​मोहिनी: एक अलौकिक साधना | 64 योगिनी रहस्य, बेल वृक्ष का तांत्रिक विधान और वाक-सिद्धि की अलौकिक कथा -

 




मोहिनी: एक अलौकिक साधना

लेखक: नरेन्द्र पंचारिया शैली: रहस्य, तांत्रिक कथा, आध्यात्मिक यथार्थवाद

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अस्वीकरण: यह रचना लेखक की कल्पना, प्राचीन लोक-परंपराओं, तंत्र-शास्त्र की कथात्मक मान्यताओं और विशुद्ध साहित्यिक अभिव्यक्ति पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास, तंत्र-टोने या रूढ़िवादिता को बढ़ावा देना नहीं है। साधना के जो विधान यहाँ वर्णित हैं, वे केवल कथा के वातावरण और रहस्य को सजीव करने के लिए गढ़े गए हैं। पाठक इसे एक दार्शनिक और आध्यात्मिक कथा के रूप में ही ग्रहण करें। किसी भी साधना को बिना सुयोग्य गुरु के मार्गदर्शन के स्वयं करने का प्रयास न करें; किसी भी व्यक्तिगत प्रयोग के लिए लेखक अथवा प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।

अध्याय 1: ब्रह्ममुहूर्त का संकल्प

हवेली के दालान में रात का तीसरा पहर उतर चुका था। बाहर झींगुरों की झंकार और सन्नाटे की एक गहरी गूंज थी। पीतल के पुराने दीये की लौ हल्की थरथराहट के साथ दीवार पर छायाएं बना रही थी। चौकी पर भोजपत्र और एक प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ खुला पड़ा था।

नरेन्द्र पंडित शांत मुद्रा में बैठे थे, उनकी उंगलियां ग्रंथ के पन्नों पर हल्के-हल्के फिर रही थीं। पास ही पीतल की थाली में ताजे, लाल गुलाब रखे थे, जिनकी महक हवा में घुल रही थी।

नित्या ने चुपचाप कमरे में कदम रखा। उसके हल्के गुलाबी दुपट्टे की सरसराहट सन्नाटे को चीर गई। उसने थाली में रखे ग्यारह खिले हुए गुलाबों, शीशे की शीशी में बंद गुलाब के इत्र और ताजे श्रीफल पर एक नजर डाली। उसकी आंखों में कौतूहल और चिंता की एक बारीक रेखा खिंच गई।

"रात के तीन बज रहे हैं, पंडित जी," नित्या ने धीमी, संभली हुई आवाज में कहा, उसके स्वर में जिज्ञासा थी। "यह ब्रह्ममुहूर्त की बेला, यह लाल आसन और यह महकता इत्र... शास्त्र आज किसी खास साधना का संकेत दे रहे हैं?"

नरेन्द्र ने ग्रंथ से दृष्टि उठाई। उनके चेहरे पर एक गंभीर, अलौकिक तेज था। उन्होंने मृदु मुस्कान के साथ नित्या को देखा।

"यह साधना का गूढ़तम मार्ग है, नित्या," नरेन्द्र ने गंभीर स्वर में कहा। "चौंसठ योगिनियों के रहस्य संसार में एक ऐसी शक्ति हैं, जिनका प्रभाव सीधे साधक के प्राण और वाणी पर पड़ता है—मोहिनी योगिनी।"

नित्या धीमे कदमों से आगे बढ़ी और चौकी के करीब बैठ गई। "मोहिनी योगिनी? मैंने सुना है यह साधना जितनी मनोहारी है, उतनी ही प्रचंड भी।"

"सत्य कहा तुमने," नरेन्द्र ने ग्रंथ की एक पंक्ति की ओर इशारा करते हुए समझाया। "इनका वास किसी सामान्य स्थान पर नहीं, बल्कि उस वृक्ष पर होता है जो साक्षात शिव का प्रिय है—बेल का वृक्ष। शुक्रवार की रात, जब प्रहर का तीसरा पहर विदा लेता है और ब्रह्ममुहूर्त जागता है, वही समय इनके आह्वान का होता है।"

"और इसका विधान इतना सुगंधित क्यों है?" नित्या ने गुलाब की पंखुड़ियों को छूते हुए पूछा। "लाल और गुलाबी वस्त्र, यह गुलाब का इत्र..."

