RPSC Rajasthan History MCQ 2027-28: प्रश्न 41 से 80 | अभिलेख, ताम्र-पत्र, सिक्के एवं मुद्राएँ | Rajasthan GK
राजस्थान इतिहास PYQ : प्रश्न 41 से 80
राजस्थान के इतिहास के स्रोत — अभिलेख, ताम्र-पत्र एवं सिक्के
प्रश्न 41: रायसिंह की प्रशस्ति (1594 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बीकानेर दुर्ग के द्वार के पार्श्व में लगी यह प्रशस्ति बीकानेर नरेश रायसिंह के समय की है जिससे बीकानेर के संस्थापक राव बीका से रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियों और रायसिंह की मुगलों की सेवा के दौरान प्राप्त उपलब्धियों का जिक्र मिलता है।
2. इसमें रायसिंह की काबुल, सिन्ध एवं कच्छ पर विजयों का वर्णन किया गया है।
3. इस प्रशस्ति के रचयिता जेता नाम के जैन मुनि थे और यह संस्कृत भाषा में है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: रायसिंह की प्रशस्ति (1594 ई., बीकानेर) बीकानेर के शासकों के इतिहास, रायसिंह की सैन्य अभियानों (काबुल, सिंध, कच्छ) और उसकी मुगल सेवा की सफलताओं को दर्शाती है। इसके रचयिता जैन मुनि जेता हैं।
प्रश्न 42: डूंगरपुर की नौलखा बावड़ी की प्रशस्ति (1587 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह प्रशस्ति डूंगरपुर की नौलखा बावड़ी में स्थित है और इस बावड़ी का निर्माण महारावल आस्करण की रानी प्रेमलदेवी द्वारा करवाया गया था।
2. वागड़ के चौहानों का इतिहास जानने के लिए यह प्रशस्ति अत्यंत उपयोगी है, क्योंकि इसमें चौहान लाखा से लेकर प्रशस्ति के रचना काल तक के वागड़ के चौहानों की वंशावली उपलब्ध है।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: डूंगरपुर की नौलखा बावड़ी की प्रशस्ति (1587 ई.) महारावल आस्करण की रानी प्रेमलदेवी द्वारा निर्मित नौलखा बावड़ी से प्राप्त हुई है। इसमें चौहान लाखा से लेकर रचना काल तक के वागड़ के चौहानों का पूरा इतिहास और वंशावली मिलती है।
प्रश्न 43: आमेर का लेख (1612 ई.) के संदर्भ में सही कथन कौन-सा है?
उत्तर: (द) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं
व्याख्या: आमेर का लेख (1612 ई.) कछवाहा राजवंश और मुगल संबंधों की निकटता, मानसिंह के निर्माण कार्यों (जमूआ रामगढ़ दुर्ग, कुएं, बाग) तथा वंश के गौरव ('रघुवंशतिलक') को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
प्रश्न 44: डूंगरपुर के गोवर्धननाथजी के मंदिर की प्रशस्ति (1623 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह प्रशस्ति महारावल पुंज के समय की है, जिससे ज्ञात होता है कि उन्होंने पुंजपुर बसाकर पुंजेला तालाब बनवाया और घाटजी गाँव में भी एक तालाब बनवाया।
2. इस लेख के अनुसार पुंज ने अपनी राजधानी डूंगरपुर में नौलखा नामक बाग लगवाया और गैबसागर तालाब की पाल पर गोवर्धननाथ का विशाल मंदिर बनवा कर वि.सं. 1679 में उसकी प्रतिष्ठा की तथा मंदिर के भोग-राग की व्यवस्था निमित्त उक्त देवालय को बमई गाँव भेंट किया।
3. इस प्रशस्ति का प्रशस्तिकार मेदपाट जाति का जोसी पुंजा था और इसको सलावाट भाणर्जा ने उत्कीर्ण किया था।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: डूंगरपुर के गोवर्धननाथजी मंदिर की प्रशस्ति (1623 ई.) महारावल पुंज के शासनकाल, उनके द्वारा किए गए निर्माण कार्यों (पुंजेला तालाब, नौलखा बाग, गोवर्धननाथ मंदिर प्रतिष्ठा) तथा मंदिर को बमई गाँव भेंट करने की पूरी जानकारी देती है। इसके प्रशस्तिकार जोसी पुंजा और उत्कीर्णक सलावाट भाणर्जा थे।
प्रश्न 45: जालौर का महावीर जी के मंदिर का लेख (1624 ई.) के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
उत्तर: (स) उपर्युक्त दोनों (अ) और (ब) कथन सत्य हैं।
व्याख्या: जालौर के महावीर जी के मंदिर का लेख (1624 ई.) जैन आचार्यों और मुगल सम्राट अकबर के संबंधों तथा अकबर द्वारा जैन तीर्थों से जिया कर हटाने और हरिविज्य सूरी को 'जगद्गुरु' की उपाधि देने का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 46: खमनोर की शालिवाहन की छतरी का लेख (1624 ई.) किसकी स्मृति में बनवाया गया था?
