों पैरों के पंजे जिस स्थान पर गिरे, वह रेवती शक्तिपीठ बना। यहाँ साधक अपने जीवन के सारे पापों का विसर्जन कर 'परम पद' (मोक्ष) पाने के लिए तान्त्रिक 'विसर्जन दीक्षा' लेते हैं।

कथा ९: अर्जुन का कुरुक्षेत्र के युद्ध के सबसे अंत में गांडीव धनुष को अग्निदेव के जल में विसर्जित करना (महाभारत, महाप्रस्थानिक पर्व से)

महाभारत युद्ध और द्वारका के विलाप के बाद, जब पाण्डव हिमालय की ओर महाप्रस्थान कर रहे थे, तो मार्ग में अग्निदेव प्रकट हुए। उन्होंने अर्जुन से कहा, "अर्जुन! तुम्हारा कार्य पूरा हुआ। अब इस गांडीव धनुष और अक्षय तरकश को पुनः वरुण के जल में विसर्जित (Return) कर दो।" अर्जुन ने सहर्ष अपने अस्त्रों को जल में फेंक दिया। यह 'कर्मों के फल और हथियारों को सहर्ष त्याग देने' की रेवती वैराग्य कला है।

कथा १०: उपनिषदों का 'नदी का समुद्र में विलीन होना' महा-विसर्जन रहस्य (मुण्डकोपनिषद से)

मुण्डक उपनिषद का अमर सूत्र कहता है: "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्री..."—अर्थात जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ अंत में समुद्र में पहुँचकर अपना नाम और रूप छोड़कर साक्षात् समुद्र ही बन जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष अपने अहंकार (नाम-रूप) को छोड़कर परम ब्रह्म में विलीन हो जाता है। रेवती नक्षत्र इसी महा-विलीनीकरण का साक्षात् द्वार है।

कथा ११: कार्तिकेय का मयूर वाहन को शांत कर उसे 'परम मौन' की स्थिति में लाना (स्कन्द पुराण से)

संसार के सारे युद्धों को जीतने के बाद, कार्तिकेय ने अपने छहों मुखों की मारक चेतना को शांत किया। उन्होंने अपने मोर को सहलाया और उसे पूरी तरह शांत कर दिया। मोर ने पंख समेट लिए। यह 'युद्ध कला के अंत और शांति के उदय' के रेवती संधिकाल को दर्शाता है।

कथा १२: शिव का 'सदाशिव' रूप और प्रलय के जल के ऊपर शांत ध्यान (शिव महापुराण से)

जब महाप्रलय में पूरी सृष्टि जलमग्न हो जाती है, तब भगवान शिव अपने उग्र रुद्र रूप को त्यागकर 'सदाशिव' बन जाते हैं। वे प्रलय के शांत जल के ऊपर निराकार होकर तैरते हैं। यह रूप सिखाता है कि रेवती जातक हर उथल-पुथल के अंत में परम शांति (Zero) को प्राप्त कर लेता है।

कथा १३: ध्रुव का देवलोक के विमान (नाव) पर बैठकर साक्षात् 'ध्रुव लोक' की ओर महा-प्रयाण (विष्णु पुराण से)

जब ध्रुव की आयु पूर्ण हुई, तो साक्षात् भगवान विष्णु का दिव्य विमान (आकाशीय नाव) उन्हें लेने पृथ्वी पर उतरा। ध्रुव ने मृत्यु के मस्तक पर पैर रखा और उस विमान पर सवार होकर आकाश के पार चले गए जहाँ वे 'ध्रुव तारा' बने। यह 'जीवन की यात्रा के गौरवशाली अंत' का आख्यान है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का यदुवंश के विनाश के बाद पीपल के वृक्ष के नीचे पैर पर बाण झेलकर देहत्याग (श्रीमद्भागवत से)

द्वारका के अंत के समय, श्रीकृष्ण प्रभास क्षेत्र में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्होंने अपने बाएँ पैर के पंजे (जो रेवती का अंग है) को दाहिनी जांघ पर रखा था। जरा नामक व्याधे ने दूर से कृष्ण के पैर के चमकते पद्म-चिह्न को हिरण की आँख समझकर 'बाण' चला दिया। बाण पैर में लगा। श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर व्याधे को क्षमा किया और सशरीर साक्षात् गोलोक धाम को प्रस्थान कर गए। यह 'अवतार लीला के पूर्ण विसर्जन' की परम रेवती कथा है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा श्रीराम को 'संसार रूपी भवसागर को पार करने की नाव' (ज्ञान) का दान (योगवासिष्ठ से)

योगवासिष्ठ के अंत में ऋषि वशिष्ठ ने श्रीराम से कहा, "राम! यह संसार साक्षात् एक भयंकर महासागर है, जहाँ मोह की लहरें उठती हैं। मेरा यह ज्ञान साक्षात् वह नाव (जहाज) है, जिस पर बैठकर तुम इस भवसागर को खेल-खेल में पार कर लोगे।" राम परम शांत हुए।

