नक्षत्र पुराण संहिता अध्याय 26: उत्तराभाद्रपद नक्षत्र | Uttara Bhadrapada Nakshatra | अहिर्बुध्न्य, शनि और मोक्ष चेतना

नक्षत्र पुराण संहिता

अध्याय २६: उत्तराभाद्रपद नक्षत्र

मोक्ष का महा-सागर और अहिर्बुध्न्य की सुप्त कुण्डलिनी चेतना

लेखक: नरेन्द्र पंचारिया

१. नक्षत्र का मूल परिचय

राशि चक्र में स्थिति:
मीन राशि (०३° २०' से १६° ४०' तक)।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
शनि — स्थिरता, कड़ा पुरुषार्थ, प्रारब्ध कर्मों का भुगतान और परम वैराग्य का स्वामी।
अधिष्ठाता देव:
अहिर्बुध्न्य (Ahirbudhnya) — रुद्र का एक अत्यंत रहस्यमयी रूप, 'गहरे जल का सर्प' या 'पाताल का नागराज', जो अवचेतन मन की सुप्त कुण्डलिनी शक्ति का देव है।
तत्व:
जल — अत्यधिक गहरा, शांत, ध्यान-मग्न और ब्रह्मांडीय ज्ञान से युक्त।
वर्ण:
क्षत्रिय — धर्म की रक्षा, आध्यात्मिक साम्राज्य और न्याय का सूचक।
प्रतीक चिह्न:
पलंग के पिछले दो पाए, या एक विशाल जुड़वां-जुड़वां सिर (Twin/Double Head)।
शारीरिक अंग चेतना:
पैरों की उंगलियाँ (Toes), तलवों के पार्श्व भाग और रीढ़ की हड्डी की सुषुम्ना नाड़ी।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का षड्विंशति श्वास और कुण्डलिनी का परम जागरण है। शास्त्रों में इसे 'उत्तरप्रोष्ठपदा' (मोक्ष का पलंग) भी कहा गया है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अगाध मानसिक शांति', 'परम ध्यानमग्नता', 'रहस्यों को पचाने की असीमित क्षमता' और 'वैराग्य युक्त ऐश्वर्य' जाग्रत होता है।
शनि और बृहस्पति का साक्षात् 'धर्म-कर्माधिपति' संगम:

यह नक्षत्र पूर्ण रूप से मीन राशि (स्वामी: बृहस्पति - देवगुरु) के भीतर आता है, परन्तु इसका अपना स्वामी शनि (कर्मराज) है। गुरु के ज्ञान के सागर में जब शनि का अनुशासन और वैराग्य मिलता है, तो जातक साक्षात् 'योगी' या 'परम गुरु' की तरह व्यवहार करता है। उत्तराभाद्रपद का अर्थ है—'लाल रंग का भाग्यशाली उत्तर भाग' या 'मोक्ष की चारपाई'।

पाताल सर्प (अहिर्बुध्न्य) का सिद्धांत:

इसका प्रतीक 'गहरे जल का सर्प' है, जो समुद्र की अगाध गहराइयों में सोई हुई साक्षात् 'कुण्डलिनी शक्ति' का प्रतीक है। इसका अर्थ है कि इस नक्षत्र का जातक बाहर से अत्यंत शांत, गंभीर और आलसी दिखाई दे सकता है, परन्तु उसके अवचेतन (Subconscious) के भीतर ब्रह्मांड का अगाध ज्ञान और रहस्यों का खजाना छिपा होता है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

ये जातक बहुत अच्छे सलाहकार, आध्यात्मिक मार्गदर्शक (Spiritual Guides), साइकियाट्रिस्ट (Psychiatrists), और गुप्त धन (जैसे वसीयत/गड़ा धन) प्राप्त करने वाले भाग्यशाली जीव होते हैं। इन्हें समुद्र से जुड़े व्यापार (Marine/Navy), योग विज्ञान, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (Judges), वित्तीय ट्रस्टों के संचालन, और वेदांत दर्शन में सर्वोच्च सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: भगवान रुद्र के 'अहिर्बुध्न्य' रूप का प्राकट्य और पाताल गंगा की रक्षा (विष्णु पुराण से)

