नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 13: हस्त नक्षत्र | Hasta Nakshatra | सविता देव, चन्द्रमा और सृजन की हथेली

नक्षत्र पुराण संहिता — अध्याय १३

हस्त नक्षत्र

सृजन की हथेली और सविता चेतना

Hasta Nakshatra | चन्द्रमा • सविता • कन्या राशि • शिल्प • कौशल • कर्म

१. नक्षत्र का मूल परिचय

राशि चक्र में स्थिति:
कन्या राशि (१०° ००' से २३° २०' तक)।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
चन्द्रमा — मन, कल्पना और सूक्ष्मतम कलात्मक तरंगों का स्वामी।
अधिष्ठाता देव:
सविता (Savitar) — सूर्य नारायण का वह भोर रूप जो गायत्री मन्त्र का देवता है, जो बुद्धि को जाग्रत करता है।
तत्व:
पृथ्वी — व्यावहारिक, सूक्ष्म और पूर्णतः परिणाम-उन्मुख।
वर्ण:
वैश्य — व्यापारिक चातुर्य, हिसाब-किताब और शिल्प कला का सूचक।
प्रतीक चिह्न:
बंद मुट्ठी या खुली हथेली (Hand/Fist), या आशीर्वाद देती हुई मुद्रा।
शारीरिक अंग चेतना:
हथेलियाँ, उंगलियाँ, कलाई (Wrist), और पाचन तंत्र की सूक्ष्म आंतें।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

हस्त नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का त्रयोदश श्वास और हाथों का जादू है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न हस्त नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत शिल्प कला', 'हस्त रेखा व ज्योतिष का ज्ञान', 'कौशल (Skills)' और 'व्यापारिक हिसाब-किताब की तीव्र बुद्धि' जाग्रत होती है।

चन्द्रमा और बुध का अद्भुत बौद्धिक गठजोड़:

यह नक्षत्र पूर्ण रूप से कन्या राशि (स्वामी: बुध) के भीतर आता है, परन्तु इसका अपना स्वामी चन्द्रमा है। बुध की व्यावहारिक बुद्धि जब चन्द्रमा की कल्पनाशीलता से मिलती है, तो जातक के हाथों में जादू आ जाता है। वह चाहे पेंटिंग करे, मूर्ति बनाए, कंप्यूटर कोडिंग करे, या शल्य-चिकित्सा (Surgery) करे—उसके हाथ सर्वथा अचूक होते हैं।

हथेली (कर्म) का सिद्धांत:

इसका प्रतीक 'हथेली' है। इसका अर्थ है कि हस्त जातक अपने भाग्य का निर्माण अपने ही हाथों (पुरुषार्थ) से करता है। वह भाग्य के भरोसे नहीं बैठता। बंद मुट्ठी यह भी दर्शाती है कि यह जातक अपने रहस्यों और धन को मुट्ठी में बंद करके रखना जानता है (रहस्यमयी स्वभाव)।

महत्वपूर्ण तथ्य:

इन जातकों के भीतर दूसरों की नकल (Mimicry/नकल करने की कला) या किसी भी हुनर को बहुत जल्दी सीख लेने की क्षमता होती है। ये हाजिरजवाब और बहुत अच्छे हीलर (Pranic Healers/Reiki) होते हैं। इन्हें हस्तशिल्प, शेयर मार्केट की ट्रेडिंग, शल्य चिकित्सा, सीए (CA/Auditor), वास्तुकला, और जादूगरी या ताश के खेल में सर्वोच्च सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: सूर्य देव के 'सविता' रूप का प्राकट्य और गायत्री मन्त्र का अवतरण (विष्णु पुराण से)

जब ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे, तो चारों ओर अज्ञान का अंधकार था। तब सूर्य नारायण का एक अत्यंत पवित्र, स्वर्णिम और भोर (सूर्योदय से ठीक पहले) का रूप प्रकट हुआ, जिसे 'सविता' कहा गया। सविता देव साक्षात् बुद्धि को प्रेरणा देने वाले देवता हैं। महर्षि विश्वामित्र ने इसी सविता देव की प्रसन्नता के लिए महा-मन्त्र 'गायत्री' का साक्षात्कार किया: "तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात"॥ यह मन्त्र साक्षात् हस्त नक्षत्र की आत्मा है, जो मनुष्य के भीतर के अंधकार को मिटाकर उसकी हथेली (कर्म) को पवित्र करता है।

