नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 14: चित्रा नक्षत्र | Chitra Nakshatra | त्वष्टा, मंगल और रत्न चेतना

नक्षत्र पुराण संहिता

अध्याय १४: चित्रा नक्षत्र

ब्रह्मांडीय शिल्पी और त्वष्टा की रत्न चेतना

Chitra Nakshatra | Cosmic Craftsman | Tvashta | Gem Consciousness

१. नक्षत्र का मूल परिचय

राशि चक्र में स्थिति:
२३° २०' कन्या राशि से ०६° ४०' तुला राशि तक (यह राशि चक्र का चतुर्थ मुख्य संधिकाल है)।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
मंगल — प्रचंड ऊर्जा, निर्माण बल और तीक्ष्ण कर्म का कारक।
अधिष्ठाता देव:
त्वष्टा (विश्वकर्मा — देवताओं के महान शिल्पी, वास्तुकला और मायावी रूप के देव)।
तत्व:
अग्नि/वायु संधिकाल — रचनात्मक, तीक्ष्ण और अद्भुत रूप-परिवर्तनकारी।
वर्ण:
कृषक/वैश्य — कलात्मक निर्माण और रत्नों के व्यापार का सूचक।
प्रतीक चिह्न:
एक चमकता हुआ चमकीला रत्न (Pearl/Gem), या शिल्पी का औजार।
शारीरिक अंग चेतना:
माथा, गर्दन की नसें, आमाशय का निचला हिस्सा और गुर्दे (Kidneys)।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

चित्रा नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का चतुर्दश श्वास और ब्रह्मांडीय सौंदर्य का शिल्प है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न चित्रा नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत सृजनशीलता', 'रत्नों और आभूषणों के प्रति आकर्षण', और 'भवन निर्माण का हुनर' जाग्रत होता है।

  • मंगल और बुध-शुक्र का संधिकाल: इसके प्रथम दो चरण कन्या राशि (बुध) में आते हैं, जो जातक को एक अत्यंत तीक्ष्ण इंजीनियर, शिल्पकार, ड्राफ्ट्समैन या गणितज्ञ बनाते हैं। इसके अंतिम दो चरण तुला राशि (शुक्र) में आते हैं, जो कला, सौंदर्य, फैशन डिजाइनिंग और लक्ज़री वास्तुकला (Architecture) का योग बनाते हैं। नक्षत्र स्वामी मंगल होने के कारण जातक में औजारों को चलाने का अपूर्व पराक्रम होता है।
  • रत्न का सिद्धांत: इसका प्रतीक 'चमकीला रत्न' है। जिस प्रकार एक पत्थर तराशे जाने के बाद बहुमूल्य हीरा या मोती बनता है, वैसे ही चित्रा जातक विपरीत परिस्थितियों में रगड़ खाकर अपने व्यक्तित्व को एक रत्न की तरह चमकाता है।
  • महत्वपूर्ण तथ्य: इन जातकों का बाहरी आभामंडल बहुत आकर्षक होता है। ये लोग बहुत अच्छे डिजाइनर और मूर्तिकार होते हैं। इन्हें सिविल इंजीनियरिंग, रत्न विज्ञान (Gemology), ज्वैलरी डिजाइनिंग, ग्राफिक डिजाइन और अत्याधुनिक तकनीकी निर्माण (जैसे एयरोस्पेस/मशीनरी) में वैश्विक सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: देवताओं के शिल्पी त्वष्टा (विश्वकर्मा) का प्राकट्य और दिव्य अस्त्र निर्माण (विष्णु पुराण से)

सृष्टि के निर्माण के समय ब्रह्मा जी के संकल्प से देवताओं के आदि-शिल्पी 'त्वष्टा' (विश्वकर्मा) प्रकट हुए। त्वष्टा के पास ब्रह्मांड की हर वस्तु को एक सुंदर रूप देने की कला थी। उन्होंने ही देवताओं के भव्य महलों, इन्द्रपुरी और यमपुरी का निर्माण किया। जब सूर्य देव का तेज असहनीय हो गया, तो त्वष्टा ने ही सूर्य को अपनी खराद पर चढ़ाकर उनके तेज को छीलकर शांत किया था और उस कटे हुए तेज से भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र और शिव का त्रिशूल बनाया था। चित्रा नक्षत्र इसी त्वष्टा देव की रत्नमयी और जादुई शिल्पकला का साक्षात् आभामंडल है।