सृष्टि के संतुलन के लिए भगवान शिव के क्रोध से प्रकट हुए ग्यारह रुद्रों में से एक अत्यंत शांत, गहरा और रहस्यमयी रूप प्रकट हुआ, जिसे 'अहिर्बुध्न्य' कहा गया। अहिर्बुध्न्य का अर्थ है— 'गहरे जल का नागराज' जो पृथ्वी की नींव (पाताल) के नीचे समुद्र की गहराइयों में रहकर पूरी सृष्टि के सुप्त ज्ञान और रत्नों की रक्षा करता है। वेदों में उन्हें 'सुषुम्ना नाड़ी' का स्वामी माना गया है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र इसी अहिर्बुध्न्य रुद्र की गंभीर, ध्यानमग्न, और मोक्ष प्रदाता चेतना का साक्षात् आभामंडल है, जो जीव को सांसारिक माया से मुक्त करता है।

कथा २: नागराज वासुकी द्वारा समुद्र मंथन के बाद पाताल की गहराइयों में विश्राम (भागवत पुराण से)

जब समुद्र मंथन पूर्ण हुआ और देवताओं को अमृत मिल गया, तो वासुकी नाग का पूरा शरीर मन्दराचल पर्वत के घर्षण से लहूलुहान और अत्यंत थक चुका था। तब अधिष्ठाता देव अहिर्बुध्न्य ने वासुकी को पाताल के सबसे ठंडे और गहरे जल के कुण्ड में आश्रय दिया। वहाँ उनकी चोटें ठीक हुईं और वे पुनः ऊर्जस्वित हुए। यह कथा दर्शाती है कि पूर्वाभाद्रपद के 'प्रचंड युद्ध (तप)' के बाद उत्तराभाद्रपद जातक को 'परम विश्राम' (पलंग के दो पाए) और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

कथा ३: भगवान विष्णु का क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर 'योगनिद्रा' (ध्यान) (विष्णु पुराण से)

जब पूरी सृष्टि सो जाती है, तब भगवान नारायण क्षीरसागर के अगाध और शांत जल के भीतर साक्षात् 'शेषनाग की शय्या' (पलंग) पर योगनिद्रा (गहरे ध्यान) में लीन होते हैं। नागराज शेष अपने हजार फनों से उनके मस्तक पर छत्र तानते हैं और महालक्ष्मी उनके चरण दबाती हैं। यह रूप साक्षात् उत्तराभाद्रपद की चेतना है—संसार के सबसे गहरे जल (ज्ञान) के भीतर रहकर पूरी तरह शांत और आनंदमयी हो जाना, जहाँ शनि (शेषनाग) साक्षात् नारायण की सेवा का आसन बनता है।

कथा ४: सती के आत्मदाह के बाद शिव का 'महायोगी' रूप में घोर समाधि में चले जाना (शिव पुराण से)

वीरभद्र द्वारा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने के बाद, भगवान शिव का क्रोध शांत हुआ। वे सती के वियोग के दुख को पीकर सीधे हिमालय की गुप्त कन्दराओं (गुफाओं) में चले गए। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और हजारों वर्षों के लिए 'महायोगी' बनकर घोर समाधि (Transmutation of Energy) में लीन हो गए। उनका यह शांत, अभेद्य और वैराग्य युक्त रूप साक्षात् उत्तराभाद्रपद की जल-शनि चेतना है।

कथा ५: ऋग्वेद की 'अहिर्बुध्न्य सूक्त' चेतना और पाताल के गुप्त रत्न (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के छठे मण्डल में अहिर्बुध्न्य सूक्त का वर्णन है: "उत नोऽहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज एकपादुत..."—अर्थात वह गहरे जल का सर्प अहिर्बुध्न्य हमारी प्रार्थना सुने, वह अजैकपाद हमारी रक्षा करे। वेदों के अनुसार, अहिर्बुध्न्य ब्रह्मांड की उस सुप्त गुरुत्वाकर्षण शक्ति (Gravity) के स्वामी हैं जो समुद्र के पानी को पृथ्वी से बांध कर रखती है। उत्तराभाद्रपद जातक के भीतर यही 'सबको अपने भीतर थाम लेने' की अगाध क्षमता वास करती है।

