नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 21: उत्तराषाढ़ा नक्षत्र | Uttara Ashadha Nakshatra | विश्वेदेव, सूर्य और चरम विजय
नक्षत्र पुराण संहिता
अध्याय २१: उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
विश्वेदेवों की सामूहिक शक्ति और चरम विजय
Uttara Ashadha Nakshatra | उत्तराषाढ़ा नक्षत्र२६° ४०' धनु राशि से १०° ००' मकर राशि तक (यह राशि चक्र का छठा मुख्य संधिकाल है, जहाँ गुरु की सात्विक अग्नि शनि के कर्म-धरातल से मिलती है)।
सूर्य (प्रचंड स्वाभिमान, अखंड सत्ता, और आत्मा के ओज का कारक)।
विश्वेदेव (Vishvedevas - ब्रह्मांड के दस दिव्य गुणवाचक सनातन देवता, जो समष्टिगत धर्म के रक्षक हैं)।
पृथ्वी (स्थिर, अत्यंत व्यावहारिक, नीति-आधारित और परिणाम-उन्मुख)।
क्षत्रिय (न्याय, शासन और अखंड चक्रवर्ती साम्राज्य का सूचक)।
हाथी का दांत (Elephant's Tusk), या एक छोटा सा पलंग/मंच (Small Bed)।
जांघें, घुटने (Knees), घुटनों की जोड़, और अस्थि मज्जा (Bone Marrow)।
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का एकविंशति श्वास और अजेय विजय का महा-शिखर है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अखंड स्वाभिमान', 'न्याय और धर्म के प्रति अडिग निष्ठा', और 'सबको साथ लेकर चलने का संगठनात्मक कौशल' जाग्रत होता है।
इसका प्रथम चरण धनु राशि (स्वामी: बृहस्पति) में आता है, जो जातक को एक महान दार्शनिक, नीतिवान राजा, या धर्मगुरु बनाता है। शेष तीन चरण मकर राशि (स्वामी: शनि) में आते हैं, जहाँ सूर्य और शनि का कड़ा धरातल मिलकर जातक को घोर अनुशासित, व्यावहारिक, और कानून के बल पर साम्राज्य खड़ा करने वाला बनाता है। नक्षत्र स्वामी सूर्य होने के कारण इसमें एक अदम्य राजसी तेज होता है।
इसका प्रतीक 'हाथी का दांत' (गजदंत) है। जिस प्रकार हाथी के दांत बाहर निकलने पर वापस अंदर नहीं जाते, वैसे ही उत्तराषाढ़ा जातक द्वारा दिया गया वचन पत्थर की लकीर होता है। यह प्रतीक यह भी दर्शाता है कि जातक अपने शत्रुओं पर प्रचंड प्रहार (Tusk Attack) कर उन्हें समूल नष्ट कर देता है।
इन जातकों में बहुत अधिक शालीनता और धैर्य होता है। ये कभी किसी के सामने झुकना पसंद नहीं करते, परन्तु कमज़ोरों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। इन्हें राजनीति (Prime Minister/President), न्यायपालिका (Chief Justice), अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, रक्षा प्रबंधन (Chief of Defense Staff), और बड़े प्रशासनिक साम्राज्यों के संचालन में सर्वोच्च सफलता मिलती है।
कथा १: १० विश्वेदेवों का प्राकट्य और ब्रह्मांडीय धर्म की रक्षा (विष्णु पुराण से)
सृष्टि के संचालन के लिए धर्मराज और प्रजापति दक्ष की पुत्री विश्वा के गर्भ से दस परम दिव्य, सात्विक और गुणवाचक देवता प्रकट हुए, जिन्हें 'विश्वेदेव' (क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, मुनि, पुरूरवा, माद्रवा और रोचमान) कहा गया। ब्रह्मा जी ने उन्हें ब्रह्मांड के नियमों, नैतिकताओं, और 'सामूहिक न्याय' का रक्षक बनाया। ये दस देवता साक्षात् सत्य, धैर्य और संकल्प के प्रतीक हैं। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र इसी विश्वेदेव मंडल की अजेय और संगठित चेतना का साक्षात् आभामंडल है, जो जातक को कभी परास्त नहीं होने देता।