कथा २: त्वष्टा द्वारा अपने पुत्र त्रिशिरा का निर्माण और इन्द्र का भय (भागवत पुराण से)

इन्द्र के अहंकार को तोड़ने के लिए त्वष्टा ने अपने तपोबल से तीन सिर वाले एक परम पराक्रमी पुत्र का निर्माण किया, जिसका नाम 'त्रिशिरा' (विश्वरूप) था। त्रिशिरा का एक मुख वेदों का पाठ करता था, दूसरा मदिरापान करता था और तीसरा दिशाओं को देखता था। उसका तेज इतना बढ़ने लगा कि देवराज इन्द्र भयभीत हो गए। इन्द्र ने अपने वज्र से त्रिशिरा के तीनों सिर काट दिए। इस ब्रह्महत्या के पाप से क्रुद्ध होकर त्वष्टा ने यज्ञ की अग्नि से इन्द्र का काल बनने वाले 'वृत्रासुर' को प्रकट किया। यह कथा दर्शाती है कि चित्रा नक्षत्र का जातक जब सृजन करने पर आता है, तो वह ब्रह्मांड को हिलाने वाली शक्ति बना सकता है।

कथा ३: मय दानव द्वारा महाभारत काल में 'इन्द्रप्रस्थ के मायावी महल' का निर्माण (महाभारत से)

जब खाण्डव वन दहन के समय अर्जुन ने मय दानव के प्राण बचाए, तो मय दानव (जो असुरों का महान शिल्पी था और जिसमें त्वष्टा की ऊर्जा थी) ने पाण्डवों के लिए इन्द्रप्रस्थ में एक ऐसा चमकीला और अद्भुत महल बनाया जिसे देखकर दुर्योधन भ्रमित हो गया था। जहाँ सूखा फर्श था वहाँ दुर्योधन को जल दिखाई दिया और उसने अपने वस्त्र ऊपर उठा लिए। यह मायावी और सम्मोहक निर्माण साक्षात् चित्रा नक्षत्र की चरम शिल्पकला का सूचक है।

कथा ४: रावण की लंकापुरी का साक्षात् सोने के महलों के रूप में प्राकट्य (वरहा पुराण से)

पुराणों के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के लिए विश्वकर्मा (त्वष्टा) ने समुद्र के बीच त्रिकूट पर्वत पर साक्षात् सोने की लंका का निर्माण किया था, जिसका सौंदर्य देखकर कुबेर और बाद में रावण मंत्रमुग्ध हो गए थे। रावण ने छल से इसे शिव से दक्षिणा में मांग लिया। लंका की वह रत्नजड़ित दीवारें और स्वर्णिम शिल्प साक्षात् चित्रा की शुक्र-ऊर्जा का प्रतीक हैं।

कथा ५: ऋग्वेद की 'त्वष्टृ सूक्त' चेतना और रूपों का गर्भाधान (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के दसवें मण्डल में त्वष्टा सूक्त का वर्णन है। वेदों के अनुसार, गर्भ के भीतर शिशु के अंगों, उसकी हड्डियों की बनावट और उसके चेहरे के सौंदर्य को जो दिव्य रूप (Design) मिलता है, वह साक्षात् त्वष्टा देव ही प्रदान करते हैं। वे ही जीव के भौतिक शरीर के मुख्य आर्किटेक्ट हैं। चित्रा जातक के भीतर यही 'रूप देने की' नैसर्गिक कला (Designing Attribute) वास करती है।

कथा ६: समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष की चमकीली मणियों का प्राकट्य (पद्म पुराण से)

मंथन के दौरान जब कल्पवृक्ष और पारिजात प्रकट हुए, तो उनके पत्तों से दिव्य और रंग-बिरंगे रत्न गिर रहे थे। विश्वकर्मा ने उन रत्नों को एकत्रित कर देवताओं के मुकुट और आभूषण बनाए। यह 'कच्ची धातु को चमकीले आभूषण में बदलने' के चित्रा स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा ७: भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रातों-रात अभेद्य 'द्वारका नगरी' का निर्माण (भागवत पुराण से)