उत्तर: (अ) हल्दीघाटी के युद्ध में वीरगति पाने वाले ग्वालियर के राजा रामशाह के पुत्र शालिवाहन
व्याख्या: खमनोर की शालिवाहन छतरी का लेख (1624 ई.) महाराणा प्रताप के पौत्र कर्णसिंह द्वारा हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले ग्वालियर के राजा रामशाह के पुत्र शालिवाहन की स्मृति में उत्कीर्ण करवाया गया था।
प्रश्न 47: जगन्नाथराय प्रशस्ति (1652 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह प्रशस्ति उदयपुर के जगन्नाथराय के मंदिर के सभामंडप में आने वाले भाग के दोनों तरफ पत्थर पर उत्कीर्ण है।
2. इस प्रशस्ति के पहले भाग में बाप्पा से लेकर सांगा तक के पूर्वजों की उपलब्धियों का वर्णन है जो अधिकांश ख्यातों या दन्त-कथाओं पर आधारित है, जबकि दूसरे भाग में महाराणा जगतसिंह का वर्णन मिलता है जहाँ प्रशस्तिकार उनके संबंध में कई नई सूचनाएँ देता है।
3. इसके अनुसार जगतसिंह ने जगन्नाथराय मंदिर (जगदीश मंदिर) का निर्माण करवाया, इसे पंचायतन शैली में बनवाया, इसके अतिरिक्त महाराणा ने पिछोला के तालाब में मोहन मंदिर व रूपसागर तालाब भी बनवाया था, तथा इसके रचयिता कृष्णभट्ट लक्ष्मोधारा थे।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: जगन्नाथराय प्रशस्ति (1652 ई., उदयपुर) जगदीश मंदिर के सभामंडप में स्थित है। इसके रचयिता कृष्णभट्ट लक्ष्मोधारा हैं। यह प्रशस्ति मेवाड़ के प्रारंभिक शासकों की वंशावली (दंतकथा आधारित) तथा महाराणा जगतसिंह प्रथम के धार्मिक व निर्माण कार्यों (जगदीश मंदिर, पंचायतन शैली, पिछोला के मंदिर) की विस्तृत जानकारी देती है।
प्रश्न 48: त्रिमुखी बावड़ी की प्रशस्ति (1675 ई.) के संदर्भ में सही कथन चुनिए:
उत्तर: (द) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं
व्याख्या: त्रिमुखी बावड़ी की प्रशस्ति (1675 ई., देबारी, उदयपुर) महाराणा राजसिंह की रानी रामरसदे द्वारा निर्मित त्रिमुखी बावड़ी पर उत्कीर्ण है। इसके प्रशस्तिकार रणछोड़ भट्ट और शिल्पी नाथू गौड़ थे। इसमें मेवाड़ के प्रमुख शासकों का संक्षिप्त इतिहास और राजसिंह के समय के जनहित कार्यों की जानकारी मिलती है।
प्रश्न 49: राजसिंह प्रशस्ति (1676 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह राजसमंद झील की 'नौ चौकी' की पाल पर 25 श्याम शिलाओं पर उत्कीर्ण विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति (अभिलेख) है, जिसके प्रशस्तिकार रणछोड़ भट्ट तेलंग (ब्राह्मण) थे।