कथा १६: सीता माता का लव-कुश को श्रीराम को सौंपकर धरती माँ की गोद (पाताल) में विसर्जन (रामायण से)

जब लव-कुश ने रामायण का गान किया और श्रीराम ने सीता जी को पुनः स्वीकार करना चाहा, तो माता सीता का इस भौतिक संसार से मोह पूरी तरह भङ्ग हो चुका था। उन्होंने अपनी दोनों आँखें बंद कीं और धरती माता की गोदी में बैठकर पाताल में चली गईं। यह 'संसार के दुखों से पूर्णतः मुक्त होकर अपने मूल तत्व में विलीन हो जाने' का सूचक है।

कथा १७: समुद्र मंथन के सबसे अंत में 'क्षीरसागर का पुनः शांत' होकर स्थिर होना (वरहा पुराण से)

जब अमृत, लक्ष्मी, धन्वन्तरि आदि १४ रत्न बाहर निकल गए और देवताओं-असुरों का विवाद शांत हुआ, तब वह खौलता हुआ क्षीरसागर पुनः अपनी मूल स्थिति में आकर बिल्कुल शांत, शीतल और दूध की तरह श्वेत होकर स्थिर हो गया। यह 'कर्मों के चक्रवात के अंत' के रेवती स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा १८: राधारानी का गोलोक धाम में श्रीकृष्ण के साथ 'शाश्वत एकाकार' होना (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

पृथ्वी की लीला पूर्ण होने के बाद, राधारानी का शरीर पंचतत्वों में विलीन नहीं हुआ। वे साक्षात् एक दिव्य ज्योतिपुंज बनीं और श्रीकृष्ण के हृदय (वक्षस्थल) के भीतर सदा के लिए विलीन (Merged) हो गईं। राधा और कृष्ण पुनः एक हो गए। यह आत्मा का परमात्मा में 'पूर्ण महा-विलय' है।

कथा १९: पांडवों का 'महाप्रस्थान' और एक-एक करके द्रौपदी व भाइयों का शरीर छूटना (महाभारत से)

युधिष्ठिर के नेतृत्व में जब पांचों पांडव और द्रौपदी हिमालय की बर्फीली चोटियों की ओर जा रहे थे, तो मार्ग में सबसे पहले द्रौपदी, फिर सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम का शरीर एक-एक करके छूटता गया (विसर्जन होता गया)। केवल युधिष्ठिर का धर्म जीवित रहा। यह 'भौतिक शरीर के अंतिम विसर्जन' की रेवती चेतना है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का आनन्द से कहना कि 'दीपक की लौ की तरह बुझ जाना ही निर्वाण है' (बौद्ध इतिहास से)

अपने अंतिम क्षणों में बुद्ध ने आनन्द से कहा, "आनन्द! रोओ मत। जैसे एक दीपक का तेल समाप्त होने पर उसकी लौ स्वतः हवा में विलीन हो जाती है और कोई नहीं बता सकता कि वह लौ कहाँ गई, वैसे ही मेरा यह वजूद भी शून्य में विलीन हो रहा है। 'अप्प दीपो भव' (अपने दीपक स्वयं बनो)।"

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा पूरे २७ नक्षत्रों के चक्र की पूर्णता पर 'भचक्र शुद्धि' का नियम (शतपथ ब्राह्मण से)

अश्विनी से शुरू होकर रेवती तक जब २७ नक्षत्रों का चक्र पूर्ण होता है, तो ब्रह्मा जी ने नियम बनाया कि यहाँ आत्मा के पिछले सभी २७ जन्मों के कर्मों का हिसाब-किताब (Audit) बुध की बुद्धि द्वारा किया जाएगा, जिसके बाद ही उसे अगले उच्च लोक का टिकट मिलेगा। यह 'अंतिम क्लोजिंग' (Closing of Accounts) की रेवती शक्ति है।

कथा २२: समुद्र मंथन से 'अमृतेश्वर बुध' का बृहस्पति के अमृत लोक में महा-अभिषेक (विष्णु पुराण से)

जब रेवती के स्वामी बुध देव मीन राशि के गुरु-सागर में पहुँचे, तो उनका व्यापारिक लोभ पूरी तरह शांत हो गया। उन्होंने अपने चातुर्य को 'परमार्थ' (Charity) में बदल दिया जिससे वे साक्षात् 'महालक्ष्मी नक्षत्र' के अधिपति बने जो जातक को अक्षय धन देता है। यह 'बुद्धि का ज्ञान में विलीन होना' है।

कथा २३: महाराज शर्याति की पुत्री सुकन्या का अश्विनी कुमारों की नाव पर बैठकर पति को युवा बनाना (महाभारत से)