कथा २: देवासुर संग्राम में विश्वेदेवों द्वारा असुरों की सेना का स्तम्भन (भागवत पुराण से)
जब महिषासुर और शुम्भ-निशुम्भ के असुरों ने देवलोक पर आक्रमण किया और इन्द्र का वज्र भी विफल होने लगा, तब दसों विश्वेदेवों ने अपनी शक्तियों को एक चक्र के रूप में संगठित किया। उन्होंने उत्तराषाढ़ा की पृथ्वी ऊर्जा का आह्वान किया, जिससे एक ऐसा अदृश्य 'धर्म-कवच' निर्मित हुआ कि असुरों के अस्त्र-शस्त्र हवा में ही स्तम्भित (जड़) होकर टूटने लगे। यह कथा दर्शाती है कि उत्तराषाढ़ा नक्षत्र का जातक जब सामूहिक शक्ति (Team Work) का उपयोग करता है, तो वह अजेय हो जाता है।
कथा ३: पांडुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर का जन्म और सत्य की अडिगता (महाभारत से)
महारानी कुन्ती ने धर्मदेव का आह्वान कर पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता 'युधिष्ठिर' को प्राप्त किया। युधिष्ठिर का पूरा जीवन उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के गुणों का साक्षात् प्रमाण है—हाथी के दांत की तरह उनका सत्य पर अडिग रहना, जुए में सब कुछ हारने के बाद भी धैर्य न खोना, और अंत तक धर्म का पालन करते हुए सशरीर स्वर्ग के तोरण द्वार तक पहुँचना। उनके सत्य के बल पर ही उनका रथ भूमि से चार उंगली ऊपर चलता था।
कथा ४: सती के क्रोध से प्रकट हुए 'दस महाविधाओं' द्वारा ब्रह्मांड का रक्षण (शिव पुराण से)
जब राजा दक्ष ने शिव का अपमान किया और सती क्रुद्ध हुईं, तो उन्होंने शिव को रोकने के लिए अपने शरीर से दस दिशाओं में दस प्रचंड देवियाँ प्रकट कीं, जिन्हें 'दस महाविद्या' (काली, तारा, छिन्नमस्ता, भुवनेश्वरी आदि) कहा गया। इन दसों देवियों की सामूहिक तान्त्रिक ऊर्जा साक्षात् विश्वेदेवों की मारक क्षमता का स्त्री-रूप थी, जिसने दक्ष के अहंकार की नींव हिला दी। यह उत्तराषाढ़ा के भीतर छिपी उस 'सामूहिक तान्त्रिक विजय' को दर्शाता है।
कथा ५: ऋग्वेद की 'विश्वेदेवा सूक्त' चेतना और समष्टिगत मन्त्र (ऋग्वेद से)
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में विश्वेदेवा सूक्त का सुंदर वर्णन है: "ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवा सगत..."—अर्थात हे ब्रह्मांड को धारण करने वाले, रक्षक विश्वेदेवों! आओ, हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाओ। वेदों के अनुसार, विश्वेदेवों की पूजा के बिना कोई भी बड़ा यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता क्योंकि वे ही व्यक्तिगत चेतना को समष्टि (Universe) से जोड़ते हैं। उत्तराषाढ़ा जातक इसी सूक्त की तरह समाज को जोड़ने वाला होता है।
कथा ६: समुद्र मंथन से 'ऐरावत हाथी के दांतों' का प्रखर ओज (पद्म पुराण से)
मंथन के दौरान जब श्वेत गजराज ऐरावत प्रकट हुआ, तो उसके चार विशाल और स्वर्णिम आभा वाले दांत (गजदंत) चमक रहे थे। विश्वकर्मा ने उन दांतों के ओज से राजाओं के राजमुकुट का मुख्य रत्न तराशा था। यह 'कठोरतम पुरुषार्थ से निकलने वाले चरम गौरव' के उत्तराषाढ़ा स्वभाव को सिद्ध करता है।
कथा ७: इंद्र का विश्वेदेवों की शरण में जाकर 'अजेय मुकुट' की पुनर्प्राप्ति (शतपथ ब्राह्मण से)