2. इन शिलाओं पर काव्य के 24 सर्ग व 1106 श्लोक खुदे हुए हैं, और इस महाकाव्य को शिलाओं पर खुदवाने के आदेश राजसिंह के उत्तराधिकारी जयसिंह के द्वारा दिए गए थे।
3. इसमें बाप्पा रावल से लेकर राणा जगतसिंह द्वितीय तक गुहिलों की वंशावली व उपलब्धियों के साथ-साथ 1615 ई. की मुगल-मेवाड़ संधि, राजसमंद झील निर्माण (14 वर्षों में पूरा), और बाप्पा द्वारा 50 पल सोने के कंगन पहनने का उल्लेख मिलता है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: राजसिंह प्रशस्ति (1676 ई., राजसमंद) संस्कृत भाषा में रचित विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति है (25 काले पत्थरों पर 1106 श्लोक)। इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तेलंग हैं। इसमें मेवाड़ के गुहिल वंश का विस्तृत इतिहास, महाराणा राजसिंह के काल तक की घटनाएं, मुगल-मेवाड़ संधि (1615) और राजसमंद झील निर्माण आदि का विवरण मिलता है।
प्रश्न 50: बेणेश्वर का लेख (1866 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह डूंगरपुर के बेणेश्वर स्थित शिव मंदिर से संबंधित है।
2. डूंगरपुर और बाँसवाड़ा राज्य की सीमा निर्धारण से संबंधित विवाद के समय यहाँ आस्करण का वि.सं. 1922 (1866 ई.) का एक शिलालेख लगा हुआ है।
3. इस पर मेजर एम.एम. मैकेन्जी (पॉलिटिकल सुपरिंटेंडेंट हिलो ट्रेक्ट्स) के हस्ताक्षर हैं, जिससे डूंगरपुर-बाँसवाड़ा राज्य की सीमा निर्धारण के संबंध में इस लेख का ऐतिहासिक महत्व बहुत अधिक है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: बेणेश्वर का लेख (1866 ई.) डूंगरपुर के बेणेश्वर शिव मंदिर से संबंधित है। डूंगरपुर और बाँसवाड़ा के सीमा विवाद के समाधान में इस लेख (जिस पर मेजर मैकेन्जी के हस्ताक्षर हैं) का ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "बेणेश्वर के मेले में मज़ा (Major McKenzie) आ गया, डूंगरपुर की सीमा तय हो गई!"
प्रश्न 51: राजस्थान के प्रमुख प्राचीन अभिलेखों और उनके प्राप्ति स्थलों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
उत्तर: (द) दधिमति माता मंदिर शिलालेख - जोधपुर (608 ई.)
व्याख्या: यह युग्म गलत है क्योंकि 'दधिमति माता मंदिर शिलालेख' (608 ई.) जोधपुर में नहीं, बल्कि नागौर (गोठ मांगलोद) में स्थित है। यह मारवाड़ से प्राप्त प्राचीनतम शिलालेख है, जहाँ के आस-पास का क्षेत्र 'दाहिमा' कहलाता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "दधि (दही) खाने के लिए नाग (Nagaur) चाहिए, जोधपुर नहीं!"
