नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 10: मघा नक्षत्र | Magha Nakshatra | पितरों का राजसी सिंहासन और केतु चेतना

अध्याय १०: मघा नक्षत्र

पितरों का राजसी सिंहासन और केतु की पैतृक चेतना

१. नक्षत्र का मूल परिचय

  • राशि चक्र में स्थिति: सिंह राशि (००°००' से १३°२०' तक - यह राशि चक्र का चतुर्थ मुख्य संधिकाल/गंडांत का प्रारंभ है)।
  • नक्षत्र स्वामी (ग्रह): केतु (वैराग्य, प्रारब्ध, और पैतृक डीएनए चेतना का कारक)।
  • अधिष्ठाता देव: पितर (Ancestors - कुल के पूर्वज, रक्षक देव)।
  • तत्व: अग्नि (राजसी, प्रखर, स्वाभिमानी और ऊर्ध्वगामी)।
  • वर्ण: शूद्र (परिश्रम के बाद मिलने वाले सर्वोच्च राजसी पद का सूचक)।
  • प्रतीक चिह्न: राजसी सिंहासन (Royal Throne), या राजा का पालकी।
  • शारीरिक अंग चेतना: हृदय, पीठ, रीढ़ की हड्डी, और धमनियां (Arteries)।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

मघा नक्षत्र कालपुरुष की कुंडली का दशम श्वास और कुल के गौरव का उदय है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न मघा नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत नेतृत्व क्षमता', 'अगाध पैतृक स्वाभिमान' और 'परंपराओं के प्रति निष्ठा' जाग्रत होती है।

केतु और सूर्य का प्रखर संगम: यह नक्षत्र पूर्ण रूप से सिंह राशि (स्वामी: सूर्य - राजा) के भीतर आता है, परन्तु इसका अपना स्वामी केतु (अतीत/वैराग्य) है। सूर्य का राजसी ठाट जब केतु के प्रारब्ध संस्कारों से मिलता है, तो जातक जन्मजात रूप से एक 'शासक' या 'कुलदीपक' की तरह व्यवहार करता है। मघा का अर्थ ही है 'महान' या 'विशाल'।

सिंहासन का सिद्धांत: इसका प्रतीक 'राजसी सिंहासन' है। इसका अर्थ है कि मघा जातक को जीवन में कभी न कभी समाज या करियर में सर्वोच्च सत्ता का पद निश्चित रूप से प्राप्त होता है। वह किसी के अधीन रहकर काम करना पसंद नहीं करता।

महत्वपूर्ण तथ्य: इन जातकों के भीतर अपने माता-पिता और कुल के पूर्वजों (पितरों) का डीएनए बहुत सक्रिय होता है। यदि ये अपने पितरों का सम्मान न करें, तो इनका भाग्य पूरी तरह ठप हो जाता है। इन्हें प्रशासनिक सेवाओं (IAS), राजनीति, बड़े कॉर्पोरेट घरानों के चेयरमैन, पुरातत्व विभाग (Archaeology), और पैतृक संपत्ति के प्रबंधन में सर्वोच्च सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: पितृलोक की स्थापना और अर्यमा देव का प्राकट्य (विष्णु पुराण से)

सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी ने जब जीवों का निर्माण किया, तो उन्होंने देवलोक के साथ-साथ एक विशेष लोक बनाया जिसे 'पितृलोक' कहा गया। इस लोक के अधिपति भगवान 'अर्यमा' (जो सूर्य के भाई और पितरों के राजा हैं) बनाए गए। पितर वे दिव्य चेतनाएँ हैं जो मनुष्य के मरने के बाद उसके कुल की रक्षा करती हैं और उसे आशीर्वाद देती हैं। मघा नक्षत्र इसी पितृलोक और अर्यमा देव की राजसी चेतना का साक्षात् प्रवेश द्वार है, जो जातक को कुल का रक्षक बनाता है।

कथा २: भगीरथ की घोर तपस्या और पितरों का उद्धार (भागवत पुराण से)