जब नहुष के शाप से मुक्त होकर इन्द्र वापस आए, तो उनके भीतर असुरक्षा का भय था। तब दसों विश्वेदेवों ने उन्हें अपने धर्म-बल का अंश दिया, जिससे इन्द्र का मुकुट पुनः स्वर्णिम तेज से चमक उठा और अमरावती के द्वार पर उनकी अजेय सत्ता स्थापित हुई। यह 'गिरे हुए आत्मसम्मान को पुनः शिखर पर ले जाने' की उत्तराषाढ़ा शक्ति है।
कथा ८: सती के ५१ शक्तिपीठों में माता की 'दाहिनी जंघा/घुटने का जोड़' का गिरना (कालिका पुराण से)
सुदर्शन चक्र से कटे सती के अंगों में से, माता के शरीर की वह हड्डी जो पूरे भार को वहन करती है (दाहिना घुटना), जिस स्थान पर गिरी, वह उत्तराषाढ़ा शक्तिपीठ बना। वहाँ साधक अपने भीतर के 'अनुशासन, धैर्य और कर्म-बल' (शनि-सूर्य संगम) को सिद्ध करने की घोर दीक्षा लेते हैं।
कथा ९: अर्जुन का कुरुक्षेत्र के मैदान में 'गांडीव की टंकार' से शत्रुओं का मानसिक वेध (महाभारत से)
युद्ध प्रारंभ होने से पूर्व जब अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष की प्रत्यंचा को खींचकर जो प्रचंड टंकार की, उसकी ध्वनि साक्षात् उत्तराषाढ़ा की गजदंत गर्जना थी। उस नाद को सुनकर कौरवों की सेना के हाथी चिंघाड़ कर पीछे भागने लगे। यह 'युद्ध से पूर्व ही विरोधी का मनोबल तोड़ देने' की उत्तराषाढ़ा कला है।
कथा १०: उपनिषदों का 'समष्टि-प्राण' और वैश्विक न्याय रहस्य (कठोपनिषद से)
कठोपनिषद में यमराज ने नचिकेता को सिखाया कि जो आत्मा अपने छोटे 'मैं' को छोड़कर समष्टि (विश्व) के कल्याण के लिए काम करती है, विधाता उसके मस्तक पर साक्षात् 'सूर्य का मुकुट' सजा देते हैं। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र इसी समष्टि-प्राण का भौतिक द्वार है। जातक की सोच बहुत व्यापक (Global) होती है।
कथा ११: कार्तिकेय का दसों विश्वेदेवों से 'ब्रह्मांडीय चक्रव्यूह' का ज्ञान पाना (स्कन्द पुराण से)
तारकासुर के वध की योजना बनाते समय कार्तिकेय ने दसों विश्वेदेवों से नीति शास्त्र और 'सामूहिक रक्षा व्यूह' का गुप्त विज्ञान सीखा। विश्वेदेवों ने उन्हें सिखाया कि एक सेनापति वही है जो अपने सबसे आखिरी सैनिक के भीतर भी अजेय होने का संकल्प भर दे। यह 'टीम लीडरशिप' (Team Leadership) को दर्शाता है।
कथा १२: शिव का 'किरात' रूप में अर्जुन के गांडीव का घमंड तोड़कर पाशुपत देना (शिव महापुराण से)
जब अर्जुन को अपने बाहुबल पर गर्व हुआ, तो शिव जी शिकारी बनकर आए और अर्जुन के चक्रवर्ती अहंकार को पल भर में शून्य कर दिया। जब अर्जुन ने हार मानकर हाथ जोड़े, तब शिव ने उन्हें गले लगाया और अपना अजेय अस्त्र दिया। यह कथा सिखाती है कि उत्तराषाढ़ा की विजय तभी सिद्ध होती है जब जातक का अहंकार पूरी तरह शांत हो।
कथा १३: ध्रुव का राजा बनकर ३६ हजार वर्ष तक 'अचल न्याय' की स्थापना करना (विष्णु पुराण से)
जब ध्रुव सम्राट बने, तो उन्होंने राजा के सुखों के लिए नहीं, बल्कि अर्यमा और विश्वेदेवों के नियमों के अनुसार राज किया। उन्होंने ३६ हजार वर्षों तक बिना झुके न्याय किया, जिसके बाद ब्रह्मा जी ने उन्हें आकाश में 'अचल ध्रुव तारा' के रूप में स्थापित किया। यह स्थिर और अजेय राजयोग का आख्यान है।
कथा १४: श्रीकृष्ण का महाभारत युद्ध के अंत में भीम को धृतराष्ट्र के लोहे के आलिंगन से बचाना (श्रीमद्भागवत से)