कथा २: दक्ष यज्ञ विध्वंस में वीरभद्र द्वारा सविता देव के हाथ काटा जाना (शिव पुराण से)

जब राजा दक्ष ने शिव का अपमान किया और सविता देव ने यज्ञ सभा में खड़े होकर अपने दोनों हाथ उठाकर दक्ष के प्रस्ताव का समर्थन किया (तालियाँ बजाईं), तो शिव के क्रोध से प्रकट हुए वीरभद्र ने सविता देव को दबोच लिया। वीरभद्र ने अपने तीक्ष्ण खड्ग से सविता देव के दोनों हाथ कलाई से काट दिए, क्योंकि उन हाथों ने अधर्म का साथ दिया था। बाद में जब शिव शांत हुए, तो देवताओं ने प्रार्थना की। शिव ने सविता देव को साक्षात् 'स्वर्ण के हाथ' (Golden Hands) प्रदान किए, जिससे वे पुनः कर्म करने में सक्षम हुए। यह कथा दर्शाती है कि हस्त नक्षत्र के जातक के हाथों में साक्षात् स्वर्ण बनाने की (Midas Touch) शक्ति होती है।

कथा ३: भगवान एकलव्य की गुरु-दक्षिणा और दाहिने हाथ का अंगूठा दान (महाभारत से)

निषाद पुत्र 'एकलव्य' ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति बनाकर धनुर्विद्या सीखी और अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया। जब द्रोणाचार्य ने अर्जुन के मान की रक्षा के लिए एकलव्य से गुरु-दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा (जो हस्त नक्षत्र का मुख्य केंद्र है) मांग लिया, तो एकलव्य ने बिना एक क्षण सोचे अपनी छुरिका से अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया। अंगूठा कटने के बाद भी एकलव्य ने तर्जनी और मध्यमा उंगली से धनुष चलाना सीख लिया। यह अदम्य कौशल और 'हाथों की कला का आत्मसमर्पण' हस्त नक्षत्र का परम सूचक है।

कथा ४: श्रीराम और हनुमान जी की लंका विजय हेतु समुद्र पर 'सेतु-निर्माण' की कला (रामायण से)

लंका जाने के लिए जब नल और नील के हाथों के स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरने लगे, तो पूरी वानर सेना ने अपने हाथों का चमत्कार दिखाया। अरबों पत्थरों को हाथों से उठाकर पांच दिनों में विशाल राम-सेतु का निर्माण कर दिया गया। पत्थरों को कलात्मक रूप से जोड़ना साक्षात् हस्त नक्षत्र की शिल्पकला (Engineering Skill) का उत्कृष्ट पुराण आख्यान है।

कथा ५: ऋग्वेद की 'हस्त सूक्त' चेतना और कर्म की दस उंगलियाँ (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में सविता देव और हाथों की दस उंगलियों की स्तुति है। वेदों के अनुसार, मनुष्य की दस उंगलियाँ साक्षात् दस ऋषियों की चेतना हैं। जब मनुष्य अपनी हथेली को खोलकर आकाश की ओर करता है, तो वह ब्रह्मांड की रश्मियों को सोखता है। वेदों में कहा गया है— "कराग्रे वस्ते लक्ष्मीः..."—अर्थात हथेली के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में गोविन्द का वास है। हस्त जातक इसी सूक्त का साक्षात् रूप है।

कथा ६: समुद्र मंथन से 'धन की देवी लक्ष्मी' का खुली हथेली (वरद मुद्रा) के साथ प्रकट होना (पद्म पुराण से)

मंथन से जब महालक्ष्मी प्रकट हुईं, तो उनका दाहिना हाथ 'वरद मुद्रा' (खुली हथेली जिससे सोने के सिक्के गिर रहे थे) में था। यह खुली हथेली साक्षात् हस्त नक्षत्र का प्रतीक है—संसार को धन, दान और समृद्धि प्रदान करना। जातक की हथेली में यही चुंबकीय आकर्षण होता है।

कथा ७: श्रीकृष्ण का सुदामा के पैर अपने हाथों से धोना और आंसुओं का जल (भागवत पुराण से)

जब दरिद्र सुदामा द्वारका आए, तो श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने दिव्य राजसी पलंग पर बिठाया। उन्होंने सुदामा के पैरों में चुभे कांटों को अपने ही कोमल हाथों की उंगलियों से एक-एक करके निकाला और परात में जल लेकर अपने हाथों से उनके पैर धोए। एक सम्राट के हाथों द्वारा एक दरिद्र के पैर धोना साक्षात् हस्त नक्षत्र के 'हाथों की सेवा और करुणा' को प्रकट करता है।