जरासन्ध के बार-बार होने वाले आक्रमणों से मथुरा वासियों की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने समुद्र के भीतर एक नई नगरी बसाने की योजना बनाई। उन्होंने विश्वकर्मा का आह्वान किया। विश्वकर्मा ने अपने दिव्य शिल्पी औजारों के बल पर रातों-रात समुद्र के भीतर सोने और मणियों से जड़ी अभेद्य 'द्वारकापुरी' का निर्माण कर दिया। यह चित्रा नक्षत्र की 'असंभव और भव्य निर्माण क्षमता' को प्रकट करता है।

कथा ८: सती के ५१ शक्तिपीठों में माता की 'रत्न-जड़ित अंगूठी' का गिरना (कालिका पुराण से)

विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटे सती के अंगों में से, माता के हाथ की एक परम दिव्य रत्न-जड़ित अंगूठी (चित्रा आभूषण) जिस स्थान पर गिरी, वह एक अत्यंत चमकीला शक्तिपीठ बना। वहाँ साधक अपने आभामंडल को रत्न की तरह चमकाने के लिए तान्त्रिक दीक्षा लेते हैं।

कथा ९: अर्जुन का 'किरात युद्ध' के बाद शिव से पाशुपतास्त्र को गांडीव पर सजाना (महाभारत से)

जब शिव ने अर्जुन को पाशुपतास्त्र दिया, तो वह एक चमकीले रत्न की तरह दहक रहा था। अर्जुन ने अपने शिल्पी कौशल से उसे अपने गांडीव धनुष की नोक पर इस तरह प्रतिस्थापित किया कि धनुष का संतुलन और मारक क्षमता अचूक हो गई। यह 'हथियारों और औजारों को तराशने' की चित्रा कला है।

कथा १०: उपनिषदों का 'मणि-पूर चक्र' और आंतरिक रत्न रहस्य (छान्दोग्य उपनिषद से)

उपनिषद कहते हैं कि नाभि के पास स्थित 'मणिपूर चक्र' साक्षात् मणियों और रत्नों का शहर है। जब साधक की ऊर्जा मंगल के बल से इस चक्र को जाग्रत करती है, तो उसका पूरा शरीर निरोगी और तेजस्वी हो जाता है। चित्रा नक्षत्र इसी मणिपूर चक्र की भौतिक और रचनात्मक अभिव्यक्ति है।

कथा ११: कार्तिकेय का मयूर वाहन के चमकीले पंखों का रहस्य (स्कन्द पुराण से)

कार्तिकेय का वाहन मोर है, जिसके पंखों पर साक्षात् मणियों और चन्द्रमा जैसे चमकीले चिह्न (चित्रा रत्न) बने होते हैं। कार्तिकेय ने अपने वाहन के इस चमकीले रूप को स्वयं त्वष्टा देव के आशीर्वाद से प्राप्त किया था, जो यह दर्शाता है कि सौंदर्य के भीतर हमेशा एक तीक्ष्ण मारक क्षमता छिपी होती है।

कथा १२: शिव का 'विश्वकर्मा' रूप और वेदों के मन्त्रों को रथ बनाना (शिव महापुराण से)

त्रिपुरदाह के समय जब शिव के लिए रथ का निर्माण हो रहा था, तो स्वयं शिव ने 'विश्वकर्मा' चेतना धारण कर रथ के पहियों के मणियों को अपने हाथों से कसा था ताकि ब्रह्मांड का भार रथ सहन कर सके। यह चित्रा के 'मेकेनिकल इंजीनियरिंग' (Mechanical Engineering) के हुनर को सिद्ध करता है।

कथा १३: ध्रुव का राजा बनकर अपनी नगरी को मणियों से सजाना (विष्णु पुराण से)

जब ध्रुव सम्राट बने, तो उन्होंने अपनी राजधानी को विश्वकर्मा के माध्यम से ऐसा दिव्य रूप दिया कि महलों की दीवारों पर जड़े रत्नों के प्रकाश से रात्रि में भी दीपक जलाने की आवश्यकता नहीं होती थी। यह चित्रा नक्षत्र के 'लक्ज़री और वैभवशाली जीवन' के शौक को प्रकट करता है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का राजा सत्राजित से 'स्यमंतक मणि' के लिए विवाद (श्रीमद्भागवत से)