राजा सगर के ६० हजार पुत्र कपिल मुनि के शाप से जलकर भस्म हो गए थे और उनकी आत्माएं श्मशान में भटक रही थीं। उनके उद्धार के लिए उनके वंशज राजा भगीरथ ने हजारों वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर घोर तप किया। उन्होंने साक्षात् गंगा जी को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा और भगवान शिव की जटाओं में बांधा। गंगा के पवित्र जल के स्पर्श से सगर के ६० हजार पितरों को मुक्ति मिली और वे विमान पर बैठकर स्वर्ग गए। यह कथा दर्शाती है कि मघा नक्षत्र का जातक अपने कुल के उद्धार के लिए प्रचंड पुरुषार्थ करने का सामर्थ्य रखता है।

कथा ३: भगवान श्रीराम द्वारा गया तीर्थ में पितृ-तर्पण की कथा (वाल्मीकि रामायण से)

वनवास के समय जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण गया तीर्थ (फल्गु नदी के तट) पर पहुँचे, तो राजा दशरथ की आत्मा ने साक्षात् प्रकट होकर अन्न की मांग की। श्रीराम भोजन सामग्री लेने वन में गए थे, परन्तु पिंड-दान का समय निकला जा रहा था। तब माता सीता ने फल्गु नदी, वट वृक्ष और गौ माता को साक्षी मानकर बालू (रेत) का पिंड बनाकर राजा दशरथ को अर्पित कर दिया। दशरथ की आत्मा ने सहर्ष उसे स्वीकार किया और आशीर्वाद दिया। यह कथा सिद्ध करती है कि मघा नक्षत्र का सीधा संबंध 'पितृ ऋण' से मुक्ति पाने से है।

कथा ४: भीष्म पितामह का इच्छा-मृत्यु वरदान और सूर्य के उत्तरायण की प्रतीक्षा (महाभारत से)

कुरुक्षेत्र के युद्ध में बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने ५८ दिनों तक अपने प्राणों को रोक कर रखा, क्योंकि वे सूर्य के उत्तरायण होने और मघा-शुक्ल अष्टमी की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे साक्षात् अष्ट वसुओं के अंश थे। उन्होंने अपने पितरों का स्मरण करते हुए योग-मार्ग से शरीर का त्याग किया। भीष्म का यह राजसी और अनुशासित अंत मघा के सिंह-स्वभाव (अडिगता) को दर्शाता है।

कथा ५: ऋग्वेद की 'पितृ सूक्त' चेतना और स्वाधा मन्त्र

ऋग्वेद के दसवें मण्डल में पितृ सूक्त का सुंदर वर्णन है। ऋषि प्रार्थना करते हैं, "उदीरतामवरे उत्परास..."—अर्थात हमारे जो पूर्वज पाताल में हैं, आकाश में हैं या अंतरिक्ष में हैं, वे इस कुशा के आसन पर आएं और हमारा पोषण करें। वेदों के अनुसार, 'स्वाधा' मन्त्र के बिना पितर आहुति स्वीकार नहीं करते। मघा जातक के भीतर यही पैतृक आशीर्वाद का सुरक्षा कवच होता है।

कथा ६: राजा नहुष का अहंकार और अगस्त्य के शाप से अजगर बनना

इन्द्र के छिपने के बाद जब राजा नहुष को अस्थाई रूप से स्वर्ग का सिंहासन मिला, तो वे अहंकार में अंधे हो गए। उन्होंने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी शची को अपनी पालकी उठाने का आदेश दिया और ऋषियों को पालकी में जोत दिया। अगस्त्य ऋषि को उन्होंने लात मारकर कहा—"सर्प सर्प" (तेज चलो)। अगस्त्य ने शाप दे दिया, "तू अभी सर्प (अजगर) बनकर पृथ्वी पर गिर।" यह कथा चेताती है कि मघा नक्षत्र का राजसी सिंहासन यदि अहंकार से कलंकित हो जाए, तो भयंकर पतन निश्चित है।