कथा ६: समुद्र मंथन से लक्ष्मी के साथ 'अक्षय वसीयत' (गुप्त धन) का प्राकट्य (पद्म पुराण से)

मंथन के दौरान जब महालक्ष्मी प्रकट हुईं, तो उनके चरणों के नीचे से पाताल के नागराज अहिर्बुध्न्य ने अपनी मणियों का एक विशाल कलश (गुप्त खजाना) देवताओं को उपहार में दिया, जिसे कभी खर्च नहीं किया जा सकता था। यह 'अचानक मिलने वाले पैतृक धन या गुप्त वसीयत' (Inheritance/Legacy) के उत्तराभाद्रपद भाग्य को सिद्ध करता है।

कथा ७: इंद्र का पाताल के नागराज कर्कोटक से 'अजेय कूटनीति' की दीक्षा लेना (शतपथ ब्राह्मण से)

जब असुरों ने देवलोक पर कूटनीतिक षड्यंत्र रचे, तो इन्द्र गुप्त रूप से पाताल की गहराइयों में अहिर्बुध्न्य और कर्कोटक नाग के पास गए। उन्होंने नागराज से 'विष को अमृत में बदलने' और 'शत्रुओं की चालों को मूक रहकर भांप लेने' की गुप्त विद्या सीखी। यह 'पर्दे के पीछे रहकर (Behind the Scenes) बड़ी गोटियाँ खेलने' की उत्तराभाद्रपद कला है।

कथा ८: सती के ५१ शक्तिपीठों में माता के 'दोनों पैरों की उंगलियाँ' (Toes) का गिरना (कालिका पुराण से)

सुदर्शन चक्र से कटे सती के अंगों में से, माता के पैरों की दसों उंगलियाँ (जो शरीर के संतुलन का अंतिम बिंदु हैं) जिस स्थान पर गिरीं, वह उत्तराभाद्रपद शक्तिपीठ बना। वहाँ साधक 'सुषुम्ना नाड़ी' के भीतर प्राणों को रोककर 'खेचरी मुद्रा' और साक्षात् 'कुण्डलिनी महा-जागृति' की तान्त्रिक दीक्षा लेते हैं।

कथा ९: अर्जुन का 'भोगवती गंगा' के जल में बैठकर नागराज की मणियों की शक्ति पाना (महाभारत से)

जब अर्जुन पाताल लोक में उलूपी के साथ थे, तो उन्होंने पाताल गंगा (भोगवती) के अगाध जल के नीचे बैठकर हजार वर्षों तक ध्यान किया। नागराज अहिर्बुध्न्य ने उन्हें अपनी मणियों का ओज दिया जिससे अर्जुन की आँखों की नसें इतनी सुदृढ़ हुईं कि वे रात के घोर अंधकार में भी सब कुछ स्पष्ट देख सकते थे। यह 'अंधकार को चीरने वाले आंतरिक ज्ञान' की उत्तराभाद्रपद कला है।

कथा १०: उपनिषदों का 'सुषुम्ना नाड़ी' और कुण्डलिनी सर्पिणी का रहस्य (योगकुण्डन्युपनिषद से)

योगकुण्डली उपनिषद में वर्णन है कि रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे मूलाधार में साढ़े तीन कुंडल मारकर सोई हुई सर्पिणी (कुण्डलिनी) जब जागती है, तो वह उत्तराभाद्रपद के 'अहिर्बुध्न्य' (पाताल सर्प) का रूप लेती है। वह सुषुम्ना नाड़ी के रास्ते जल की तरह शांत बहती हुई सीधे मस्तक के सहस्रार चक्र (मोक्ष) में जाकर विलीन हो जाती है। यह इस नक्षत्र का परम तान्त्रिक रहस्य है।

कथा ११: कार्तिकेय का मयूर वाहन के पंखों के भीतर 'नाग-मणियों' को आभूषण की तरह सजाना (स्कन्द पुराण से)

