आत्म चेतना रहस्य (खंड 2) : चेतना की 4 अवस्थाएँ एवं कर्म-सिद्धांत
(मांडूक्य उपनिषद्, तुरीय चेतना, कारण शरीर एवं पुनर्जन्म चक्र की गूढ़ मीमांसा)
अध्याय 3: चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ — मांडूक्य उपनिषद् का अमर रहस्य
जिज्ञासु: पंडित जी, पूर्व अध्याय में कठोपनिषद् के रथ-रूपक से यह स्पष्ट हुआ कि नियंत्रण कहाँ होना चाहिए। परंतु जब हम रात्रि में गाढ़ी नींद में सो जाते हैं, तब यह आत्मा कहाँ विलीन हो जाती है? निद्रा में तो हमें देह का किंचित् भी भान नहीं रहता।
नरेन्द्र पंडित: यह अत्यंत गूढ़ प्रश्न है। मांडूक्य उपनिषद् में मानवीय चेतना की चार अवस्थाओं का प्रामाणिक विवेचन मिलता है, जिन्हें समझे बिना आत्म-तत्व का पूर्ण बोध असंभव है:
1. जाग्रत अवस्था (Waking State):
इस अवस्था में चेतना बहिर्मुखी होती है। हम अपनी पांचों ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से स्थूल जगत का दर्शन, श्रवण और स्पर्श करते हैं। इसमें स्थूल शरीर और जाग्रत मन दोनों सक्रिय रहते हैं।
2. स्वप्न अवस्था (Dream State):
शय्या पर लेटते ही स्थूल देह शिथिल हो जाती है और चेतना अंतर्मुखी हो जाती है। इंद्रियाँ शांत होती हैं, परंतु 'मन' एक नवीन जगत रच लेता है। स्थूल नेत्रों के बिना दृश्य दिखते हैं, पैरों के बिना गति होती है और भय-हर्ष की अनुभूति पूर्णतः वास्तविक प्रतीत होती है। शरीर निष्क्रिय है, किंतु मन जाग्रत है।
3. सुषुप्ति अवस्था (Deep Sleep):
जब कोई स्वप्न नहीं होता, केवल अगाध, गहन निद्रा होती है। मन और विचार शून्य हो जाते हैं। प्रातः जागने पर मनुष्य कहता है—"आज बहुत सुखद निद्रा आई, मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं रहा।" यदि निद्रा में सब कुछ नष्ट हो गया था, तो यह गवाही कौन दे रहा है कि 'मुझे कुछ ज्ञात नहीं था'? वह साक्षी चेतना ही आत्मा है, जो मन और बुद्धि के सोने पर भी निरंतर जाग्रत रहती है।
4. तुरीय अवस्था (The Transcendental State):
जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ परिवर्तित होती रहती हैं, किंतु 'तुरीय' वह विशुद्ध, अखंड चेतना है जो इन तीनों का आधार और साक्षी है। ध्यान की पराकाष्ठा व समाधि में योगी इस अवस्था में प्रविष्ट होते हैं। यहाँ पहुँचकर जीवात्मा साक्षात अनुभव करती है कि वह न देह है, न मन, न शून्यता—वह केवल शुद्ध, नित्य, आनंदमय आत्म-तत्व है। इसी अवस्था की प्राप्ति 'मोक्ष' कहलाती है।
अध्याय 4: पुनर्जन्म चक्र और कर्मों की गुप्त पोटली (कारण शरीर)
जिज्ञासु: पंडित जी, जब आत्मा इतनी विशुद्ध और नित्य है, तो उसे बार-बार विभिन्न योनियों और शरीरों में जन्म क्यों लेना पड़ता है? कोई राजप्रासाद में जन्म लेता है, तो कोई अत्यंत निर्धन कुल में। इस विषमता का मूल कारण क्या है?
नरेन्द्र पंडित: यहाँ सनातन धर्म का सबसे अकाट्य विधान सामने आता है, जिसे हम 'कर्म-सिद्धांत' (Law of Karma) कहते हैं। सूर्य का प्रकाश अशुद्ध नाले पर भी पड़ता है और पवित्र गंगाजल पर भी, परंतु सूर्य न मलिन होता है न पावन; वह केवल प्रकाश देता है। आत्मा निर्लिप्त ऊर्जा है, परंतु जब वह देह धारण करती है, तो मन और इंद्रियों द्वारा किए गए शुभ-अशुभ कर्मों के संस्कार एक सूक्ष्म पटल पर अंकित होते जाते हैं। इसे शास्त्रों में 'कारण शरीर' (Causal Body) कहा गया है।
⚖️ वासनाएँ एवं पुनर्जन्म का चक्र:
मृत्यु के समय केवल यह स्थूल हाड़-मांस का ढाँचा छूटता है। परंतु अपूर्ण कामनाओं, वासनाओं और जन्म-जन्मांतर के कर्मों का संचित खाता (कारण शरीर) जीवात्मा के साथ यात्रा करता है। यदि किसी का संपूर्ण जीवन केवल धन संचय और भोग की तीव्र पिपासा में बीता और अचानक देहांत हो गया, तो वह अतृप्त संस्कार शांत नहीं होते। उस वासना की तृप्ति हेतु प्रकृति उसे पुनः उपयुक्त परिवेश, माता-पिता और शरीर प्रदान करती है ताकि वह अपने बोए गए बीजों का फल भोग सके।
जिज्ञासु: इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं? ईश्वर हमें सुख अथवा दुःख नहीं दे रहे हैं?
नरेन्द्र पंडित: (मुस्कुराते हुए) सर्वथा सत्य! अज्ञानवश मनुष्य ईश्वर पर आक्षेप लगाता है कि "हे प्रभु! मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?" परंतु परमात्मा मात्र एक निष्पक्ष, तटस्थ व्यवस्थापक हैं। आज जो सुख या दुःख आपको मिल रहा है, वह आपके ही अतीत के बीजों का फल है। और आज आप जो कर्म कर रहे हैं, वह आपके कल और अगले जन्म की आधारशिला रख रहा है। जिस दिन साधक 'निष्काम कर्म' सीख लेता है—अर्थात कर्तव्य करता है किंतु फल की आसक्ति से मुक्त हो जाता है—उस दिन संचित कर्मों की पोटली ज्ञान की अग्नि में भस्म हो जाती है। वही अवस्था मोक्ष (परमात्मा में विलीन हो जाना) है।
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