कथा ७: नचिकेता का यमराज के महल में पितरों के रहस्यों को जानना

जब नचिकेता यमपुरी गए, तो यमराज ने उन्हें आत्मा के अमरत्व के साथ-साथ यह भी सिखाया कि कैसे पितरों की तृप्ति से जातक की बुद्धि तीक्ष्ण होती है। यमराज ने कहा, "जो अपने पूर्वजों के संस्कारों (Values) को जीवित रखता है, उसे विधाता कभी सिंहासन से नीचे नहीं गिराता।"

कथा ८: सती के आत्मदाह के बाद शिव का वीरभद्र को प्रकट कर दक्ष का सिंहासन तोड़ना

जब दक्ष ने शिव का अपमान किया, तो शिव के क्रोध से प्रकट हुए वीरभद्र ने दक्ष के राजदरबार में घुसकर उसके भव्य सिंहासन को तोड़ दिया और उसका सिर काट दिया। बाद में शिव ने दया कर दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगाया। यह कथा दर्शाती है कि मघा (केतु) की क्रोधाग्नि अधर्मी राजाओं के सिंहासन को पल भर में भस्म कर सकती है।

कथा ९: राजा हरिश्चन्द्र का विश्वामित्र को अपना पूरा साम्राज्य सौंपना

सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने अपने स्वप्न में किए गए वादे को निभाने के लिए साक्षात् विश्वामित्र को अपना पूरा राजसी सिंहासन, राजमुकुट और खजाना सहर्ष दान कर दिया और स्वयं एक वस्त्र में महल से बाहर निकल गए। यह मघा के केतु तत्व (वैराग्य) को प्रकट करता है—जब आत्मा सिंहासन को लात मारकर सत्य की खोज में निकल जाती है।

कथा १०: उपनिषदों का 'पितृयान मार्ग' चेतना रहस्य

छान्दोग्य उपनिषद में दो मार्गों का वर्णन है—देवयान (नक्षत्रों का मार्ग) और 'पितृयान मार्ग' (चन्द्रमा और धुएं का मार्ग)। उपनिषद कहते हैं कि मघा नक्षत्र इसी पितृयान मार्ग का मुख्य द्वार है, जहाँ से आत्माएं अपने कर्मों का फल भोगने के बाद पुनः अपने कुल में जन्म लेती हैं।

कथा ११: कार्तिकेय का मघा नक्षत्र के दिन पितृ देवों की पूजा करना

तारकासुर के वध से पूर्व कार्तिकेय ने अपने कुल के पूर्वजों (पितरों) और अर्यमा देव की विशेष पूजा की थी। पितरों ने उन्हें एक अभेद्य कवच दिया, जिसे कोई भी आसुरी शक्ति भेद नहीं सकती थी। यह जातक की 'पैतृक सुरक्षा कवच' की शक्ति को दर्शाता है।

कथा १२: युधिष्ठिर द्वारा महाभारत युद्ध के बाद मृत वीरों का तर्पण

युद्ध की समाप्ति के बाद, महाराज युधिष्ठिर ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में मारे गए करोड़ों योद्धाओं (चाहे वे पाण्डव हों या कौरव) की आत्मा की शांति के लिए गंगा तट पर एक विशाल पितृ-तर्पण और श्राद्ध का आयोजन किया। उस समय गंगा का जल रक्त से मिश्रित होकर भी पवित्र हो गया। यह मघा के 'कर्तव्य और कुल शुद्धि' को प्रकट करता है।

कथा १३: रावण के भाई कुबेर का 'पुष्पक विमान' और लंका का सिंहासन

कुबेर ने अपनी कठिन तपस्या से ब्रह्मा जी से पुष्पक विमान और लंका का राजसी सिंहासन (पालकी) प्राप्त किया था। परन्तु उनके सौतेले भाई रावण ने अपने बाहुबल से कुबेर को लंका से निकाल दिया और उनका सिंहासन छीन लिया। कुबेर ने क्रोध नहीं किया और अलकापुरी चले गए। यह सिंहासन के लिए होने वाले पारिवारिक संघर्ष को दर्शाता है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का माता देवकी के छह मृत पुत्रों को पाताल से लाकर मिलाना