जब अश्विनी कुमार च्यवन ऋषि का कायाकल्प करने आए, तो वे सुकन्या और ऋषि को एक दिव्य प्रकाश की नाव पर बिठाकर सरोवर के मध्य ले गए थे, जहाँ स्नान के बाद वृद्ध ऋषि पुनः युवा हुए। यह 'कष्टों की नदी को पार कराने वाली नाव' की रेवती चेतना है।

कथा २४: युधिष्ठिर का सशरीर स्वर्ग के द्वार पर पहुँचना और यमराज के कुत्ते के साथ प्रवेश (महाभारत से)

हिमालय की यात्रा के अंत में केवल युधिष्ठिर जीवित बचे। उनके साथ एक कुत्ता (जो वास्तव में यमराज/धर्मराज का रूप था) चल रहा था। जब देवराज इन्द्र ने विमान रोककर कहा, "इस कुत्ते को बाहर छोड़ दो, यह स्वर्ग में नहीं आ सकता," तो युधिष्ठिर ने कहा, "जिसने संकट में मेरा साथ नहीं छोड़ा, मैं उसे छोड़कर स्वर्ग की लक्ज़री नहीं चुनूँगा।" कुत्ते ने वास्तविक रूप प्रकट किया और युधिष्ठिर का महा-विजय द्वार खुला। यह 'अंत तक वफादारी निभाने' की रेवती चेतना है।

कथा २५: सूफी मत का 'विसाल' (प्रेमी का महबूब से अंतिम मिलन) और उपनिषदों का ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः सूत्र (यजुर्वेद से)

यजुर्वेद का अमर शांति पाठ है— 'ओम् द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः...'॥ सूफी मत में 'विसाल' का अर्थ है वह अंतिम रात जब आशिक (रूह) अपने माशूक (खुदा) की बांहों में समाकर हमेशा के लिए शांत हो जाती है। रेवती नक्षत्र इसी विसाल और अखंड वैश्विक शान्ति का साक्षात् विसर्जन बिंदु है।

कथा २६: समुद्र में चलने वाले विशाल जहाज (Ship) का तूफान को चीरकर बंदरगाह (Port) पर पहुँचना (समुद्र-आचार मत)

एक विशाल मालवाहक जहाज (Merchant Ship) जब महीनों तक गहरे समुद्र के भयंकर तूफानों, लहरों और शार्क मछलियों के बीच से गुजरता है, तो वह थकता नहीं है। वह अपनी कूटनीतिक लगाम (लंगर) थामे रहता है और अंत में सही दिशा सूचक (Compass) के बल पर सुरक्षित बंदरगाह (Port) पर पहुँचकर अपना लंगर गिरा देता है और शांत खड़ा हो जाता है। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'तुम दूसरों के डूबते हुए जहाजों को किनारे लगाने वाले नाविक (Saviour) हो, कभी अपनी इस शक्ति को मत भूलना'।

कथा २७: पूषा देव का परम महा-बुध चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, यात्राओं और पोषण के देवता पूषा ब्रह्मांड की समस्त नावों, जहाजों, कलाओं और २७ नक्षत्रों की स्मृतियों को समेटकर साक्षात् 'परम महा-बुध शून्य' (अनंत ज्ञानमय महा-शून्य) में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई यात्रा बचती है, न कोई सागर। केवल एक अखंड, निर्गुण, परमानंदमयी शांति शेष रहती है। यह रेवती नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ओम् पूषन् तव व्व्रते व्वयं नरिष्येम कद्वचन शेमहि। सुसन्द् दृशस्ते व्वयगुं सपर्य्येत मुकुटाय नमो नमः। शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

पौराणिक मन्त्र

ओम् रेवत्याधिपतिं पूषणं देवं यात्रासिद्धीश्वरं शुभम्। धन-समृद्धि-मोक्षप्रदं देवं नमो नित्यं भवसागरतारकम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ओम् चं रेवतीनक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् बुं बुधाय नमः॥
विधि: रेवती नक्षत्र वाले दिन बुधवार को (विशेषकर जब चन्द्रमा मीन राशि के अंतिम अंशों २९° पर हों - रेवती गंडांत काल में) सुबह के समय कच्चे दूध में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। हरे या पीले वस्त्र धारण कर माता महालक्ष्मी या साक्षात् भगवान धन्वन्तरि का ध्यान करें। पन्ने या स्फटिक की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें। जाप के बाद तांबे के पात्र में मिश्री का पानी भरकर किसी तुलसी के पौधे या केले के वृक्ष में अर्पित करें और गरीबों को फल व हरी सब्जियां दान करें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