"क्योंकि योगिनी को सौंदर्य और सुगंध प्रिय है," नरेन्द्र की आवाज में रहस्य का पुट गहरा गया। "साधक को स्वयं लाल या गुलाबी वस्त्र धारण करने होते हैं, देह पर गुलाब का इत्र लगाना होता है। फिर बेल के वृक्ष की जड़ों में भी इसी इत्र का अर्पण होता है। उत्तर-पूर्व—ईशान कोण की ओर मुख करके पहले भूमि को जल से पवित्र किया जाता है, फिर तिल या शुद्ध घी का दीपक जलाकर वृक्षराज को शीश झुकाया जाता है।"

नित्या ने पूजा की सामग्री को देखा। "और संकल्प?"

"ग्यारह ताजे गुलाब, एक श्रीफल और शुक्रवार के दिन खीर का पावन भोग," नरेन्द्र ने कहा। "फिर अपने नाम और गोत्र का उच्चारण कर संकल्प लिया जाता है—इक्कीस या इकतालीस दिन का। प्रतिदिन दो घंटे का अनवरत जाप, और ध्यान में बंद आंखों से केवल उसी अलौकिक छवि को देखने का प्रयास।"

नित्या की पलकें थोड़ी सिकुड़ीं, उसने अपनी दृष्टि नरेन्द्र की आंखों में स्थिर की। "और जब यह सिद्ध हो जाएं, तब? क्या बदलता है साधक के जीवन में?"

नरेन्द्र की आंखों में एक गहरा ठहराव उतर आया। "जब मोहिनी योगिनी साधक पर प्रसन्न होती हैं, तो उसकी देह और वाणी में एक असीम आकर्षण का संचार होता है। वह भीड़ के बीच भी खड़ा हो, तो लोग केवल उसी की ओर खिंचे चले आते हैं, उसी के शब्दों को सुनने को विवश हो जाते हैं। वाक-सिद्धि का वरदान मिलता है—मुख से निकला एक-एक शब्द सत्य के सांचे में ढलने लगता है। व्यापार के जो मार्ग अवरुद्ध हो चुके थे, वे खुलने लगते हैं; बिछड़े और टूटे हुए संबंध, छूटे हुए ग्राहक वापस जुड़ने लगते हैं।"

"ग्यारहवें दिन से ही इसके सूक्ष्म अनुभव होने लगते हैं ना?" नित्या ने फुसफुसाते हुए पूछा, जैसे डर हो कि कोई तीसरा सुन न ले।

"हां," नरेन्द्र ने धीमे से सिर हिलाया। "ग्यारहवें दिन से बेल के पत्तों में अजीब सी हलचल, आधी रात को पायल की झंकार जैसी ध्वनि और हवा में अचानक तीखी इत्र की खुशबू तैरने लगती है। और अंतिम दिन, बेलपत्र, बेल के फल और खीर की आहुतियों से हवन संपन्न होता है।"

नित्या का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। उसने नरेन्द्र के हाथ पर अपना हाथ रखा। उसकी आवाज में अब कौतूहल नहीं, एक गहरी चेतावनी और अपनापन था।

"पर पंडित जी... योगिनी साधना कोई साधारण पूजा नहीं है। रूप जितना मनमोहक होता है, मार्ग उतना ही तीखा होता है। क्या आपने इस मार्ग पर अकेले चलने का विचार तो नहीं किया?"

नरेन्द्र ने उसकी चिंता को भांप लिया और आश्वस्त करते हुए बोले, "बिल्कुल नहीं, नित्या। तंत्र का सबसे बड़ा नियम यही है—बिना गुरु के निर्देश और कृपा के योगिनी साधना की दहलीज भी नहीं लांघी जाती। यदि जाप में एक मात्रा की भी त्रुटि हो जाए, या साधक का मन एक पल के लिए भी विचलित हो, तो उस प्रचंड ऊर्जा को संभालने वाला पीछे केवल गुरु ही होता है। रक्षा मंत्र का कवच जब तक सिद्ध न हो, तब तक इस महाशक्ति का आह्वान करना स्वयं को दांव पर लगाने जैसा है।"

बाहर हवा का एक झोंका आया, जिससे खिड़की का पर्दा लहराया और बेल के सूखे पत्तों के खड़कने की धीमी आवाज आई।