युद्ध के बाद जब अंधे धृतराष्ट्र ने भीम को मार डालने के इरादे से गले लगाना चाहा, तो श्रीकृष्ण ने भांप लिया। उन्होंने भीम के स्थान पर भीम की लोहे की मूर्ति आगे बढ़ा दी। धृतराष्ट्र ने अपने प्रचंड क्रोध और बाहुबल (हाथी के बल) से उस लोहे की मूर्ति को भींचकर चकनाचूर कर दिया। यह तीक्ष्ण रक्षात्मक बुद्धि उत्तराषाढ़ा चेतना को प्रकट करती है।
कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा श्रीराम को 'राजमुकुट की मर्यादा और सत्य प्रतिज्ञा' का पाठ (योगवासिष्ठ से)
ऋषि वशिष्ठ ने दशरथ की मृत्यु के बाद श्रीराम को समझाया कि एक क्षत्रिय का मुकुट (Throne) तभी तक पवित्र है जब तक उसके मुख से निकला वचन (प्रतिज्ञा) हाथी के दांत की तरह अडिग रहे, चाहे उसके लिए राजपाठ ही क्यों न छोड़ना पड़े। श्रीराम ने इसी मर्यादा का पालन किया।
कथा १६: सीता माता का रावण के वध के बाद पुष्पक विमान पर 'चक्रवर्ती सम्राज्ञी' रूप में बैठना (रामायण से)
लंका विजय के पश्चात, माता सीता अग्नि परीक्षा देकर जब पुष्पक विमान पर साक्षात् चक्रवर्ती सम्राज्ञी की तरह श्रीराम की वामांगी बनकर बैठीं, तो देवताओं ने उन पर मदार के फूलों की वर्षा की। यह कष्टों के बाद मिलने वाली 'पूर्ण और न्यायसंगत विजय' का सूचक है।
कथा १७: समुद्र मंथन से 'ऐरावत गजराज' का देवराज इन्द्र के सिंहासन का स्तम्भ बनना (वरहा पुराण से)
मंथन के बाद जब देवलोक स्थिर हुआ, तो ऐरावत हाथी इन्द्र के सिंहासन के आगे रक्षक बनकर खड़ा हुआ। उसके दांतों का बल साक्षात् उत्तराषाढ़ा की स्थिरता थी, जो यह दर्शाती है कि साम्राज्य केवल राजा से नहीं, उसके रक्षकों के पराक्रम से सुरक्षित रहता है।
कथा १८: राधारानी का द्वारका की पटरानियों के सम्मुख 'चरम भक्ति सम्राज्ञी' का प्राकट्य (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)
जब द्वारका की पटरानियों (रुक्मिणी, सत्यभामा) को लगा कि वे कृष्ण से सबसे ज्यादा प्रेम करती हैं, तो श्रीकृष्ण ने राधा तत्व का आह्वान किया। राधा का निष्काम प्रेम देखकर पटरानियों का अहंकार चूर हो गया और उन्होंने राधा को 'भक्ति की सम्राज्ञी' मानकर मुकुट झुकाया। यह कला और सौंदर्य पर 'सच्ची निष्ठा की विजय' है।
कथा १९: राजा भरत का अपने अयोग्य पुत्रों को छोड़ योग्य भूमन्यु को मुकुट सौंपना (महाभारत से)
सम्राट भरत ने जब देखा कि उनके अपने पुत्र राजा बनने के योग्य नहीं हैं, तो उन्होंने वंशवाद को लात मारकर एक योग्य ब्राह्मण पुत्र 'भूमन्यु' का व्यावहारिक वरण किया और उसे राजमुकुट सौंपा। यह न्याय के लिए 'व्यक्तिगत मोह से ऊपर उठने' की उत्तराषाढ़ा पराकाष्ठा है।
कथा २०: गौतम बुद्ध का 'धर्मचक्रप्रवर्तन' (Turning the Wheel of Law) का महा-आख्यान (बौद्ध इतिहास से)
सारनाथ में जब बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया, तो उसे 'धर्मचक्रप्रवर्तन' कहा गया। उन्होंने राजाओं के दण्ड-चक्र को 'धर्म के चक्र' में बदल दिया, जिसके सामने सम्राट अशोक जैसे चक्रवर्ती राजाओं ने भी अपने मुकुट झुका दिए। यह भौतिक सत्ता पर 'ज्ञान की अजेय विजय' की उत्तराषाढ़ा शक्ति है।
कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा अंतरराष्ट्रीय नियमों के लिए 'राजधर्म संहिता' का निर्माण (शतपथ ब्राह्मण से)