अतीत के विसर्जन (Past) को स्वीकार करें — Master the Art of Letting Go

चूँकि यह राशि चक्र का अंतिम बिंदु है, इसलिए आपके जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आएंगी जहाँ आपका बना-बनाया ढांचा, व्यापार या संबंध पूरी तरह विसर्जित (Zero) हो जाएगा और आपको भयंकर टीस (गंडांत पीड़ा) होगी।

जीवन बदलने का सूत्र है— "नाव की तरह बनें; किनारे से बहुत अधिक मोह मत करें, पुराने को बह जाने दें ताकि आप अगले चक्र (मेष-अश्विनी) में एक नए और भव्य रूप में जन्म ले सकें।" लेटिंग गो (Letting Go) ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।

वाणी की मधुरता बनाए रखें — No Harsh Communication

पूषा देव के दांत वीरभद्र ने तोड़े थे, इसलिए जब आप क्रोध में आते हैं, तो आप बहुत तीखा, कड़वा और दूसरों के आत्मसम्मान को कुचलने वाला बोलते हैं जिससे आपका बुध तुरंत मंदा हो जाता है और व्यापार ठप हो जाता है। हमेशा कोमल और मधुर भाषा का प्रयोग करें।

पशुओं और प्रकृति से जुड़ें — Animal Welfare

पूषा देव पशुओं के रक्षक हैं। अपने घर में कोई पालतू जानवर (जैसे कुत्ता/बिल्ली/पक्षियों) रखें, या लावारिस जानवरों की सेवा करें। आप जितना बेजुबान जीवों को पालेंगे और उनका पोषण करेंगे, आपका मीन राशि का बृहस्पति उतना ही बली होगा और आपकी तिजोरी में धन स्वतः ही खींचा चला आएगा।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

नक्षत्र बनने का इतिहास

जब भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर राजा सत्यव्रत की नाव को प्रलय के भयंकर थपेड़ों से बचाकर भवसागर पार लगा दिया और वेदों की रक्षा की, और जब राधारानी श्रीकृष्ण के हृदय में विलीन होकर अखंड परमानंद बनीं, तब ब्रह्मा जी ने पूरे भचक्र के अंतिम शिखर बिंदु (३०° मीन राशि) पर 'रेवती' (समुद्र में तैरते जहाज जैसी ३२ तारों की भव्य शृंखला/Piscium-Zeta Piscium) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार पूषा देव तथा बुध को सौंपा ताकि हर भटकती हुई आत्मा भवसागर पार कर मोक्ष पा सके।

अचूक उपाय

१. नक्षत्र वनस्पति उपाय

इसका पूज्य वृक्ष 'महुआ' (Madhuca Longifolia - जिसके फूलों से मीठा रस और औषधि बनती है) है। रेवती नक्षत्र के दिन महुआ का पौधा किसी पवित्र तालाब, नदी के किनारे या मंदिर में लगाएं। बुधवार को इसकी जड़ में मीठा जल चढ़ाना जातक के त्वचा रोगों, हॉर्मोनल असंतुलन और गंडमूल के समस्त अशुभ दोषों को तत्काल दूर कर देता है।

२. तामसिक ऋण मुक्ति महा-उपाय

इस नक्षत्र के दिन तांबे के एक छोटे पत्र पर 'महालक्ष्मी रेवती यन्त्र' अंकित करवाकर उसे बुधवार को हरे कपड़े में लपेटकर अपनी तिजोरी या व्यावसायिक गल्ले में स्थापित करें। यह व्यापार में होने वाले अचानक नुकसान और उतार-चढ़ाव को रोककर अचल और स्थिर लक्ष्मी का वास कराता है।

३. नाव महा-उपाय (भवसागर तारण)

हर बुधवार या रेवती नक्षत्र के दिन कांस्य (कांसा) या तांबे के एक छोटे कटोरे में शुद्ध घी भरकर उसमें अपना चेहरा देखें (छाया पात्र दान करें), और फिर उसमें पांच कपूर की टिकिया रखकर किसी शिव मंदिर के पुजारी को दान कर दें, अथवा किसी नदी में नाव चलाने वाले नाविक (Boatman) को अन्न और धन का दान करें। यह आपके प्रारब्ध के बड़े से बड़े राजकीय संकटों, अचानक आने वाली एक्सीडेंटल विपदाओं और पीढ़ियों पुराने ऋण (कर्ज) को एक क्षण में भस्म कर साक्षात् चक्रवर्ती राजयोग जगा देता है।

॥ नक्षत्र पुराण संहिता ॥

॥ श्री नरेन्द्रम नक्षत्र पुराण संहिता - भाग ८ (अध्याय २४ से २७) : सम्पूर्णतः समाप्तः ॥

॥ श्री २७ नक्षत्र पुराण आख्यान खण्ड : पूर्णतः सम्पूर्णम् ॥

॥ ओम् तत्सत् ॥

॥ ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

॥ शुभं भवतु ॥

लेखक: नरेन्द्र पंचारिया

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