प्रश्न 52: बरनाला (बर्नाला) यूूप स्तंभ लेख के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बर्नाला (गंगापुर सिटी) से दो यूप स्तंभ लेख मिले हैं—पहला 227 ई. का तथा दूसरा 278 ई. का।
2. 227 ई. के लेख में वर्धन नामक व्यक्ति द्वारा सात यूप-स्तंभों की प्रतिष्ठा (स्थापना) करने का उल्लेख है।
3. 278 ई. के लेख में वर्णित है कि गर्गात्रियात्र यज्ञ का संपादन भट्ट द्वारा किया गया था जो विष्णु को समर्पित है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: बर्नाला (गंगापुर सिटी) से प्राप्त यूप स्तंभ लेख प्राचीन वैदिक यज्ञों और धार्मिक अनुष्ठानों की जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं, जो 227 ई. और 278 ई. के हैं।
💡 याद रखने की ट्रिक: "बरनाला (बर्नाला) में गंगा (गंगापुर) किनारे वर्धन ने 7 खंभे (यूप) गाड़े।"
प्रश्न 53: हस्तकुण्डी अभिलेख (996 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अभिलेख पाली जिले से प्राप्त हुआ है जिसके रचनाकार सूर्याचार्य तथा भाषा संस्कृत है।
2. इस अभिलेख से हस्तकुण्डी के चौहान शासकों से संबंधित मुख्य जानकारी प्राप्त होती है तथा तत्कालीन कर व्यवस्था पर भी अच्छा प्रकाश पड़ता है।
3. इस अभिलेख को कैप्टन बेस्ट द्वारा खोजा गया था।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: हस्तकुण्डी अभिलेख (996 ई., पाली) के रचयिता सूर्याचार्य हैं। इसे कैप्टन बेस्ट ने खोजा था। यह तत्कालीन कर व्यवस्था और हस्तकुण्डी के चौहानों के इतिहास को जानने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "हाथ (हस्तकुण्डी) में पाली हुई सूर्य (सूर्याचार्य) जैसी बेस्ट (Captain Best) घड़ी है।"
प्रश्न 54: चित्तौड़ का शिलालेख (1278 ई.) के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
उत्तर: (स) उपर्युक्त दोनों (अ) और (ब) कथन सत्य हैं।
व्याख्या: चित्तौड़ का शिलालेख (1278 ई.) मेवाड़ के गुहिल शासकों की धार्मिक सहिष्णुता (जैन मंदिरों को दान) और उन्हें 'ब्राह्मण' रूप में संबोधित किए जाने के कारण इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "चित्तौड़ के ब्राह्मण जैनियों को दान देते हैं।"
प्रश्न 55: एकलिंग जी के मंदिर की दक्षिण द्वार प्रशस्ति (1488 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस प्रशस्ति के रचयिता महेश भट्ट व उत्कीर्णक अर्जुन थे।
2. इसमें बाप्पा रावल के संन्यास लेने एवं मेवाड़ के गुहिलों का वर्णन है जिसमें बाप्पा को 'द्विज' कहा गया है।
3. इस प्रशस्ति की स्थापना मेवाड़ महाराणा रायमल द्वारा करवाई गई थी।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: एकलिंग जी मंदिर की दक्षिण द्वार प्रशस्ति (1488 ई., उदयपुर) के रचयिता महेश भट्ट और उत्कीर्णक अर्जुन थे। महाराणा रायमल द्वारा स्थापित इस प्रशस्ति में बाप्पा को 'द्विज' (ब्राह्मण) बताया गया है और उनके संन्यास का विवरण मिलता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "एकलिंग जी के द्वार पर रायमल, महेश (Mahesh) और अर्जुन ने बाप्पा को द्विज (ब्राह्मण) बनाया।"
प्रश्न 56: राठौड़ बीदा की छतरी का लेख (1504 ई.) किस स्थान से प्राप्त हुआ है तथा इसमें किसकी वीरता का उल्लेख है?
उत्तर: (अ) सेवन्त्री (राजसमंद) - कँवर संग्रामसिंह (गांगा सांगा) की रक्षा करते हुए राठौड़ बीदा व राठौड़ रायमल की वीरगति
व्याख्या: सेवन्त्री (राजसमंद) स्थित रूपनारायण मंदिर के पास स्थित राठौड़ बीदा की छतरी का लेख (1504 ई.) कँवर संग्रामसिंह (जो आगे चलकर राणा सांगा बने) की रक्षा करते हुए राठौड़ बीदा और राठौड़ रायमल के वीरगति प्राप्त करने की ऐतिहासिक घटना को प्रमाणित करता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "सेव (Seventri) खाकर संग्राम (संग्रामसिंह) और बीदा ने जान बचाई।"
प्रश्न 57: खजूरी गाँव की शिलाललेख (बूँदी, 1506 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस लेख में बूँदी का नाम 'वृंदावती' दिया गया है।
2. इससे यह भी ज्ञात होता है कि इस समय बूँदी का शासक सूरजमल था।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: खजूरी गाँव का शिलालेख (बूँदी, 1506 ई.) बूँदी के प्राचीन नाम 'वृंदावती' तथा उस समय के शासक सूरजमल की ऐतिहासिक जानकारी देता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "वृंदावती (बूँदी) के सूरज (सूरजमल) की खजूरी।"
प्रश्न 58: बैराठ अभिलेख (कोटपूतली-बहरोड़, 1686 ई.) के संदर्भ में सही कथन कौन-सा है?