जब कार्तिकेय ने नागों से मित्रता की, तो नागराज अहिर्बुध्न्य ने उन्हें ब्रह्मांड की सबसे चमकीली मणियाँ भेंट कीं। कार्तिकेय ने उन मणियों को अपने मोर के पंखों के चक्रों के बीच इस तरह स्थापित किया कि मोर जब पंख फैलाता, तो पूरी देवसभा प्रकाश से जगमगा उठती थी। यह 'कला के भीतर रहस्यमयी समृद्धि' को दर्शाता है।

कथा १२: शिव का 'मृत्युंजय' रूप और मार्कण्डेय ऋषि को काल-पाश से मुक्त करना (शिव महापुराण से)

जब यमराज ने १६ वर्ष के बालक मार्कण्डेय पर काल-पाश फेंका, तो शिव जी शिवलिंग को चीरकर 'मृत्युंजय' (मृत्यु के विजेता) के रूप में प्रकट हुए। उनका वह रूप साक्षात् उत्तराभाद्रपद की अहिर्बुध्न्य चेतना थी—अत्यंत शांत परन्तु काल को भी लात मार देने वाला अजेय वैराग्य। शिव ने मार्कण्डेय को अमरत्व का वरदान दिया। यह 'अकाल मृत्यु के संकट को टालने' की शक्ति का आख्यान है।

कथा १३: ध्रुव का राजा बनकर अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 'अचल समाधि' लेना (विष्णु पुराण से)

३६ हजार वर्षों तक न्यायपूर्वक राज करने के बाद, सम्राट ध्रुव ने अपने पुत्र भूमिन्यु को राजमुकुट (सिंहासन) सौंप दिया। वे स्वयं उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के दिन हिमालय के बदरिकाश्रम के शांत वनों में चले गए। वे एक विशाल वृक्ष के नीचे पद्मासन लगाकर बैठे और उन्होंने अपने प्राणों को सहस्रार में विलीन कर 'अचल समाधि' ले ली। यह राजा से योगी बनने का परम आख्यान है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का यमुना की गहराइयों में जाकर कालिया नाग की पत्नियों (नागपत्नियों) को अभय दान (श्रीमद्भागवत से)

जब कृष्ण कालिया नाग के फनों पर नृत्य कर रहे थे और नाग मरणासन्न था, तब जल की गहराइयों से नागपत्नियाँ प्रकट हुईं। उन्होंने हाथ जोड़कर कृष्ण के 'नारायण स्वरूप' की स्तुति की और दया की भीख मांगी। कृष्ण ने उनके करुण क्रंदन को सुना, कालिया को क्षमा किया और उन्हें समुद्र में सुरक्षित स्थान दिया। यह 'गहरे संकट में भी दया और करुणा (बृहस्पति)' की उत्तराभाद्रपद चेतना है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा राजा मनु को 'अवचेतन मन के रहस्यों' (चित्त शुद्धि) का उपदेश (योगवासिष्ठ से)

योगवासिष्ठ में ऋषि वशिष्ठ ने मनु को सिखाया कि मनुष्य का मन साक्षात् एक अगाध महासागर है, जिसके नीचे वासनाओं के नाग सोए हैं। यदि तुम ध्यान के द्वारा इन नागों को अनुशासित (शनि का बल) कर लो, तो तुम्हारा चित्त साक्षात् दर्पण की तरह शुद्ध हो जाएगा। यह 'साइकियाट्री और मेन्टलिज्म' (Psychiatry/Mentalism) के विज्ञान को सिद्ध करता है।

कथा १६: सीता माता का रावण के वध के बाद लंका के महलों को छोड़कर 'अशोक वृक्ष के मूल' (जड़) में ही बैठे रहना (रामायण से)

जब रावण मारा गया और विभीषण ने सीता जी से महलों में आकर विश्राम करने का अनुरोध किया, तो माता सीता ने मना कर दिया। उन्होंने कहा, "जब तक मेरे स्वामी श्रीराम स्वयं यहाँ नहीं आते, मैं इस वृक्ष की छांव (जड़) को छोड़कर महलों के पलंग पर पैर नहीं रखूँगी।" यह उत्तराभाद्रपद की स्त्री के 'चरम आत्म-नियंत्रण और साध्वी स्वभाव' को प्रकट करता है।

कथा १७: समुद्र मंथन से 'अमृत कलश' के प्रकट होने पर भगवान विष्णु का शेषशय्या पर पुनः शयन (वरहा पुराण से)