कथा ८: सती के अंगों का ५१ शक्तिपीठों के रूप में गिरना और 'कपाल-हस्त' पीठ (विष्णु पुराण से)

जब विष्णु के सुदर्शन चक्र ने सती के मृत शरीर को काटा, तो उनके शरीर के ५१ अंग विभिन्न स्थानों पर गिरे। पुराणों के अनुसार, माता सती की दाहिनी हथेली (हस्त) जिस स्थान पर गिरी, वह एक परम सिद्ध शक्तिपीठ बना। वहाँ हाथों की तान्त्रिक पूजा होती है जो जातक को 'मंत्र-सिद्धि' प्रदान करती है।

कथा ९: अर्जुन का 'पाशुपतास्त्र' प्राप्त करने के लिए शिव के चरणों में हाथ जोड़ना (महाभारत से)

जब अर्जुन ने किरात रूपी शिव को पहचान लिया, तो उन्होंने अपने गांडीव धनुष को रख दिया और अपने दोनों हाथों को जोड़कर (अंजलि मुद्रा) शिव के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। शिव ने अर्जुन के उन पराक्रमी हाथों को चूमा और उन्हें ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली अस्त्र 'पाशुपतास्त्र' उनके हाथों में सौंप दिया। यह 'हाथों के समर्पण से शक्ति पाने' की कथा है।

कथा १०: उपनिषदों का 'कर-न्यास' और प्राणिक हीलिंग रहस्य (छान्दोग्य उपनिषद से)

उपनिषदों में मन्त्र जाप से पूर्व 'कर-न्यास' (अंगूठे, तर्जनी, मध्यमा आदि उंगलियों को मन्त्रों से स्पर्श करना) का नियम है। उपनिषद कहते हैं कि हाथों की उंगलियों में पांचों तत्व (अग्नि, वायु, आकाश, पृथ्वी, जल) वास करते हैं। हस्त नक्षत्र का जातक अपने हाथों को आपस में रगड़कर किसी बीमार व्यक्ति पर रख दे, तो उसकी बीमारी शांत हो सकती है (प्राणिक हीलिंग)।

कथा ११: कार्तिकेय का अपने हाथों से 'शक्ति' भाले का निर्माण और संधान (स्कन्द पुराण से)

जब कार्तिकेय युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे, तो विश्वकर्मा ने उन्हें धातु दी, परन्तु कार्तिकेय ने अपने ही हाथों के शिल्प बल से उस दिव्य भाले (शक्ति) को तीक्ष्ण धार दी और उसे तराशा। उस भाले की नोक इतनी अचूक थी कि वह कभी लक्ष्य से नहीं चूकती थी। यह हस्त चेतना के 'अचूक निशाने' (Precision) को दर्शाता है।

कथा १२: शिव का 'वरद और अभय' मुद्रा रूप में नटराज नृत्य (शिव महापुराण से)

नटराज नृत्य के समय भगवान शिव के दो हाथ हवा में नृत्य की मुद्रा में होते हैं—एक हाथ 'अभय मुद्रा' (डरो मत) और दूसरा हाथ 'वरद मुद्रा' (दान) में होता है। शिव के ये हाथ सिखाते हैं कि कर्म की हथेली जब पूरी तरह संतुलित होती है, तो वह संसार के सारे भयों को हर लेती है।

कथा १३: ध्रुव का ब्रह्मा जी के हंस के स्पर्श से वेदों का ज्ञान पाना (विष्णु पुराण से)

जब पांच वर्ष के बालक ध्रुव तप कर रहे थे, तो वे मन्त्र बोलना नहीं जानते थे। तब भगवान विष्णु ने प्रकट होकर अपने दिव्य शंख को बालक ध्रुव के गाल और हाथों से स्पर्श कराया (छुआया)। उस हस्त-स्पर्श के होते ही ध्रुव के भीतर ब्रह्मांड का सारा ज्ञान स्वतः स्फुरित हो गया। यह 'स्पर्श मात्र से ज्ञान के हस्तांतरण' (Transmission of Knowledge) की हस्त चेतना है।

कथा १४: श्रीकृष्ण द्वारा कंस के मल्ल चाणूर को हाथों के द्वंद्व युद्ध में पछाड़ना (श्रीमद्भागवत से)