ब्रह्मांड के संचालन के लिए ब्रह्मा जी ने सूर्य और मनु को 'राजधर्म संहिता' (Constitutional Law) दी, जो सिखाती है कि एक राजा का मुकुट तभी तक सुरक्षित है जब तक वह अंतरराष्ट्रीय संधियों का पालन करता है। उन्होंने उत्तराषाढ़ा को इसका केंद्र बनाया।
कथा २२: समुद्र मंथन से 'कौस्तुभ मणि' का सूर्य चेतना द्वारा पूर्ण प्रकटीकरण (विष्णु पुराण से)
मंथन से निकली कौस्तुभ मणि जब सूर्य के समान धधक रही थी, तो दसों विश्वेदेवों ने उसे अपने हाथों में लेकर शांत किया और भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर सजाया। यह 'चरम तेज को संतुलित कर वैभव में बदलने' की उत्तराषाढ़ा कला है।
कथा २३: गुरु द्रोणाचार्य द्वारा युधिष्ठिर की 'सत्य-परीक्षा' और ज्येष्ठता का आदर (महाभारत से)
बचपन में जब द्रोणाचार्य ने पाठ पढ़ाया—"सत्यं वद, धर्मं चर"—तो युधिष्ठिर ने कहा, "मुझे यह पाठ अभी याद नहीं हुआ।" दुर्योधन ने तुरंत सुना दिया। द्रोणाचार्य ने कहा, "युधिष्ठिर ही उत्तीर्ण है, क्योंकि उसने सत्य को केवल रटा नहीं, अपने आचरण (जड़) में उतारा है।" यह उत्तराषाढ़ा की व्यावहारिक सत्य-निष्ठा को सिद्ध करता है।
कथा २४: दुर्योधन का कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म पितामह को 'महा-सेनापति' का मुकुट सौंपना (महाभारत से)
युद्ध के प्रारंभ में दुर्योधन ने भीष्म पितामह के चरणों में मुकुट रखकर उन्हें कौरव सेना का सेनापति बनाया। भीष्म ने शर्त रखी कि 'मैं पाण्डवों का वध नहीं करूँगा, परन्तु रोज़ उनके १० हजार सैनिकों को मारूँगा।' यह क्षत्रिय मर्यादा और 'अनुशासन' की उत्तराषाढ़ा चेतना है।
कथा २५: सूफी मत का 'वली' (अल्लाह का मित्र/संरक्षक) और उपनिषदों का सत्यमेव जयते मुकुट सूत्र (मुण्डकोपनिषद से)
मुण्डक उपनिषद का महावाक्य है—'सत्यमेव जयते नानृतं' (सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं)। सूफी मत में 'वली' का अर्थ वह सिद्ध पुरुष है जिसके वचनों को साक्षात् खुदा भी टाल नहीं सकता। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र इसी वली पद और सत्य-मुकुट का साक्षात् तोरण है।
कथा २६: हाथी के दांत का एक बार बाहर निकलने पर वापस मुख में न जाना (गज-आचार मत)
एक मदमस्त गजराज के दांत (Tusk) जब एक बार बाहर निकल आते हैं, तो वे चाहे सूंड हिलाए या पहाड़ तोड़े, कभी वापस अंदर नहीं जाते। यह कथा जातक को उसका 'मूल सिद्धांत' याद दिलाती है—"जो कह दिया, सो कह दिया; अब प्राण भले ही चले जाएं, वचन नहीं टूटेगा।"
कथा २७: विश्वेदेवों का परम महा-सूर्य चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)
महाप्रलय के समय, धर्म और समष्टि के दसों देवता विश्वेदेव ब्रह्मांड के समस्त मुकुटों, प्रतिज्ञाओं, और हाथी-दांतों के रहस्यों को समेटकर साक्षात् 'परम महा-सूर्य शून्य' (अनंत आत्मिक प्रकाश) में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई राजा बचता है, न कोई वचन। केवल एक अखंड, निर्गुण ज्योति शेष रहती है। यह उत्तराषाढ़ा नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।
वैदिक मन्त्र
पौराणिक मन्त्र
तन्त्र बीज मन्त्र
विधि