कंस द्वारा मारे गए देवकी के छह पुत्रों (जो पूर्वजन्म के शापित जीव थे) को श्रीकृष्ण पाताल लोक से राजा बलि के पास से वापस लेकर आए। उन्होंने माता देवकी को उनके मरे हुए पुत्रों के दर्शन कराए, जिससे देवकी की आत्मा तृप्त हुई और उन बालकों को मोक्ष मिला। यह 'अतीत के मृत बंधनों को मुक्त करने' की मघा चेतना है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा इक्ष्वाकु वंश के पैतृक इतिहास का वर्णन

श्रीराम के विवाह के समय गुरु वशिष्ठ ने दशरथ के राजदरबार में इक्ष्वाकु वंश के राजा मनु, दिलीप, रघुकुल से लेकर दशरथ तक के गौरवशाली पैतृक इतिहास (Lineage) का बखान किया था। उस गौरव को सुनकर पूरी सभा स्तब्ध रह गई। मघा जातक के भीतर यही 'वंश का गौरव' (Royal Lineage) हिलोरे लेता है।

कथा १६: राजा दुष्यंत का अपने पुत्र भरत को शकुंतला के साथ पुनः अपनाना

शाप के कारण शकुंतला को भूल चुके दुष्यंत को जब अंगूठी मिली, तो वे घोर ग्लानि में डूब गए। वर्षों बाद जब वे मारीच ऋषि के आश्रम में गए और सिंह के दांत गिनते हुए बालक भरत को देखा, तो उनके भीतर का डीएनए जाग्रत हुआ। उन्होंने शकुंतला को पुनः स्वीकार किया और भरत को अपना उत्तराधिकारी बनाकर सिंहासन पर बिठाया।

कथा १७: समुद्र मंथन से राजाओं के वैभव हेतु 'उच्चैःश्रवा' अश्व का प्राकट्य

मंथन से जब सात मुखों वाला दिव्य उच्चैःश्रवा घोड़ा प्रकट हुआ, तो उसकी राजसी चाल को देखकर स्वयं सूर्य देव सम्मोहित हो गए। इसे इन्द्र को दिया गया जो राजाओं के वाहनों का राजा है। मघा नक्षत्र इसी राजसी वाहन और पालकी का साक्षात् प्रतीक है।

कथा १८: राधारानी का वृषभानु के राजदरबार में 'राजकुमारी' रूप

राधारानी केवल एक गोपी नहीं थीं, वे राजा वृषभानु की परम पूज्य राजकुमारी थीं। उनके महल का वैभव किसी सम्राज्ञी से कम नहीं था। मघा नक्षत्र की जो सिंह राशि की चेतना है, वह साक्षात् इसी राजकुमारी तत्व को दर्शाती है—स्वाभिमानी, मर्यादा से युक्त और ऐश्वर्यशाली।

कथा १९: पुरु द्वारा अपने पिता ययाति को अपना यौवन दान देना

जब राजा ययाति को शुक्राचार्य के शाप से समय से पूर्व बुढ़ापा मिल गया, तो उन्होंने अपने पुत्रों से उनका यौवन मांगा। केवल उनके सबसे छोटे पुत्र 'पुरु' ने पैतृक कर्तव्य का पालन करते हुए अपना यौवन पिता को दे दिया और स्वयं बूढ़ा हो गया। ययाति ने प्रसन्न होकर पुरु को ही अपने विशाल साम्राज्य का सम्राट बनाया। यह 'पितृ-भक्ति' की पराकाष्ठा है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का सिद्धार्थ रूप में राजसी सिंहासन को लात मारना

कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ के पास सब कुछ था—सुंदर पत्नी, पुत्र राहुल और राजा शुद्धोधन का भव्य सिंहासन। परन्तु केतु (वैराग्य) के तीव्र विस्फोट के कारण, एक रात वे चुपके से अपने महलों और सिंहासन को छोड़कर सत्य की खोज में जंगलों की ओर चल पड़े। यह मघा के 'सिंहासन से वैराग्य' के परम सूत्र को सिद्ध करता है।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा राजाओं के लिए 'दण्ड नीति' का निर्माण

ब्रह्मा जी ने जब देखा कि समाज में अराजकता फैल रही है, तो उन्होंने सूर्य पुत्र मनु को प्रथम राजा बनाया और उन्हें 'राज-दण्ड' (सिंहासन की शक्ति) सौंपा। ब्रह्मा जी ने मघा नक्षत्र को इस राज-दण्ड का केंद्र बनाया ताकि न्याय में राजा का स्वाभिमान बना रहे।

कथा २२: समुद्र मंथन से अप्सराओं का प्राकट्य और राजसी नृत्य

मंथन से अत्यंत सुंदर और कलाप्रवीण अप्सराएँ (रंभा, मेनका आदि) प्रकट हुईं, जो राजाओं के दरबार की शोभा बनीं। मघा नक्षत्र कला और ऐश्वर्य के उस राजसी प्रकटीकरण को दर्शाता है जो समाज के उच्च वर्ग (Elite Class) को आकर्षित करता है।

कथा २३: गुरु वशिष्ठ द्वारा श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी

जब दशरथ ने श्रीराम को राजा बनाने का निर्णय लिया, तो गुरु वशिष्ठ ने मघा और पुष्य के शुभ योगों का आकलन कर राज्याभिषेक की दिव्य सामग्रियाँ (सोने का सिंहासन, औषधियाँ, पवित्र नदियों का जल) एकत्रित करवाईं। भले ही बाद में कैकेयी के हठ से राम वन गए, परन्तु यह पैतृक अधिकार का आख्यान है।

कथा २४: अर्जुन का अपने पुत्र अभिमन्यु के वध पर घोर प्रतिशोध

जब चक्रव्यूह में जयद्रथ के कारण अभिमन्यु का क्रूरता से वध कर दिया गया, तो अर्जुन का पैतृक हृदय तड़प उठा। उन्होंने गांडीव हाथ में लेकर प्रतिज्ञा की कि 'यदि कल सूर्यास्त से पहले मैंने जयद्रथ का वध नहीं किया, तो मैं स्वयं अग्नि समाधि ले लूँगा।' यह पैतृक ऋण और प्रतिशोध की भीषण अग्नि है।

कथा २५: सूफी मत का 'सजदा' और उपनिषदों का अहम् ब्रह्मास्मि सूत्र

यजुर्वेद का महावाक्य है—'अहम् ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ - पूर्ण राजसी दावा)। सूफी मत में 'सजदा' का अर्थ है उस परम शहंशाह (अल्लाह) के सिंहासन के सामने झुकना। मघा नक्षत्र जातक को सिखाती है कि तुम्हारा सिर केवल ईश्वर के सामने झुकना चाहिए, संसार के सामने नहीं।

कथा २६: शेर (सिंह) का वन में अपनी दहाड़ से साम्राज्य घोषित करना

एक सिंह जब जंगल में दहाड़ता है, तो मील दूर तक के हिंसक पशु शांत हो जाते हैं और मान लेते हैं कि राजा आ गया है। सिंह कभी शिकार के लिए किसी से भीख नहीं मांगता, वह अपने बाहुबल से छीनता है। यह कथा जातक को उसका 'स्वाभिमान' याद दिलाती है।