जब देवताओं ने अमृत पी लिया और देवासुर संग्राम शांत हुआ, तो भगवान विष्णु अपनी पूरी अवतार लीला को समेटकर पुनः क्षीरसागर के शांत जल के नीचे शेषनाग की शय्या पर शयन के लिए चले गए। यह 'बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करने के बाद मिलने वाले परम संतोष' (Contentment) के उत्तराभाद्रपद स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा १८: राधारानी का वृन्दावन की सखियों के साथ 'मौन योग' (राधा तत्व की पराकाष्ठा) (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

श्रीकृष्ण के द्वारका जाने के बाद, राधारानी विलाप छोड़कर घोर 'मौन योग' (निदिध्यासन) की अवस्था में चली गईं। वे वृन्दावन के सरोवरों के किनारे बैठी रहती थीं और उनका मन साक्षात् कृष्ण-चेतना का महासागर बन चुका था। यह प्रेम का काम से परे होकर साक्षात् 'मोक्ष' बन जाने की उत्तराभाद्रपद चेतना है।

कथा १९: राजा नल का रूप बदलने के बाद अपनी पत्नी दमयन्ती से पुनर्मिलन की 'धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा' (महाभारत से)

कूबड़े और सांवले बाहुक बने राजा नल ने अपनी पहचान छिपाकर राजा ऋतुपर्ण के यहाँ वर्षों तक नौकरी की। वे जानते थे कि दमयन्ती उनके बिना तड़प रही है, परन्तु उन्होंने शनि के कड़े धैर्य का पालन किया। अंत में जब दमयन्ती ने उनकी सारथ्य कला (घोड़ों को हांकने की लय) से उन्हें पहचान लिया, तो दोनों का मिलन हुआ। यह 'कठोरतम समय में भी अदम्य धैर्य रखने' के उत्तराभाद्रपद स्वभाव को दर्शाता है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का कुशीनगर के वनों में दो साल के वृक्षों के बीच 'महापरिनिर्वाण' (मृत्यु की शय्या) (बौद्ध इतिहास से)

८० वर्ष की आयु में, बुद्ध कुशीनगर के शाल वनों में पहुँचे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनन्द से कहा, "आनन्द! मेरे लिए दो शाल वृक्षों के बीच उत्तर की ओर सिर करके शय्या (पलंग) लगाओ।" बुद्ध दाहिनी करवट लेकर लेट गए (महापरिनिर्वाण मुद्रा, जो साक्षात् उत्तराभाद्रपद का प्रतीक 'पलंग' है)। उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और सदा के लिए शरीर छोड़ कर महापरिनिर्वाण (मोक्ष) पा लिया।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा मोक्ष मार्ग के लिए 'वेदांत सूत्र' (उपनिषदों के सार) का निर्माण (शतपथ ब्राह्मण से)

कर्म और भक्ति के बाद आत्मा के अंतिम रूपांतरण (मोक्ष) के लिए ब्रह्मा जी ने व्यास मुनि के माध्यम से 'ब्रह्म सूत्र' (वेदांत) की रचना कराई, जो सिखाता है कि यह संसार साक्षात् एक स्वप्न है और आत्मा ही एकमात्र अचल सत्य है। उन्होंने उत्तराभाद्रपद नक्षत्र को इस ज्ञान का महासागर बनाया।

कथा २२: समुद्र मंथन से 'अमृतेश्वर शनि' का बृहस्पति चेतना द्वारा पूर्ण आत्मसात (विष्णु पुराण से)

जब मन्थन से लक्ष्मी प्रकट हुईं, तो शनि देव (उत्तराभाद्रपद के स्वामी) ने अपनी पूरी क्रूरता को त्यागकर बृहस्पति (मीन राशि के स्वामी) के ज्ञान को स्वीकार किया, जिससे शनि साक्षात् 'धर्मराज' और जातक को 'स्थिर व सात्विक राजयोग' देने वाले परम शुभ ग्रह बन गए। यह 'कड़े कर्मों का शुभ फल में बदलने' की उत्तराभाद्रपद कला है।