नित्या ने गहरी सांस ली और इत्र की शीशी उठाकर नरेन्द्र के सामने रख दी।

"तो फिर गुरु के चरणों का ध्यान कीजिए, पंडित जी," नित्या ने धीमी, स्थिर आवाज में कहा। "घड़ी का कांटा तीन के पार जा रहा है। बेल का वृक्ष प्रतीक्षा में है, और साधना की यह रात अपनी पहली परीक्षा लेने को तैयार है।"

लेखक का अनुभव व संदेश: साधना का पहला कदम उत्सुकता नहीं, समर्पण होता है। मोहिनी योगिनी का विधान जितना सुगंधित और मनमोहक प्रतीत होता है, उसकी अंतर्धारा उतनी ही अनुशासित है। जीवन में जब भी हम किसी उच्च शक्ति या सिद्धि की ओर बढ़ते हैं, तो सबसे पहले मन के भटकाव को शांत करना पड़ता है। बिना गुरु की छत्रछाया और रक्षा-कवच के अलौकिक शक्तियों के द्वार खटखटाना केवल विपत्ति को निमंत्रण देना है। गुरु वह तटबंध हैं जो साधना की प्रचंड नदी को विनाशकारी बाढ़ बनने से रोकते हैं।

अध्याय 2: ग्यारहवीं रात की आहट

ग्यारहवीं रात का अंधकार पहले की रातों से कहीं अधिक भारी और सघन था। बेल के वृक्ष के नीचे हवा में ऐसी ठंडक उतर आई थी जो हाड़ कंपा दे, फिर भी नरेन्द्र पंडित के लाल आसन के इर्द-गिर्द का वातावरण किसी दहकते हुए अलाव की तरह गर्म था।

दीपक की लौ बिना किसी हवा के कभी एकदम स्थिर हो जाती, तो कभी अचानक भड़क कर नीली पड़ने लगती।

नरेन्द्र अपनी साधना के चरम पर थे। उनकी रुद्राक्ष की माला उंगलियों के बीच बिजली की गति से घूम रही थी। माथे पर त्रिपुंड के बीच पसीने की धार बह रही थी, लेकिन उनका शरीर किसी पत्थर की मूर्ति की तरह अचल था। बंद आंखों के भीतर उनकी चेतना उस मोहिनी रूप के सम्मोहन और गुरु के दिए रक्षा-कवच के बीच झूल रही थी।

नित्या कुछ ही दूरी पर बैठी थी। उसकी नजरें बेल की घनी शाखाओं पर टिकी थीं। ग्यारहवें दिन के विधान के अनुसार आज उसने शुद्ध गाय के दूध और बासमती चावल की गाढ़ी खीर का भोग कांसे के पात्र में अर्पित किया था।

अचानक वातावरण में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि हवा का बहना भी बंद जान पड़ा।

और फिर, गंध बदली।

गुलाब के इत्र की महक में एक बेहद तीव्र, मादक और अलौकिक सुगंध घुल गई—जैसे सैकड़ों पारिजात के फूल एक साथ खिल उठे हों।

छन... छनक... छन...

इस बार घुंघरुओं की आवाज दूर नहीं थी। वह आवाज बेल के तने के ठीक पीछे से आ रही थी, मानो कोई अत्यंत सुकोमल पांवों से उस लाल आसन की परिक्रमा कर रहा हो।

नित्या के रोंगटे खड़े हो गए। उसने देखा, बेल के तने से छनकर आती चांदनी में एक पतली, गुलाबी रेशमी छाया लहरा रही थी। छाया के हिलते ही हवा में एक सम्मोहक, मीठी सी हंसी गूंजी। वह आवाज इतनी मीठी थी कि इंसान अपनी सुध-बुध खोकर उस ओर खिंचा चला जाए।

"पंडित जी..." एक अत्यंत कोमल, शहद में घुली हुई स्त्री की आवाज सीधे नरेन्द्र के कानों में नहीं, बल्कि उनकी अंतरात्मा में गूंजी। "आंखें खोलो... जिसके रूप के लिए तुमने ग्यारह रातों की नींद त्यागी है, वह तुम्हारे समक्ष है। केवल एक बार देखो..."