राजा सत्राजित के पास सूर्य देव द्वारा दी गई अत्यंत चमकीली 'स्यमंतक मणि' थी, जो प्रतिदिन टनों सोना उगलती थी और जिसके रहने से राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था। उस मणि को पाने के लिए द्वारका में अनेक षड्यंत्र हुए, श्रीकृष्ण पर चोरी का झूठा कलंक लगा, और अंत में जाम्बवन्त से युद्ध कर कृष्ण ने मणि वापस लाकर सत्य को प्रमाणित किया। यह रत्नों के कारण होने वाले संघर्ष की चित्रा कथा है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा राजा मनु को ब्रह्मांड के 'शिल्प-शास्त्र' का उपदेश (रामायण से)

ऋषि वशिष्ठ ने मनु को सिखाया कि एक भव्य मंदिर या भवन का निर्माण केवल पत्थरों को जोड़ना नहीं है, बल्कि दिशाओं के तत्वों (वास्तु) को मणियों की तरह संतुलित करना है। चित्रा नक्षत्र का सीधा संबंध 'वास्तु शास्त्र' और इंटीरियर डिजाइनिंग से है।

कथा १६: सीता माता का रावण की अशोक वाटिका के चैत्य प्रासाद (रत्न महल) को देखना (रामायण से)

अशोक वाटिका में रहते हुए सीता जी ने रावण के उस भव्य 'चैत्य प्रासाद' (हजार खंभों वाले मणियों के महल) को देखा था। हनुमान जी ने लंका दहन के समय सबसे पहले उसी भव्य चैत्य प्रासाद के खंभों को अपने पैरों से तोड़कर नष्ट किया था ताकि रावण का शिल्पी अहंकार चूर हो सके।

कथा १७: समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष के साथ 'विश्वकर्मा के औजारों' का प्रकट होना (वरहा पुराण से)

मंथन के दौरान जब कल्पवृक्ष प्रकट हुआ, तो उसके मूल से साक्षात् विश्वकर्मा के दिव्य औजार (छेनी, हथौड़ी, खराद) प्रकट हुए, जिन्हें ऋषियों ने आदरपूर्वक धातु-शिल्प के विकास के लिए स्वीकार किया। यह 'शिल्प औजारों की पवित्रता' का आख्यान है।

कथा १८: राधारानी का रत्नजड़ित आभूषणों और घाघरे का सम्मोहन (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

गोकुल और बरसाना में राधारानी जब रासलीला के लिए सजती थीं, तो उनके वस्त्रों पर मणियाँ और मोतियों का ऐसा अद्भुत काम (Embroidery) होता था कि चन्द्रमा भी उनका रूप देखकर आकाश में ठहर जाता था। यह फैशन और वस्त्र कला की चित्रा चेतना है।

कथा १९: नल और दमयन्ती की कथा में राजा नल द्वारा मणियों की परख (महाभारत से)

राजा नल को घोड़ों की लगाम थामने के साथ-साथ कीमती रत्नों और मणियों की शुद्धता को पहचानने का भी गज़ब का हुनर था। वे पत्थर को देखकर बता देते थे कि इसके भीतर छुपा हुआ भाग्य क्या है। यह 'रत्न परीक्षक' (Gemologist) के चित्रा स्वभाव को प्रकट करता है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का 'रत्न-चङ्क्रमण' (Jewelled Walk) का दिव्य आख्यान (बौद्ध इतिहास से)

ज्ञान प्राप्ति के दूसरे सप्ताह में, बुद्ध ने बोधि वृक्ष के समीप आकाश में अदृश्य रूप से मणियों और रत्नों के एक मार्ग (Jewelled Walk) का निर्माण किया और उस पर सात दिनों तक ध्यान मग्न होकर चले। यह मन की शक्ति से अदृश्य मणियों को मूर्त रूप देने की चित्रा शक्ति है।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा मूर्तिकला के लिए 'प्रतिमा लक्षण' शास्त्र का निर्माण (शतपथ ब्राह्मण से)

ब्रह्मा जी ने जब देखा कि जीव निराकार ईश्वर को नहीं समझ पा रहे हैं, तो उन्होंने पत्थरों और धातुओं को काटकर सुंदर मूर्तियाँ बनाने के लिए 'प्रतिमा शास्त्र' बनाया। उन्होंने चित्रा नक्षत्र को इसका मुख्य केंद्र बनाया ताकि कलाकार की छेनी कभी पत्थर पर गलत न चले।