उत्तर: (अ) इसमें वर्णित है कि छीतरमल के साथ उसकी पत्नी जमना सती हुई थी, और इस छतरी का निर्माता सांवल्दास था।
व्याख्या: बैराठ अभिलेख (1686 ई.) सती प्रथा (छीतरमल के साथ जमना का सती होना) और उसकी छतरी के निर्माण (सांवल्दास) की जानकारी देता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "बैराठ में छीतर (छीतरमल) और जमना सती हुए, सांवल्दास ने छतरी बनाई।"
प्रश्न 59: वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति (उदयपुर, 1719 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस प्रशस्ति के रचयिता रूप भट्ट थे (या इस प्रशस्ति में बाप्पा रावल से संग्रामसिंह द्वितीय तक के गुहिलों का वर्णन है)।
2. इसमें यह भी बताया गया है कि बाप्पा ने हारित ऋषि की अनुकंपा से मेवाड़ का राज्य प्राप्त किया था।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति (1719 ई., उदयपुर) मेवाड़ के राजवंश (बाप्पा से संग्रामसिंह द्वितीय) और हारित ऋषि की कृपा से राज्य प्राप्ति के पारंपरिक इतिहास को दोहराती है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "वैद्य (वैद्यनाथ) ने बाप्पा और संग्राम को दवाई दी।"
प्रश्न 60: अजमेर का लेख (1200 ई.) के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
उत्तर: (स) उपर्युक्त दोनों (अ) और (ब) कथन सत्य हैं।
व्याख्या: अजमेर का लेख (1200 ई.) अढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर) में स्थित है। यह फारसी भाषा के शुरुआती महत्वपूर्ण लेखों में से एक है, जिसमें अबूबक का उल्लेख है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "अढ़ाई दिन के झोपड़े में अबूबक ने फारसी में झंडा गाड़ा (1200 ई.)."
अध्याय 1: राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत (भाग - 2 - फारसी अभिलेख)
प्रश्न 61: आमेर का लेख (जयपुर, 1569-70 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह आमेर की जामा मस्जिद की दीवार पर है।
2. इसमें वर्णित है कि उक्त मस्जिद को आमेर में एक हाजी तवाचीयाशी ने बनवाया था, जिससे प्रमाणित होता है कि अकबर के काल में मुगल अफसर यहाँ रहता था।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: आमेर का लेख (1569-70 ई.) आमेर की जामा मस्जिद से प्राप्त हुआ है, जिससे अकबर के काल में आमेर में मुगलों की उपस्थिति और प्रशासनिक अधिकारियों (हाजी तवाचीयाशी) के रहने का पता चलता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "आमेर के अकबर के काल में हाजी (हाजी तवाचीयाशी) मस्जिद में रहते थे।"
प्रश्न 62: पुष्कर के जहांगीरी महल का लेख (1615 ई.) के संबंध में सही कथन चुनिए:
उत्तर: (स) उपर्युक्त दोनों (अ) और (ब) कथन सत्य हैं।
व्याख्या: पुष्कर का जहांगीरी महल लेख (1615 ई.) जहाँगीर की अमरसिंह पर विजय और पुष्कर में महल निर्माण (अनीराय सिंहदलन के निर्देशन में) को प्रमाणित करता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "जहाँगीर ने पुष्कर में महल बनाया और अनीराय ने निगरानी की।"
प्रश्न 63: शाहजहानी-मस्जिद, अजमेर का लेख (1637 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस लेख में वर्णित है कि जब खुर्रम (शाहजहाँ) राणा अमरसिंह पर विजय प्राप्त कर यहाँ आया था तो उसने अजमेर में एक मस्जिद बनाने की प्रतिज्ञा की थी, जिसे बादशाह बनने पर उसने इसको पूरा किया।