नरेन्द्र के होंठ कांपे। मोहिनी योगिनी का पहला वार साधक के संकल्प पर था। यदि इस क्षण उन्होंने पलकें खोल दीं, तो साधना वहीं खंडित हो जाती और वह रूप साधक के विवेक को सदा के लिए बांध लेता।

नरेन्द्र के चेहरे की नसें तन गईं। उनके मन के भीतर गुरु की वह चेतावनी गूंज उठी—‘जब तक इकतालीस दिन पूर्ण न हों और अंतिम आहुति न डले, तब तक दृष्टि केवल अंतर्मन में स्थिर रहनी चाहिए। बाहर जो दिखेगा, वह माया का जाल होगा।’

नरेन्द्र ने अपने होंठों की गति और तेज कर दी। उनके मुख से बुदबुदाते मंत्रों की ध्वनि हवा में एक अदृश्य सुरक्षा-चक्र की तरह गूंजने लगी।

साया और निकट आया। लाल आसन के ठीक किनारे, जहां रक्षा-रेखा खींची गई थी, वहां की धूल में अचानक दो छोटे, अलौकिक रूप से सुंदर पांवों के निशान उभरे—जैसे कोई लाल महावर लगाए स्त्री वहां आकर रुक गई हो।

नित्या की सांसें गले में अटक गईं। उसने देखा कि खीर के पात्र के ऊपर से हल्की सी भाप उठी और देखते ही देखते नैवेद्य पर एक ताजे, खिले हुए कमल की पंखुड़ी आकर गिरी, जबकि उस पूरे इलाके में कहीं कोई कमल का तालाब नहीं था।

हवा का एक तेज, गर्म झोंका आया। बेल के पत्ते आंधी की तरह फड़फड़ाए और उसी क्षण वह छाया एक चमकीली गुलाबी लकीर बनकर बेल की सबसे ऊंची डाल में समा गई।

दूर गांव के किसी मंदिर से सुबह के चार बजे का शंखनाद गूंज उठा। ब्रह्ममुहूर्त का वह निर्णायक पहर समाप्त हो चुका था।

नरेन्द्र ने एक अत्यंत गहरी सांस छोड़ी। उनके होंठों का जाप रुका। उन्होंने धीरे-धीरे, अत्यंत सावधानी से अपनी आंखें खोलीं। उनकी आंखों में एक विचित्र, गहरा तेज उतर आया था—एक ऐसा आकर्षण, जिसे देखकर नित्या भी एक पल के लिए विस्मित रह गई।

नित्या संभलकर आगे बढ़ी और उनके पास पहुंची। "पंडित जी..." उसकी आवाज धीमी और कांपती हुई थी।

नरेन्द्र ने सामने देखा। रक्षा-रेखा के बाहर बने वे महावर के पदचिह्न धीरे-धीरे हवा में विलीन हो रहे थे, और खीर पर रखी वह पंखुड़ी साक्षात प्रमाण थी कि ग्यारहवें दिन की हाजिरी स्वीकार हो चुकी थी।

"अनुभव पूर्ण हुआ, नित्या," नरेन्द्र की आवाज में एक अलौकिक भारीपन और गूंज थी—मानो उनके शब्दों में अब सम्मोहन की शक्ति उतरने लगी हो। "योगिनी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। किंतु असली परीक्षा अब शुरू होगी। ग्यारहवें दिन उन्होंने अपनी झलक दिखाई है... इक्कीसवें दिन वह वचन मांगने आएंगी।"

नित्या ने गंभीर होकर सिर हिलाया। उसने कांसे का पात्र उठाया और नरेन्द्र की ओर देखते हुए कहा, "और उस वचन के लिए, आपका आत्मबल इस वृक्ष से भी अधिक मजबूत होना होगा।"

लेखक का अनुभव व संदेश: ग्यारहवें दिन की यह अनुभूति हर साधक के जीवन का वह मोड़ है जहाँ परीक्षा सीधे इंद्रियों की होती है। अलौकिक अनुभूतियाँ जब पहली बार सामने आती हैं, तो भय से ज्यादा कौतूहल और सम्मोहन साधक को डिगाता है। मोहिनी योगिनी का पहला प्रहार साधक के संयम पर होता है—यदि वह रूप के लोभ में पड़ गया, तो साधना वहीं भस्म हो जाती है। संदेश स्पष्ट है: जब तक लक्ष्य सिद्ध न हो, तब तक चमत्कारों और आकर्षणों से अपनी आँखें बंद रखना ही साधक की सबसे बड़ी शक्ति है।