मथुरा की रंगशाला में जब कंस ने विशाल पहलवानों को श्रीकृष्ण से लड़ने भेजा, तो १४ वर्ष के श्रीकृष्ण ने बिना किसी अस्त्र के, केवल अपने हाथों की मुट्ठियों के प्रहार (Boxing/Grappling) से चाणूर और मुष्टिक जैसे भयंकर पहलवानों की हड्डियों को तोड़ दिया और उनका वध कर दिया। यह हाथों के 'बाहुबल' (Physical Skill) को प्रकट करता है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा राजा मनु को 'हस्त-रेखा' (सामुद्रिक शास्त्र) का ज्ञान देना (सामुद्रिक पुराण से)

ऋषि वशिष्ठ ने सूर्य पुत्र मनु की हथेलियों में छिपे त्रिशूल, मछली और चक्र के चिह्नों को देखकर उनके भविष्य की घोषणा की थी कि वे संसार के प्रथम विधि-निर्माता बनेंगे। हस्त नक्षत्र का सीधा संबंध 'हस्तरेखा विज्ञान' (Palmistry) और ज्योतिष से है। जातक जन्मजात रूप से रेखाओं को पढ़ने में माहिर होता है।

कथा १६: सीता माता का रावण के सामने 'तिनके' (तृण) को हाथ में लेकर मर्यादा की रक्षा (रामायण से)

अशोक वाटिका में जब रावण सीता जी को डराने आया, तो माता सीता ने रावण की ओर देखने के बजाय भूमि से एक छोटा सा तिनका (तृण) अपने हाथ की उंगलियों में उठा लिया। उन्होंने उस तिनके की आड़ लेकर रावण से कहा, "रावण! तू मेरे पति के बाण के सामने इस तिनके की तरह उड़ जाएगा।" उस तिनके में हस्त नक्षत्र का अभेद्य पतिव्रता सुरक्षा कवच था।

कथा १७: समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष की छाया में 'कामधेनु' के दूध का बर्तनों में संचय (वरहा पुराण से)

मंथन के बाद जब ऋषियों ने कामधेनु का दूध निकाला, तो उन्होंने अपने हाथों से मिट्टी और तांबे के सुंदर पात्र (बर्तन) बनाए ताकि अमृत रूपी दूध सुरक्षित रह सके। यह 'हाथों द्वारा बर्तनों और कलाकृतियों के निर्माण' (Pottery/Craftsmanship) के हस्त स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा १८: राधारानी का श्रीकृष्ण के मस्तक पर अपने कोमल हाथों से 'मोरपंख' सजाना (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

वृन्दानव के कुंजों में राधारानी जब भी श्रीकृष्ण का श्रृंगार करती थीं, तो वे अपने हाथों की उंगलियों से कान्हा की जुल्फों को संवारती थीं और बड़े लाड से उनके मुकुट पर मोरपंख बांधती थीं। श्रीकृष्ण उस हस्त-स्पर्श से सम्मोहित हो जाते थे। यह कलात्मक श्रृंगार की हस्त शक्ति है।

कथा १९: नल और दमयन्ती की कथा में राजा नल का घोड़ों की लगाम थामने का हुनर (महाभारत से)

रूप बदलने के बाद जब राजा नल 'बाहुक' बनकर राजा ऋतुपर्ण के सारथी बने, तो उनके हाथों में घोड़ों की लगाम थामने का ऐसा अद्भुत हुनर (Skill) था कि उनके रथ के पहिए हवा से बात करते थे और घोड़ा एक इंच भी मार्ग से नहीं भटकता था। यह हाथों के 'कंट्रोल' और ड्राइविंग कौशल को दर्शाता है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का भूमि-स्पर्श मुद्रा (Bhumisparsha Mudra) में मार को परास्त करना (बौद्ध इतिहास से)

ज्ञान प्राप्ति के क्षण में जब कामदेव (मार) ने बुद्ध को डराने और लुभाने के लिए अपनी पूरी मायावी सेना भेजी, तो बुद्ध विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने दाहिने हाथ की उंगलियों को नीचे झुकाकर धरती माता का स्पर्श किया (भूमि-स्पर्श मुद्रा)। उन्होंने धरती को गवाह बनाया कि उनका तप सत्य है। उसी क्षण मार की सेना नष्ट हो गई। यह हाथों की मुद्राओं (Mudras) के तान्त्रिक बल को प्रकट करता है।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा शिल्पकला के लिए 'स्थापत्य वेद' (Architecture) का निर्माण (शतपथ ब्राह्मण से)