कथा २२: समुद्र मंथन से 'कौस्तुभ मणि' का ऐश्वर्यशाली बुध चेतना द्वारा शुद्धीकरण (विष्णु पुराण से)

जब मंथन से कौस्तुभ मणि निकली, तो वह क्षीरसागर के मलबे से ढकी थी। बुध देव (बुद्धि) ने आगे बढ़कर अपनी तीक्ष्ण कला से उसे साफ किया और तराशा, जिसके बाद उसकी स्वर्णिम आभा प्रकट हुई और उसे विष्णु के हृदय पर सजाया गया। यह 'रिफाइनिंग' (Refining) की चित्रा कला है।

कथा २३: गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अर्जुन के लिए 'अद्भुत शस्त्रागार' का निर्माण (महाभारत से)

द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर के राजकुमारों के लिए एक ऐसा शस्त्रागार बनाया था जहाँ चमकीले और अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र सजाए गए थे। अर्जुन उन हथियारों के संतुलन और बनावट (Design) को देखकर मंत्रमुग्ध रहते थे। यह अस्त्र-शिल्प की चित्रा चेतना है।

कथा २४: दुर्योधन का मय दानव के फर्श पर गिरना और द्रौपदी का उपहास (महाभारत से)

इन्द्रप्रस्थ के महल में जब दुर्योधन मणियों के फर्श को पानी समझकर किनारे से जाने लगा, और बाद में साक्षात् जल के कुण्ड को फर्श समझकर उसमें गिर गया, तो उसके वस्त्र भीग गए। द्रौपदी ने झरोखे से देखकर उपहास किया—"अंधे का पुत्र अंधा।" यह मघा के बाद आने वाले चित्रा के 'अहंकार के भ्रम' को सिद्ध करता है।

कथा २५: सूफी मत का 'ताज़ीन' (श्रृंगार/सजावट) और उपनिषदों का ज्योति-रूप सूत्र (सामवेद से)

सूफी मत में एक शब्द है 'ताज़ीन'—अर्थात खुदा के इबादतखाने को और अपनी रूह को कलात्मक रूप से सजाना। सामवेद का सूत्र कहता है कि ईश्वर साक्षात् एक परम चमकीला रत्न है जो हृदय के भीतर छुपा है। चित्रा नक्षत्र इसी आंतरिक और बाहरी श्रृंगार का साक्षात् द्वार है।

कथा २६: सीप (Oyster) के भीतर स्वाति-बिंदु से सुंदर मोती का बनना (प्रकृति-आचार मत)

जब एक सीप समुद्र की सतह पर आकर आकाश की बूंद को अपने भीतर समेटती है, तो वह उसे छुपाकर पाताल में चली जाती है और अपने आंतरिक शिल्प (अग्नि) से उसे दुनिया का सबसे सुंदर 'सच्चा मोती' (Pearl) बनाती है। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'भीतर की रगड़ ही तुम्हें रत्न बनाएगी'।

कथा २७: त्वष्टा देव का परम महा-शिल्प चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, ब्रह्मांड के आदि-शिल्पी त्वष्टा अपनी पूरी वास्तुकला, औजारों, मणियों और कलाओं के रहस्यों को समेटकर साक्षात् 'परम शून्य महा-शिव' में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई रूप बचता है, न कोई रत्न। केवल एक अनंत, अभेद्य शांति शेष रहती है। यह चित्रा नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र
ओम् चित्रा नक्षत्त्रमुदगात्पुरस्ताद्विश्वा रूपाणि प्रथयन्जजान। सा नः पशून्विश्वरूपान्प्रयच्छास्ता अन्नं समञ्जायन्ता तं प्रत्नथा यं वेधस्वतः॥
पौराणिक मन्त्र
ओम् चित्राधिपतिं त्वष्टारं देवं शिल्पीश्वरम्। रत्न-वास्तु-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं विश्वकर्मस्वरूपिणम्॥
तन्त्र बीज मन्त्र
ओम् प्रं चित्रानक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् मं मङ्गलाय नमः॥