अध्याय 3: इक्कीसवीं रात का वचन

इक्कीसवीं रात का आकाश तारों से भरा था, लेकिन बेल के वृक्ष के नीचे का दायरा किसी घने, अभेद्य कोहरे में डूबा हुआ था। हवा में गुलाब और कस्तूरी की खुशबू इतनी गाढ़ी हो चुकी थी कि सांस लेना भी किसी मदहोश कर देने वाले नशे जैसा लग रहा था।

आज की रात का विधान अलग था। लाल आसन के आगे तांबे के छोटे कुंड में बेल की सूखी लकड़ियों और कपूर की धीमी, पवित्र अग्नि सुलग रही थी।

नरेन्द्र पंडित का शरीर तपाए हुए सोने की भांति चमक रहा था। इक्कीस दिनों की कठोर तपस्या, उपवास और अनवरत जाप ने उनके चेहरे पर एक ऐसा तेज भर दिया था जिसे सीधी नजरों से देखना भी कठिन था।

नित्या घेरे से बाहर बैठी थी, उसके हाथ में तांबे का कलश और कुश की पवित्री थी। वह जानती थी कि आज की रात केवल मंत्र जाप की नहीं, बल्कि साधक के 'अधिकार' और 'सीमा' के निर्धारण की रात है।

रात के तीन बजते ही बेल के तने से एक हल्की चरमराहट की आवाज आई।

अचानक हवन कुंड की लौ बिना किसी हवा के ऊपर उठी और एक स्थिर, सिंदूरी रंग में बदल गई। सन्नाटा इतना गहरा हुआ कि दोनों की अपनी धड़कनें साफ सुनाई देने लगीं।

छम... छम... छम...

इस बार घुंघरुओं की आवाज किसी दूरी से नहीं आई। वह सीधे हवन कुंड के ठीक उस पार, ठीक नरेन्द्र के सामने से गूंजी।

हवा में एक अलौकिक कांति फैली। कोहरे को चीरती हुई एक बेहद रूपवती, दिव्य आकृति कुंड के पार प्रकट हुई। गुलाबी रेशमी वस्त्र, गले में पारिजात की माला, और आंखों में ऐसा अगाध सम्मोहन कि कोई सामान्य मनुष्य यदि उस ओर देख ले तो जीवन भर के लिए अपनी सुध-बुध खो बैठे।

मोहिनी योगिनी साक्षात उपस्थित थीं। उनके अधरों पर एक रहस्यमयी, मनमोहक मुस्कान थी।

"नरेन्द्र..."

वह आवाज किसी वीणा के तार जैसी झंकृत हुई। स्वर में इतना आकर्षण था कि हवा में तैरते पत्ते भी जैसे एक पल के लिए ठहर गए।

"इक्कीस रातों तक तुमने मुझे अपनी निष्ठा से बांधा है। तुम्हारी तपस्या ने मुझे विवश किया कि मैं बेल की शाखाओं से उतरकर तुम्हारे सम्मुख आऊं।" योगिनी ने अपने सुकोमल हाथ आगे बढ़ाए। "कहो साधक, क्या चाहते हो? रूप, संपदा, या इस संसार के हर प्राणी के हृदय पर तुम्हारा एकछत्र राज?"

नरेन्द्र की आंखें अधखुली थीं। उन्होंने दृष्टि योगिनी के मुख पर नहीं, बल्कि उनके चरणों में अर्पित लाल गुलाबों और महावर लगे पदचिह्नों पर टिका रखी थी। यही गुरु का आदेश था—सम्मोहन की आंखों में कभी मत झांकना, दृष्टि सदा चरणों पर रखना।

"हे देवी, हे कल्याणी मोहिनी योगिनी," नरेन्द्र की आवाज गूंजी। उनके कंठ में ऐसा भारीपन और अधिकार था जो वाक-सिद्धि के अंकुरण का प्रमाण था। "मैं किसी वासना या अनुचित अधिकार की कामना लेकर इस वृक्ष की शरण में नहीं आया। मेरी साधना केवल लोक-कल्याण, विद्या और आपके कृपा-कवच के निमित्त है।"

योगिनी की भौंहें तनिक तनीं, फिर मुस्कान और गहरी हो गई। "संसार जब मेरे द्वार पर आता है, तो केवल वशीकरण और अधिकार मांगता है, पंडित। किंतु यदि तुम्हें मेरी मोहिनी शक्ति चाहिए, यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारी वाणी में वह आकर्षण हो कि राजसभाएं भी नतमस्तक हो जाएं, तो तुम्हें मुझे एक वचन देना होगा।"