2. कनाती मस्जिद (नागौर) का लेख (1641 ई.) के अनुसार इस मस्जिद का निर्माण जमालशाह द्वारा करवाया गया जो जुर्माशाह का पौत्र था (जुर्माशाह चौहान वंशीय था)।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: शाहजहानी मस्जिद लेख (अजमेर, 1637 ई.) शाहजहाँ की प्रतिज्ञा और निर्माण को दर्शाता है, जबकि कनाती मस्जिद (नागौर, 1641 ई.) जमालशाह (जुर्माशाह का पौत्र) द्वारा बनवाई गई थी जो चौहान वंशीय थे।
💡 याद रखने की ट्रिक: "खुर्रम ने अजमेर में मस्जिद की प्रतिज्ञा पूरी की, और नागौर में जमालशाह ने कनाती मस्जिद बनाई।"
प्रश्न 64: मस्जिद हजरत मिठ्ठेशाह की दरगाह के भीतर का लेख (गागरोन, 1694-95 ई.) के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
उत्तर: (स) उपर्युक्त दोनों (अ) और (ब) कथन सत्य हैं।
व्याख्या: गागरोन की मिठ्ठेशाह दरगाह का लेख (1694-95 ई.) इदादतखाँ द्वारा मस्जिद निर्माण और बहलोली सिक्के/अनुदान के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "गागरोन के मिठ्ठेशाह की दरगाह पर इदादतखाँ ने बहलोली दिए।"
प्रश्न 65: फारसी अभिलेखों की सारणी के आधार पर निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही सुमेलित है?
उत्तर: (द) उपर्युक्त सभी युग्म सही सुमेलित हैं।
व्याख्या: सारणी के अनुसार बयाना (1305), बड़ी खाटू (1203), और जालौर ईदगाह (1318) के फारसी लेख अपनी-अपनी ऐतिहासिक प्रविष्टियों के साथ बिल्कुल सही हैं।
💡 याद रखने की ट्रिक: "बड़ी खाटू में धोकल, बयाना में अब्दुल मलिक, और जालौर में होशंग!"
प्रश्न 66: बरबद का लेख (भरतपुर, 1613-14 ई.) के संबंध में कौन-सा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य वर्णित है?
उत्तर: (अ) इसमें अकबर की पत्नी मरियम उम्स्मानी (हरका बाई) द्वारा बाग व बावड़ी निर्माण का उल्लेख है।
व्याख्या: बरबद का लेख (भरतपुर, 1613-14 ई.) इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अकबर की बेगम मरियम उम्स्मानी द्वारा बाग और बावड़ी बनवाने की जानकारी मिलती है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "बरबद में मरियम (मरियम उम्स्मानी) ने बाग लगाया।"
अध्याय 1: राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत (भाग - 2 - ताम्र-पत्र / दान-पत्र)
प्रश्न 67: राजस्थान के प्रमुख ताम्र-पत्रों (दान-पत्रों) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. धूलेव ताम्र-पत्र (679 ई.) मेवाड़ के धूलेव गाँव के एक ब्राह्मण के पास मिला था, जिसमें किष्किन्धा (कल्याणपुर) के महाराज भेटी द्वारा भट्टिनाग नामक ब्राह्मण को दान दिए जाने का उल्लेख है।
2. मथनदेव का ताम्र-पत्र (959 ई.) राजोरगढ़ (अलवर) के प्रतिहार गौत्रीय मथनदेव का है, जिसमें प्रयुक्त भाषा संस्कृत है और इसे हरि ने उत्कीर्ण किया था।
3. ब्रौंच गूजर ताम्र-पत्र (978 ई.) के आधार पर अलेक्जेंडर कनिंघम ने राजपूतों को यू-ची जाति (कुषाण) की संतान माना है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: धूलेव ताम्र-पत्र (679 ई.) संस्कृत भाषा में उत्कीर्ण है जिसमें हर्षसंवत 73 का प्रयोग हुआ है। मथनदेव का ताम्र-पत्र (959 ई.) राजोरगढ़ से संबंधित है जिसे हरि ने उत्कीर्ण किया था। ब्रौंच गूजर ताम्र-पत्र (978 ई.) के आधार पर ही प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता कनिंघम ने राजपूतों की उत्पत्ति यू-ची जाति (कुषाण) से बताई थी।
💡 याद रखने की ट्रिक: "धूलेव में भेटी, मथनदेव राजोरगढ़ में हरि, और ब्रौंच गूजर से कनिंघम ने कुषाण माने।"
प्रश्न 68: धारवर्ष का ताम्रपत्र (1180 ई.) तथा वीरपुर का ताम्रपत्र (1185 ई.) के संबंध में कौन-सा कथन सत्य है?