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र वाले दिन रविवार (या मकर संक्रांति/शुभ सूर्य गोचर में) प्रातः काल सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें केसर, अक्षत और लाल चंदन मिलाकर सूर्य नारायण को अर्घ्य दें। कुशा के लाल आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें। जाप के बाद किसी वृद्ध या ज्ञानी व्यक्ति को तांबे का सिक्का या धार्मिक पुस्तक दान करें।
(नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)
अति-स्वाभिमान को 'लचीलापन' दें
Balance Pride with Flex: सूर्य और शनि के प्रभाव के कारण आपके भीतर 'मैं कभी झुक नहीं सकता' का एक स्वाभाविक हठ (Rigidity) आ जाता है, जिससे आपके कार्यस्थल पर सीनियर्स या घर में जीवनसाथी के साथ भयंकर टकराव (Power Struggle) होता है। जीवन बदलने का सूत्र है— "हाथी के दांत की तरह अडिग रहें, परन्तु दूसरों के प्रति करुणा (बृहस्पति) का भाव न छोड़ें।"
अकेले लड़ने के बजाय 'समष्टि' (Team) से जुड़ें
विश्वेदेव आपके अधिष्ठाता हैं, इसलिए आपकी असली सफलता सामूहिक कार्यों (Management/Politics/Team Work) में छिपी है। हर काम अकेले करने का प्रयास न करें, लोगों पर भरोसा करना और उन्हें साथ लेकर चलना सीखें।
वचन की मर्यादा रखें
यदि आपने किसी से कोई आर्थिक या व्यावहारिक वादा किया है, तो उसे हर हाल में पूरा करें। आपका भाग्य तभी तक चमकेगा जब तक आपकी ज़बान (हाथी-दांत) पवित्र है।
जब दसों विश्वेदेवों ने अपनी सामूहिक धर्म-शक्ति से इन्द्र के खोए हुए राजमुकुट को पुनः अजेय बनाकर अमरावती के तोरण द्वार पर स्थापित किया, तब ब्रह्मा जी ने धनु और मकर राशि के इस भीषण कर्म-संधिकाल पर सूर्य के अखंड ओज को पिरोकर 'उत्तराषाढ़ा' (चमकता हुआ हाथी-दांत जैसा दो तारों का समूह/Sagittarii-Nunki) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार विश्वेदेवों तथा सूर्य को सौंपा।
अचूक उपाय
१. नक्षत्र वनस्पति उपाय
इसका पूज्य वृक्ष 'कटहल' (Jackfruit) का वृक्ष है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के दिन कटहल का पौधा किसी सार्वजनिक स्थान पर लगाएं और उसकी सेवा करें। रविवार को इसके वृक्ष की जड़ में थोड़ा सा जल और रोली चढ़ाना जातक के मान-सम्मान और सरकारी नौकरियों (Government Job) के मार्ग को तत्क्षण खोल देता है।
२. राजमुकुट महा-उपाय
इस नक्षत्र के दिन तांबे के एक गोल सिक्के पर 'सूर्य यन्त्र' अंकित करवाकर उसे रविवार को लाल धागे में अपने गले में धारण करें। यह आपके बॉस, सरकार, और समाज में आपके वर्चस्व (Dominance) को अजेय बना देगा।
३. गज-सेवा महा-उपाय
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र के दिन हाथी (Elephant) को केले, गन्ना, या मीठी रोटी खिलाना, अथवा किसी गणेश मंदिर में जाकर दुर्वा की २७ गाठें अर्पित करना आपके जीवन के बड़े से बड़े पितृ दोष, अदालती मुकदमों (Litigations), और अकाल मृत्यु के संकट को तत्काल नष्ट कर राजयोग जगा देता है।
॥ नक्षत्र पुराण संहिता ॥
अध्याय २१: उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
॥ ओम् तत्सत् ॥
॥ ओम् अजेयाय नमः ॥
॥ शुभं भवतु ॥
🌌 नक्षत्र पुराण संहिता — मास्टर पोस्ट
अश्विनी से रेवती तक सभी २७ नक्षत्रों का सम्पूर्ण रहस्य, पौराणिक कथाएँ, देवता, मन्त्र, साधना एवं अचूक उपाय एक ही स्थान पर पढ़ें।
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