कथा २७: पितर देवों का परम महा-केतु चेतना में महा-विलीनीकरण

महाप्रलय के समय, पितरों के राजा अर्यमा और ब्रह्मांड के समस्त पूर्वजों की आत्माएं अपनी स्मृतियों और पैतृक कड़ियों (DNA) को समेटकर साक्षात् 'महा-केतु' (परम मोक्ष शून्य) में विलीन हो जाती हैं। वहाँ न कोई वंश रहता है, न कोई कुल। केवल एक अनंत चेतना शेष रहती है। यह मघा नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः।
प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः अक्षन्नपितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः॥

पौराणिक मन्त्र

ॐ मघाधिपतिं अर्यमा देवं पितृलोकपालकम्।
राजपद-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं कुलरक्षकम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ॐ घं मघानक्षत्राभ्यां नमः॥
या ॐ कें केतवे नमः॥

विधि

मघा नक्षत्र (विशेषकर पितृपक्ष या अमावस्या को) वाले दिन तांबे के पात्र में जल लेकर उसमें काले तिल, जौ, और सफेद फूल मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम से 'तर्पण' करें। कुश के आसन पर बैठकर तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

अहंकार और जिद्द का त्याग (Subdue the Ego): सिंह राशि के प्रभाव से आपके भीतर 'मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ' का भाव बहुत जल्दी आ जाता है, जिससे आप कार्यस्थल पर अपने बॉस या घर में बड़ों का अपमान कर देते हैं। जीवन बदलने का सूत्र है—"विनम्रता ही आपका असली मुकुट है।"

पितृ ऋण से मुक्ति: यदि आपके घर में निरंतर कलह रहती है, धन आकर तुरंत चला जाता है, या संतान बाधा है, तो मान लें कि आपके पितर रुष्ट हैं। वर्ष में एक बार गया तीर्थ या हरिद्वार जाकर पितरों के नाम से श्राद्ध अवश्य कराएं।

अतीत को छोड़ें (Drop the Past): केतु स्वामी होने के कारण आपका मन हमेशा पुरानी यादों, पुरानी दुश्मनों या पुरानी सफलताओं में अटका रहता है। वर्तमान में जीना सीखें।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

इतिहास: जब राजा भगीरथ के तप से गंगा पृथ्वी पर आईं और सगर के ६० हजार पितरों की भटकती आत्माओं को एक क्षण में स्वर्ग का सिंहासन मिल गया, तब ब्रह्मा जी ने इस महान 'पैतृक शुद्धि' के सम्मान में सिंह राशि के प्रारंभिक बिंदु पर 'मघा' (चमकता हुआ हँसियाकार तारा/Regulus) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार पितरों को सौंपा।

अचूक उपाय

  1. वनस्पति उपाय: इसका पूज्य वृक्ष 'बरगद' (वट वृक्ष) है, जो दीर्घायु और पितरों का वास माना जाता है। मघा नक्षत्र के दिन वट वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध और जल चढ़ाएं और उसकी धूल मस्तक पर लगाएं।
  2. पैतृक संपत्ति का उपाय: अपने घर की दक्षिण दिशा में अपने स्वर्गीय माता-पिता या पूर्वजों की एक सुंदर श्वेत-श्याम (Black & White) चित्र स्थापित करें और उन पर चंदन लगाएं। (ध्यान रहे, चित्र कभी भी मंदिर में देवताओं के साथ न रखें)। यह पितृ दोष को तत्क्षण दूर करता है।
  3. जीव सेवा: मघा नक्षत्र के दिन सफेद रंग के कुत्तों को दूध-रोटी खिलाना, या किसी लंगड़े/अंधे भिखारी को भोजन कराना आपके केतु के सारे मंदे फल को मिटा देता है।

🌌 नक्षत्र पुराण संहिता — मास्टर पोस्ट

अश्विनी से रेवती तक सभी २७ नक्षत्रों का सम्पूर्ण रहस्य, पौराणिक कथाएँ, देवता, मन्त्र, साधना एवं अचूक उपाय एक ही स्थान पर पढ़ें।

📖 सम्पूर्ण २७ नक्षत्र पढ़ें ➔

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.