उत्तर: (द) उपर्युक्त सभी कथन सत्य हैं
व्याख्या: ये दोनों ताम्र-पत्र तत्कालीन प्रशासनिक, राजस्व और भौगोलिक शब्दावली के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। धारवर्ष के पत्र में हल और गोचर भूमि का उल्लेख है, वहीं वीरपुर ताम्र-पत्र में अरहट्ट (रहँट), हत्थ और वागड़ को वटपद्रक मंडल में शामिल बताया गया है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "धारवर्ष ने हल चलाया, वीरपुर के अमृतपाल ने रहँट (अरहट्ट) से पानी निकाला।"
प्रश्न 69: चीखली का ताम्र-पत्र (1483 ई.) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह ताम्र-पत्र बागड़ी भाषा में उत्कीर्ण किया गया है।
2. इससे पता चलता है कि उस समय पटेल, सुथार एवं ब्राह्मण खेती का कार्य करते थे तथा इसी से उस समय किसानों से वसूल की जाने वाली 'लाग-बाग' का पता चलता है।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: चीखली का ताम्र-पत्र (1483 ई.) वागड़ी भाषा में है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत अनूठा है क्योंकि यह तत्कालीन किसान वर्ग, विभिन्न जातियों द्वारा कृषि कार्य और किसानों से ली जाने वाली विविध लाग-बागों की प्रामाणिक जानकारी देता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "चीखली में बागड़ी भाषा में किसानों की लाग-बाग लिखी गई।"
प्रश्न 70: पुर का ताम्र-पत्र (1535 ई.) के संबंध में कौन-सा महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य प्रमाणित होता है?
उत्तर: (ब) गुजरात के बहादुरशाह के चित्तौड़ आक्रमण के समय हाड़ा रानी कर्मावती द्वारा जौहर में प्रवेश तथा भूमि दान
व्याख्या: पुर का ताम्र-पत्र (1535 ई.) चित्तौड़ के दूसरे साके का जीवंत साक्ष्य है। इसमें उल्लेख है कि गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह के आक्रमण के दौरान जब राजपूत वीरांगनाएँ रानी कर्मावती के नेतृत्व में जौहर की ज्वाला में प्रवेश कर रही थीं, तब रानी कर्मावती ने जौहर में प्रवेश से पूर्व पुर में एक हल भूमि दान की थी।
💡 याद रखने की ट्रिक: "पुर (पूरा) चित्तौड़ जब जौहर में तपा, रानी कर्मावती ने पुर में दान दिया।"
प्रश्न 71: गाँव महुदी का ताम्र-पत्र (1544 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह ताम्र-पत्र महाराणा उदयसिंह के समय का है, जिसमें व्यास बच्छराज को महुदी गाँव पुण्यार्थ देने का उल्लेख है।
2. इस ताम्र-पत्र से यह महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है कि जब शेरशाह सूरी चित्तौड़ की ओर आ रहा था, तब उदयसिंह ने जहाजपुर में ही किले की कुंजियाँ भिजवाकर सुलह कर ली और दुर्ग वापस लौटा दिया था।
उत्तर: (स) 1 और 2 दोनों
व्याख्या: गाँव महुदी का ताम्र-पत्र (1544 ई.) महाराणा उदयसिंह और अफगान शासक शेरशाह सूरी के संबंधों का बड़ा साक्ष्य है। इससे प्रमाणित होता है कि उदयसिंह ने चित्तौड़ पर संभावित विनाश को टालने के लिए जहाजपुर में ही शेरशाह सूरी को दुर्ग की चाबियाँ सौंपकर व्यावहारिक कूटनीति से सुलह कर ली थी।
💡 याद रखने की ट्रिक: "महुदी में उदयसिंह ने सूरी को जहाजपुर में चाबी (कुंजी) सौंपी।"
प्रश्न 72: महाराणा प्रताप के शासनकाल से संबंधित निम्नलिखित ताम्र-पत्रों का सही मिलान कीजिए:
सूची-I (ताम्र-पत्र)