कथा २३: गुरु द्रोणाचार्य द्वारा युधिष्ठिर को 'अचल मानसिक एकाग्रता' और समाधि की दीक्षा (महाभारत से)

द्रोणाचार्य ने पाण्डवों को सिखाया था कि अस्त्र चलाना केवल हाथ का खेल नहीं है; यह मन को पूरी तरह शांत कर लक्ष्य में विलीन हो जाने की कला है। युधिष्ठिर ने इस कला को इतनी गहराई से सीखा कि उनका मन युद्ध के कोलाहल के बीच भी साक्षात् 'शांत झील' (सरोवर) की तरह स्थिर रहता था। यह उत्तराभाद्रपद की पराकाष्ठा है।

कथा २४: भीष्म पितामह का कुरुक्षेत्र के युद्ध के अंत में 'बाणों की शय्या' पर लेटकर ज्ञान देना (महाभारत, शांति पर्व से)

जब भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से छिन्न-भिन्न होकर गिरे, तो उन्होंने भूमि पर गिरने के बजाय बाणों से बनी शय्या (पलंग—उत्तराभाद्रपद का प्रतीक) चुनी। उन्होंने ५८ दिनों तक उस शय्या पर लेटकर युधिष्ठिर को 'राजधर्म' और 'मोक्ष धर्म' का वह कालजयी उपदेश (शांति पर्व) दिया जो पूरी दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान का ग्रंथ बना। यह शय्या पर लेटे हुए ज्ञान देने की उत्तराभाद्रपद चेतना है।

कथा २५: सूफी मत का 'बका-फ़िल्लाह' (खुदा के साथ सदा के लिए एक हो जाना) और उपनिषदों का अहं ब्रह्मास्मि पूर्ण मोक्ष सूत्र (बृहदारण्यक उपनिषद से)

बृहदारण्यक उपनिषद का महावाक्य है— 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही वह परम ब्रह्म हूँ—पूर्ण अद्वैत)। सूफी मत में 'बका-फ़िल्लाह' का अर्थ है अपने छोटे वजूद को मिटाने (फना) के बाद खुदा की जात में सदा के लिए अमर हो जाना। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र इसी बका और हृदय-कमल के शांत महासागर का साक्षात् द्वार है।

कथा २६: समुद्र की अगाध गहराइयों में जल का बिल्कुल शांत और तरंग-रहित होना (प्रकृति-विज्ञान मत)

समुद्र की सतह पर चाहे जितनी ऊँची लहरें उठें, तूफान आए या नावें डगमगाएं, परन्तु यदि आप समुद्र के नीचे १० मील की गहराई (Deep Ocean) में जाएंगे, तो वहाँ का पानी बिल्कुल शांत, स्थिर और तरंग-रहित होता है। वहाँ घोर अंधकार के बीच भी अद्भुत जीवन और मणियाँ होती हैं। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'बाहर चाहे जितना कोलाहल हो, अपने भीतर के इस गहरे शांत महासागर में डूब जाना ही तुम्हारी असली शक्ति है'।

कथा २७: अहिर्बुध्न्य रुद्र का परम महा-शनि चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, पाताल और अवचेतन के नागराज अहिर्बुध्न्य ब्रह्मांड के समस्त महासागरों, समाधियों और पलंगों के रहस्यों को समेटकर साक्षात् 'परम महा-शनि शून्य' (अनंत वैराग्यमय महा-शून्य) में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई नाग बचता है, न कोई शय्या। केवल एक अखंड, निर्गुण शांति शेष रहती है। यह उत्तराभाद्रपद नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ओम् शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरस्तस्मा अरंगमाम व्वो यस्य क्षयाय जिन्वथ पृथिवी नमो नमः॥ अहिर्बुध्न्याय नमः॥

पौराणिक मन्त्र

ओम् उत्तराभाद्रपदाधिपतिं अहिर्बुध्न्यं नागराजं गहरेस्थितम्। समाधि-गुप्तधन-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं मृत्युञ्जयस्वरूपिणम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ओम् शं उत्तराभाद्रपदानक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् शं शनैश्चराय नमः॥