नित्या की सांसें थम गईं। उसने अपनी उंगलियों में कुश को और कस लिया।

"कैसा वचन, देवी?" नरेन्द्र ने संयत स्वर में पूछा।

"मेरी सिद्धि के पश्चात, तुम्हारी जिव्हा से कभी किसी के लिए मिथ्या या छल का शब्द नहीं निकलेगा। जिस दिन तुमने अपनी वाणी का दुरुपयोग किसी को अनुचित रूप से बांधने या पीड़ा देने के लिए किया, उसी क्षण यह मोहिनी शक्ति तुम्हारा सर्वस्व भस्म कर देगी। क्या तुम्हें यह मर्यादा स्वीकार है?"

नरेन्द्र ने बिना किसी हिचकिचाहट के तांबे के पात्र से तीन बूंद जल अपनी दाहिनी हथेली पर लिया।

"मुझे यह मर्यादा स्वीकार है, हे योगिनी। मेरी वाणी पर केवल सत्य, ज्ञान और धर्म का अंकुश रहेगा। यदि मैं मार्ग से विचलित होऊं, तो आपका दंड मुझे शिरोधार्य होगा।"

नरेन्द्र ने वह जल हवन कुंड की अग्नि में छोड़ दिया।

स्वाहा!

जैसे ही जल की बूंदें अंगारों पर गिरीं, एक नीली लौ उठी और योगिनी की आकृति उस दिव्य प्रकाश में विलीन होने लगी। उनकी विदाई के साथ ही बेल के वृक्ष से फूलों की एक हल्की वर्षा सी हुई और एक गूंजती हुई आवाज वातावरण में तैर गई:

"साधक, तुम्हारी निष्ठा ने वचन को सिद्ध किया। इकतालीसवें दिन की अंतिम आहुति के साथ, मैं तुम्हारी वाणी में सदा के लिए प्रतिष्ठित हो जाऊंगी..."

लौ सामान्य हो गई। कोहरा धीरे-धीरे छंटने लगा।

नित्या ने गहरी, कांपती हुई सांस बाहर छोड़ी। वह तुरंत उठकर नरेन्द्र के पास आई। उसने देखा कि नरेन्द्र की आंखों में अब कोई तनाव नहीं था—वहां केवल एक शांत, अथाह समंदर जैसा ठहराव था।

"वचन बंध गया, पंडित जी," नित्या ने विस्मय और आदर से कहा।

नरेन्द्र ने हवन कुंड की भस्म का एक तिलक नित्या के माथे पर और दूसरा अपने ललाट पर लगाया।

"हां, नित्या," नरेन्द्र ने कहा, और उनकी आवाज में अब एक ऐसा सम्मोहन था जो सीधे सुनने वाले की आत्मा को छूता था। "मोहिनी योगिनी ने अपनी सीमाएं तय कर दी हैं। अब केवल बीस रातों की प्रतीक्षा और इकतालीसवें दिन का वह महा-हवन शेष है, जहां यह साधना पूर्णता को प्राप्त होगी।"

लेखक का अनुभव व संदेश: शक्ति कभी मुफ़्त या बिना शर्तों के नहीं मिलती। मोहिनी योगिनी से वाक-सिद्धि का वरदान पाने का अर्थ केवल अपनी बात मनवाना नहीं, बल्कि अपनी वाणी पर सत्य का सबसे कठोर पहरा बिठाना है। तंत्र में जब कोई शक्ति वचन मांगती है, तो वह साधक के अहंकार को नष्ट करने की शर्त होती है। जो साधक शक्ति का उपयोग स्वार्थ या छल के लिए करता है, वह शक्ति अंततः उसी को निगल जाती है। सिद्धि की पहली कसौटी मर्यादा है।

अध्याय 4: इकतालीसवीं रात की महा-आहुति

इकतालीसवीं रात का पहर केवल समय का बदलना नहीं था; वह सृष्टि के उस क्षण का आगमन था जब साधक का संकल्प ब्रह्मांड की किसी आदि-शक्ति से एकाकार होता है।