ब्रह्मांड के महलों, मंदिरों और मूर्तियों के निर्माण के लिए ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा को 'स्थापत्य वेद' का ज्ञान दिया। उन्होंने हस्त नक्षत्र को इस वेद की क्रियात्मक हथेली बनाया ताकि कोई भी कलाकार जब तक अपने हाथों से औजार न उठाए, सृष्टि सुंदर न दिखे।

कथा २२: समुद्र मंथन से उच्चैःश्रवा घोड़े के कानों का चतुर बुध चेतना द्वारा स्पर्श (विष्णु पुराण से)

जब मंथन से निकला घोड़ा अत्यधिक उछल-कूद कर रहा था और किसी के वश में नहीं आ रहा था, तब बुध देव (कन्या राशि के स्वामी) ने आगे बढ़कर अपने चतुर हाथों से उसके कानों के पीछे सहलाया (स्पर्श किया)। घोड़ा तत्क्षण शांत होकर खड़ा हो गया। यह पशुओं को अपने हाथों के जादू से वश में करने की हस्त शक्ति है।

कथा २३: गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अर्जुन के 'बाण-संधान' के हाथ की अचूकता की प्रशंसा (महाभारत से)

पेड़ पर बैठी कृत्रिम चिड़िया की आँख को बींधने की परीक्षा में जब द्रोणाचार्य ने अर्जुन से पूछा कि तुम्हें क्या दिख रहा है, तो अर्जुन ने कहा, "मुझे केवल चिड़िया की आँख दिख रही है।" द्रोणाचार्य ने कहा, "बाण छोड़ो!" अर्जुन के हाथों की उंगलियों ने बिना हिले बाण छोड़ा और आँख बिंध गई। यह 'फोकस और अचूक हस्त कौशल' को सिद्ध करता है।

कथा २४: दुर्योधन का भीम की गदा के प्रहार से बचने के लिए अपनी जांघों पर हाथ ठोकना (महाभारत से)

युद्ध के अंतिम दिन जब भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध हो रहा था, तो दुर्योधन ने मल्ल-विद्या का प्रदर्शन करते हुए अपनी जांघों पर हाथ ठोककर भीम को चुनौती दी (ठोका लगाया)। बाद में श्रीकृष्ण के इशारे पर भीम ने उसी जांघ पर गदा मारकर उसका अहंकार तोड़ा। यह मल्लों के 'हाथ ठोकने' (चुनौती) की हस्त चेतना है।

कथा २५: सूफी मत का 'बैअत' (हाथ में हाथ लेकर दीक्षा) और उपनिषदों का तत्वमसि हस्त मुद्रा सूत्र (सामवेद से)

सूफी मत में एक परंपरा है 'बैअत'—अर्थात मुरीद (शिष्य) अपने पीर (गुरु) के हाथ में अपना हाथ सौंपकर वफादारी और दीक्षा का संकल्प लेता है। उपनिषदों में ज्ञान मन्त्र के समय 'ज्ञान मुद्रा' (अंगूठे और तर्जनी को जोड़ना) का नियम है। हस्त नक्षत्र इसी गुरु-शिष्य के हस्त-मिलाप का साक्षात् प्रतीक है।

कथा २६: बंद मुट्ठी में किस्मत के सिक्के को छिपाकर बाजी जीतना (शब्दाचार मत)

एक चतुर जुआरी या जादूगर जब ताश के पत्तों का खेल खेलता है, तो उसके हाथों की सफाई (Sleight of Hand) इतनी तीव्र होती है कि सामने बैठे दर्शकों की आँखें भी उसे पकड़ नहीं पातीं। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'अपनी योजनाओं को मुट्ठी में बंद रखना' ही तुम्हारी असली ताकत है।

कथा २७: सविता देव का परम स्वर्णिम हस्त चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, बुद्धि और प्रकाश के देवता सविता ब्रह्मांड के समस्त शिल्पों, कर्मों, और हाथों की कलाओं को समेटकर साक्षात् 'परम स्वर्णिम ब्रह्म' में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई हथेली बचती है, न कोई कर्म। केवल एक अखंड, शांत चैतन्य प्रकाश शेष रहता है। यह हस्त नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ओम् व्विभ्राड्रबृहत्पिबतु व्वोमयन्मधुपुत्रो देवस्य मंहना। व्वारुणो व्विधारुनाधर्मणा सूर्यो मरुत्वद् भद्रया मङ्गलम्॥