विधि

उत्तराभाद्रपद नक्षत्र वाले दिन शनिवार को (विशेषकर जब चन्द्रमा मीन राशि में हों) रात्रि के समय (९ बजे के बाद) नीले, सफेद या सन्यासी (भगवा) रंग के वस्त्र धारण कर भगवान मृत्युंजय शिव या नारायण का ध्यान करें।

स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से उपरोक्त तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें।

जाप के बाद अपने शयनकक्ष में कपूर की धूनी दें और किसी गरीब वृद्ध व्यक्ति को ऊनी वस्त्र, कंबल या जूते दान करें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

आलस्य और शिथिलता को लात मारें (Overcome the Inertia)

गहरे जल के सर्प और शनि के प्रभाव के कारण आपके भीतर काम को टालने (Procrastination), अत्यधिक सोने, या बहुत धीमी गति से कार्य करने की भयंकर आदत आ जाती है, जिससे समाज आपको 'आलसी' समझने लगता है। जीवन बदलने का सूत्र है— "अपने भीतर के शनि के अनुशासन को जगाएं; विचार चाहे जितने गहरे हों, उन्हें तुरंत क्रियात्मक रूप (Action) दें।"

अपने अवचेतन के रहस्यों को 'औषधि' बनाएं

आपके पास सामने वाले के चेहरे को देखकर उसके मन की बात जान लेने और उसके डिप्रेशन को दूर करने का गज़ब का साइकोलॉजिकल हुनर (Intuition) है। अपनी इस विद्या का प्रयोग कभी भी दूसरों को डराने, या उनके रहस्यों का फायदा उठाने में न करें। लोगों की काउंसलिंग करें।

ध्यान को दिनचर्या बनाएं

आपके नक्षत्र का अंतिम लक्ष्य समाधि (Meditation) है। प्रतिदिन कम से कम २० मिनट आँखें बंद करके पूरी तरह शांत बैठने की आदत डालें। यह आपके चक्रों को ऊर्ध्वगामी करेगा और आपके जीवन में अकूत और स्थिर लक्ष्मी का वास कराएगा।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

नक्षत्र बनने का इतिहास:

जब नागराज अहिर्बुध्न्य ने भगवान शिव के मृत्युंजय रूप को जाग्रत कर मार्कण्डेय ऋषि के प्राणों की यम-पाश से रक्षा की और भीष्म पितामह ने बाणों की शय्या पर लेटकर पूरी दुनिया को शांति पर्व का अमर ज्ञान दिया, तब ब्रह्मा जी ने मीन राशि के इस परम सात्विक धरातल पर 'उत्तराभाद्रपद' (मोक्ष की चारपाई जैसा दो चमकते तारों का समूह/Pegasus-Algenib) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार अहिर्बुध्न्य तथा शनि को सौंपा।

अचूक उपाय

१. नक्षत्र वनस्पति उपाय:

इसका पूज्य वृक्ष 'नीम' (Margosa Tree) का वृक्ष है जो साक्षात् कड़वा होने पर भी ब्रह्मांड का सबसे बड़ा एंटी-बायोटिक और हीलर माना जाता है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के दिन नीम का पौधा किसी पवित्र स्थान पर लगाएं। शनिवार को इसकी जड़ में जल चढ़ाना जातक की साढ़ेसाती, ढैया और कुंडली के पितृ दोष को तत्क्षण दूर कर देता है।

२. कुण्डलिनी महा-उपाय:

इस नक्षत्र के दिन चांदी के एक छोटे टुकड़े पर 'अहिर्बुध्न्य नाग यन्त्र' अंकित करवाकर उसे शनिवार को कच्चे दूध से धोकर अपने पर्स या तिजोरी में लाल कपड़े में लपेटकर रख दें। यह आपके घर में स्थिर लक्ष्मी और अकूत गुप्त धन का आगमन कराएगा।

३. वृद्ध सेवा महा-उपाय:

हर शनिवार या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र के दिन किसी वृद्धाश्रम या कोढ़ियों के आश्रम में जाकर अन्न, दवाइयों, और वस्त्रों का गुप्त दान करना आपके प्रारब्ध के कड़े से कड़े कर्मों के दण्ड (जैसे अचानक करियर ठप होना या भारी बीमारी) को एक क्षण में भस्म कर राजयोग जगा देता है।

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