बेल के विशाल वृक्ष के नीचे सन्नाटा इतना गहरा और पवित्र था जैसे प्रकृति ने स्वयं अपनी सांसें साध ली हों। तांबे का चौकोर हवन कुंड बीच में स्थापित था, जिसके चारों कोनों पर कुंकुम से अष्टदल कमल बने थे। कुंड के भीतर सूखी बेल की पवित्र समिधाएं, कपूर और चंदन के टुकड़े धधक रहे थे।

नित्या ने चांदी की बड़ी थाली में आज की महा-आहुति की सामग्री सजा रखी थी—गाय के दूध से बनी गाढ़ी खीर, अखंडित बेलपत्र, बेल का सूखा फल, ग्यारह खिले हुए लाल गुलाब और शुद्ध शहद। उसका गुलाबी परिधान हवा के हल्के थपेड़ों से धीरे-धीरे लहरा रहा था। उसकी आंखों में पिछले चालीस दिनों के जागरण की कोई थकान नहीं थी; केवल एक गहरी, अचूक श्रद्धा की चमक थी।

नरेन्द्र पंडित लाल रेशमी धोती और उत्तरीय में कुंड के सम्मुख पद्मासन में विराजमान थे। चालीस दिनों के अनवरत जाप, एकांत और तपोबल ने उनके समूचे व्यक्तित्व को रूपांतरित कर दिया था। उनकी देह से एक सूक्ष्म, स्वर्णिम आभा फूट रही थी। चेहरे पर न कोई संशय था, न कोई भय—केवल एक शांत, विराट ठहराव।

घड़ी की सुइयां ठीक तीन पर ठहरीं। ब्रह्ममुहूर्त का वह पवित्रतम बिंदु आ पहुंचा।

"नित्या," नरेन्द्र की आवाज गूंजी। उस आवाज में इतना भारीपन, रस और सम्मोहन था कि हवा में तैरती पत्तियों की थरथराहट भी जैसे रुक गई। "गुरु-स्मरण करो। महा-हवन का समय आ गया।"

नित्या ने सिर झुकाकर गुरु-मंत्र का उच्चारण किया और कुंड के पास ताजे बेलपत्रों का ढेर रख दिया।

नरेन्द्र ने घी की आहुति दी। स्वाहा के उच्चारण के साथ ही कुंड से उठी लपटें साधारण नहीं रहीं। वे सिंदूरी और हल्की गुलाबी आभा में नाचने लगीं।

नरेन्द्र ने दोनों हाथों में बेलपत्र और खीर का नैवेद्य उठाया। उनकी आंखें आधी खुली थीं, दृष्टि अग्नि के मध्य में स्थिर थी:

"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं मोहिनी योगिन्यै नमः स्वाहा!"

पहली आहुति गिरते ही बेल का वृक्ष जड़ से लेकर शिखर तक कांप उठा।

आकाश में तारे धुंधले पड़ने लगे और हवा में गुलाब, कस्तूरी और चंदन का एक ऐसा झोंका उठा जो सांसों को मदमस्त कर दे। कुंड की लपटें अचानक सात फीट ऊंची उठीं और उनके बीच से एक अकल्पनीय दृश्य उभरा।

अग्नि की उस प्रचंड लौ के मध्य, बिना झुलसे, साक्षात मोहिनी योगिनी का दिव्य स्वरूप प्रकट हुआ।

उनका रूप अलौकिक था। मुख पर पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा तेज, नयनों में असीम सम्मोहन और अधरों पर वही रहस्यमयी, मनमोहक मुस्कान। उनके गुलाबी वस्त्र हवा में तैर रहे थे, और उनके पैरों के घुंघरुओं की झंकार पूरे वातावरण में एक संगीत की तरह गूंज उठी।

नित्या ने तुरंत मस्तक भूमि पर टिका दिया। तेज इतना प्रचंड था कि उसे सीधे देखना असंभव था।

"नरेन्द्र..." योगिनी का स्वर किसी दिव्य वीणा के मधुरतम आलाप जैसा था। "तुम्हारे संकल्प ने इकतालीस रातों की इस कठोर तपस्या को पार किया। तुम्हारी निष्ठा अडिग रही, तुम्हारा चित्त निर्मल रहा। तुम्हारी आहुति मुझे स्वीकार है।"

नरेन्द्र ने सिर झुकाकर दोनों हाथ जोड़े। "हे भगवती, आपकी कृपा ही मेरा संबल है।"