पौराणिक मन्त्र

ओम् हस्ताधिपतिं सवितारं देवं स्वर्णिमहस्तं विभुम्। शिल्प-व्यापार-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं गायत्रीस्वरूपिणम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ओम् पुं हस्तनक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् चं चन्द्राय नमः॥

विधि

हस्त नक्षत्र वाले दिन सोमवार को प्रातः काल सूर्योदय के समय गायत्री मन्त्र का १०८ बार जाप करें। लाल या सफेद आसन पर बैठकर स्फटिक की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें। जाप के बाद अपनी दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर अपने चेहरे और आँखों पर लगाएं।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

बंद मुट्ठी के संकोच को खोलें (Be Generous)

बंद मुट्ठी के प्रतीक के कारण आपके भीतर कभी-कभी अत्यधिक कंजूसी (Miserly) या धन को दबाकर रखने की आदत आ जाती है, जिससे व्यापार में निवेश (Investment) रुक जाता है। हथेली को 'वरद मुद्रा' की तरह खोलना सीखें। दान करने से आपका चन्द्रमा और बली होगा।

चोरी और शार्टकट से बचें (Say No to Cheating)

कन्या राशि के बुध और हस्त के चन्द्रमा का मिलाजुला नकारात्मक प्रभाव जातक को बहुत जल्दी हाथों की चालाकी (चोरी, जालसाजी, एकाउंट्स में हेरफेर) की ओर खींचता है। याद रखें, सविता देव (सूर्य) आपके अधिष्ठाता हैं; वे सब देख रहे हैं। ईमानदारी से किया गया कर्म ही टिकेगा।

हस्त कौशल को बढ़ाएं

कभी भी केवल कागजी या मानसिक काम पर निर्भर न रहें। अपने हाथों से कुछ न कुछ लिखना, स्केचिंग करना, गार्डनिंग करना, या वाद्य यंत्र (जैसे गिटार/बांसुरी) बजाना शुरू करें। यह आपकी मानसिक चंचलता को शांत कर आपके भीतर के राजयोग को जाग्रत कर देगा।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

इतिहास

जब सविता देव ने वीरभद्र द्वारा अपने कटे हुए हाथों के स्थान पर भगवान शिव से साक्षात् 'स्वर्ण के हाथ' प्राप्त कर ब्रह्मांड की कलाओं को पुनर्जीवित कर दिया, तब ब्रह्मा जी ने कन्या राशि के उस व्यावहारिक धरातल पर 'हस्त' (चमकता हुआ हथेलीनुमा पांच तारों का समूह/Corvus) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार सविता देव तथा चन्द्रमा को सौंपा।

अचूक उपाय

१. वनस्पति उपाय

इसका पूज्य वृक्ष 'रीठा' (या 'चम्पा') है। हस्त नक्षत्र के दिन रीठा या चम्पा का पौधा लगाएं। रीठा के पानी से बुधवार को स्नान करना जातक के त्वचा रोगों और राहु-बुध जनित मानसिक भ्रम को पूरी तरह नष्ट कर देता है।

२. गायत्री मन्त्र और हस्त यन्त्र

प्रतिदिन सुबह उठकर सबसे पहले अपनी हथेलियों को देखकर गायत्री मन्त्र का ३ बार पाठ करें। हस्त नक्षत्र के दिन तांबे के पत्र पर 'सविता यन्त्र' अंकित करवाकर उसे अपनी कलाई से छुआकर व्यापारिक स्थल के गल्ले (तिजोरी) में स्थापित करें।

३. हाथों का दान

इस नक्षत्र के दिन अपने हाथों से सफेद पक्षियों को दाना डालना, या किसी गरीब कुशल कारीगर (Mechanic/Tailor/Carpenter) को उसके काम के औजार (Tools) दान करना आपकी कुंडली के समस्त चन्द्र-दोषों को एक क्षण में भस्म कर देता है।

॥ श्री नरेन्द्रम नक्षत्र पुराण संहिता - भाग ४ (अध्याय ७ से १३) : सम्पूर्णतः समाप्तः ॥

॥ ओम् तत्सत् ॥

॥ ओम् नमः शिवाय ॥

॥ शुभं भवतु ॥


लेखक: नरेन्द्र पंचारिया

सीख: "आत्मा का साक्षात् शिल्प तब तक प्रकट नहीं होता, जब तक वासना की आंधियां शांत होकर समत्व के तराजू पर नहीं तूल जातीं।"

नक्षत्र पुराण संहिता — अध्याय १३
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