विधि

चित्रा नक्षत्र वाले दिन मंगलवार (या हस्त-चित्रा योग) को सुबह के समय तांबे के आसन या लाल कपड़े पर भगवान विश्वकर्मा या हनुमान जी का चित्र स्थापित करें। चमेली के तेल में सिन्दूर मिलाकर दीपक जलाएं। मूंगे या रुद्राक्ष की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें। जाप के बाद किसी कुशल शिल्पी या मजदूर को औजार या तांबे का बर्तन दान करें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

बाहरी चमक-दमक के भ्रम से बचें (Avoid Superficial Illusion):

मय दानव के महल की तरह आप बहुत जल्दी लोगों के बाहरी रूप, ब्रांडेड कपड़ों और लक्ज़री लाइफस्टाइल से प्रभावित हो जाते हैं और उनके भीतर के चरित्र को नहीं देख पाते, जिससे आपको व्यापार या प्रेम में बड़ा धोखा मिलता है।

जीवन बदलने का सूत्र है— "चमक के पीछे भागने के बजाय पत्थर के भीतर छिपे असली रत्न (चरित्र) को पहचानें।"

औजारों और गैजेट्स का सम्मान करें

मंगल स्वामी होने के कारण आपके पास लैपटॉप, मोबाइल या इंजीनियरिंग टूल्स बहुत होते हैं। कभी भी अपने काम के औजारों को गंदा न रखें, न ही उन्हें पैर लगाएं। इनकी नियमित सफाई और पूजा आपके करियर की रुकावटों को तत्क्षण दूर कर देगी।

क्रोध की धार को सृजन में बदलें

आपके भीतर एक तीक्ष्ण स्वभाव (Sharp Tongue) होता है। आप अपनी कड़वी वाणी से दूसरों के दिलों को काट देते हैं। अपने इस तीखेपन को रचनात्मक डिजाइनिंग, राइटिंग या कोडिंग में लगाएं।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

नक्षत्र बनने का इतिहास

जब त्वष्टा देव ने सूर्य के प्रचंड तेज को छीलकर सुदर्शन चक्र और त्रिशूल जैसे ब्रह्मांड के रक्षक अस्त्र बनाए और सृष्टि को सुंदर रूप दिया, तब ब्रह्मा जी ने कन्या और तुला राशि के इस परम कलात्मक संधिकाल पर 'चित्रा' (आकाश का सबसे चमकीला रत्न जैसा तारा/Spica) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार त्वष्टा देव तथा मंगल को सौंपा।

अचूक उपाय

  1. वनस्पति उपाय: इसका पूज्य वृक्ष 'बेल' (बिल्व का वृक्ष) है। चित्रा नक्षत्र के दिन बेल के वृक्ष की जड़ में मीठा जल चढ़ाएं और उसके सात पत्तों पर लाल चंदन से 'ओम्' लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करें। यह आपके मंगल और शुक्र के दोषों को साक्षात् राजयोग में बदल देगा।
  2. रत्न शुद्धि महा-उपाय: इस नक्षत्र के दिन अपने दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली में चांदी या तांबे में जड़ा एक 'सच्चा मोती' या 'ओपल' धारण करना आपके मानसिक भटकाव को शांत कर आर्थिक स्थिति को अत्यंत सुदृढ़ करता है।
  3. विश्वकर्मा दान: शनिवार या मंगलवार को किसी भी निर्माण कार्य में लगे मजदूरों (Construction Laborers) को भोजन कराना या उन्हें मीठी बूंदी बांटना आपके चित्रा नक्षत्र के सारे मंदे फल को मिटा देता है।

चित्रा नक्षत्र — संक्षिप्त सार

नक्षत्र:
चित्रा
स्वामी:
मंगल
देवता:
त्वष्टा / विश्वकर्मा
राशि:
कन्या २३°२०' से तुला ०६°४०'
मुख्य प्रतीक:
चमकता रत्न / शिल्पी का औजार
मुख्य चेतना:
सृजन, शिल्प, वास्तु, सौंदर्य और रत्न चेतना

नक्षत्र पुराण संहिता

अध्याय १४ — चित्रा नक्षत्र

ब्रह्मांडीय शिल्पी और त्वष्टा की रत्न चेतना

लेखक: नरेन्द्र पंचारिया

॥ ओम् तत्सत् ॥

॥ ओम् नमः शिवाय ॥

॥ शुभं भवतु ॥

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