योगिनी ने अपने सुकोमल, महावर रंजित हाथ को उठाया। उनकी तर्जनी उंगली से एक अत्यंत चमकीली, गुलाबी-स्वर्णिम प्रकाश की किरण निकली। वह किरण किसी तीर की भांति सीधी आई और नरेन्द्र के कंठ—विशुद्ध चक्र—में समा गई।

उस क्षण एक तीव्र कंपन हुआ। नरेन्द्र की आंखें एक पल के लिए पूरी तरह बंद हुईं और उनके कंठ से एक ओंकार की गहरी ध्वनि निकली। हवा में ऐसा खिंचाव महसूस हुआ मानो आसपास की समूची सृष्टि उस एक ध्वनि की ओर झुक गई हो।

"साधक, तुम्हारी वाणी अब मोहिनी शक्ति से अभिमंत्रित है," योगिनी के शब्द हवा में किसी अमिट शिलालेख की तरह गूंज उठे। "तुम जो कहोगे, वह व्यर्थ नहीं जाएगा। भीड़ में भी तुम्हारी बात सुनने के लिए दिशाएं ठहरेंगी। व्यापार, संबंध और प्रतिष्ठा के जो मार्ग अवरुद्ध थे, वे स्वतः खुलेंगे। किंतु स्मरण रहे... वचन की मर्यादा ही तुम्हारी इस शक्ति की आयु है।"

नरेन्द्र ने विनीत भाव से कहा, "यह शक्ति लोक-कल्याण और सत्य के निमित्त समर्पित रहेगी, देवी।"

योगिनी की आकृति मंद-मंद मुस्कुराई और देखते ही देखते वह दिव्य स्वरूप एक तेज रोशनी बनकर बेल के विशाल तने में विलीन हो गया।

हवन कुंड की लपटें शांत होकर धीमी, पवित्र भस्म में बदलने लगीं। हवा सामान्य हो गई, और पूर्व दिशा से भोर की पहली सुनहरी किरण बेल के पत्तों को चीरती हुई नीचे उतरी।

साधना पूर्ण हो चुकी थी।

नरेन्द्र ने आंखें खोलीं। उनकी आंखों में अब ऐसा गहरा, चुंबक जैसा आकर्षण था कि नजरें हटाना कठिन था। उन्होंने कुंड से चुटकी भर पवित्र भस्म उठाई।

नित्या ने धीरे से सिर उठाया और नरेन्द्र की ओर देखा। उस एक दृष्टि में ही उसे नरेन्द्र के भीतर एक नए युग का उदय दिखाई दिया—एक ऐसा अधिकार, जिसमें शक्ति भी थी और उसे साधने का अपार संयम भी।

"साधना सिद्ध हुई, पंडित जी?" नित्या ने विस्मय और गहरे आदर से पूछा।

नरेन्द्र ने भस्म का तिलक नित्या के ललाट पर लगाया और फिर स्वयं अपने माथे पर।

जब वे बोले, तो उनके एक-एक शब्द में एक विचित्र सी मिठास और वजन था:

"सिद्धि केवल शुरुआत है, नित्या। शक्ति प्राप्त करना कठिन है, किंतु उसे संभाल कर मर्यादा में जीना उससे भी बड़ी तपस्या है। और अब, इस शक्ति को संसार के कल्याण में लगाने का समय आ गया है।"

सुबह की पहली धूप में बेल का वह प्राचीन वृक्ष अब किसी रहस्यमयी साए जैसा नहीं, बल्कि एक जाग्रत, तेजस्वी मंदिर की तरह चमक रहा था।

लेखक का अनुभव व संदेश: इकतालीसवें दिन का यह अंतिम पड़ाव सिखाता है कि सिद्धि कोई अंतिम मंजिल नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की एक नई शुरुआत है। मोहिनी योगिनी का वरदान 'वाक-सिद्धि' है—अर्थात वह सम्मोहन जो लोगों को जोड़ता है, बिगड़े मार्ग खोलता है और सत्य का प्रभाव स्थापित करता है। शक्ति जब तक तप और मर्यादा के घेरे में रहती है, तब तक अमृत है; मर्यादा टूटने पर वही विष बन जाती है। सच्चा साधक वह नहीं जो शक्ति का प्रदर्शन करे, बल्कि वह है जो शक्ति पाकर और अधिक विनीत व मौन हो जाए।

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