A. ढोल का ताम्र-पत्र (1574 ई.)
B. गाँव पीपली का ताम्र-पत्र (1576 ई.)
C. ओझा गाँव का ताम्र-पत्र (1577 ई.)
A. ढोल का ताम्र-पत्र (1574 ई.)
B. गाँव पीपली का ताम्र-पत्र (1576 ई.)
C. ओझा गाँव का ताम्र-पत्र (1577 ई.)
सूची-II (विशेष विवरण)
1. पुरोहित रामेश्वर को गाँव दान; हल्दीघाटी युद्ध के बाद मेवाड़ के पुनर्निर्माण व व्यवस्था सुधार का प्रमाण
2. ढोल गाँव में सैनिक चौकी स्थापित कर जोशी पूना को भूमि अनुदान
3. आचार्य बालकृष्ण को पीपली गाँव भेंट; हल्दीघाटी युद्ध के बाद केंद्रीय मेवाड़ में प्रजा को पुनः बसाना
1. पुरोहित रामेश्वर को गाँव दान; हल्दीघाटी युद्ध के बाद मेवाड़ के पुनर्निर्माण व व्यवस्था सुधार का प्रमाण
2. ढोल गाँव में सैनिक चौकी स्थापित कर जोशी पूना को भूमि अनुदान
3. आचार्य बालकृष्ण को पीपली गाँव भेंट; हल्दीघाटी युद्ध के बाद केंद्रीय मेवाड़ में प्रजा को पुनः बसाना
उत्तर: (अ) A-2, B-3, C-1
व्याख्या:
• ढोल ताम्र-पत्र (1574 ई.): महाराणा प्रताप द्वारा ढोल गाँव में चौकी स्थापित कर प्रबंधकर्ता जोशी पूना को भूमि दान।
• पीपली ताम्र-पत्र (1576 ई.): हल्दीघाटी युद्ध के ठीक बाद आचार्य बालकृष्ण को भूमि भेंट कर केंद्रीय मेवाड़ में उजड़ी प्रजा को फिर से बसाने की शुरुआत।
• ओझा गाँव ताम्र-पत्र (1577 ई.): पुरोहित रामेश्वर को ओझा गाँव दान देना; इसमें युद्ध से भागने वाले सरदारों में से रावत खान (कोठारिया) को कुम्भलगढ़ की गद्दी पर बैठाने तथा युद्ध के बाद की प्रशासनिक अव्यवस्था को ठीक करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
• ढोल ताम्र-पत्र (1574 ई.): महाराणा प्रताप द्वारा ढोल गाँव में चौकी स्थापित कर प्रबंधकर्ता जोशी पूना को भूमि दान।
• पीपली ताम्र-पत्र (1576 ई.): हल्दीघाटी युद्ध के ठीक बाद आचार्य बालकृष्ण को भूमि भेंट कर केंद्रीय मेवाड़ में उजड़ी प्रजा को फिर से बसाने की शुरुआत।
• ओझा गाँव ताम्र-पत्र (1577 ई.): पुरोहित रामेश्वर को ओझा गाँव दान देना; इसमें युद्ध से भागने वाले सरदारों में से रावत खान (कोठारिया) को कुम्भलगढ़ की गद्दी पर बैठाने तथा युद्ध के बाद की प्रशासनिक अव्यवस्था को ठीक करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "74 में ढोल बजाकर चौकी बनाई, 76 में पीपली में प्रजा बसाई, और 77 में ओझा जी ने व्यवस्था सुधारी!"
अध्याय 1: राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत (भाग - 2 - ताम्र-पत्र एवं सिक्के/मुद्राएँ)
प्रश्न 73: बेगूं का ताम्र-पत्र (1715 ई.) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह ताम्र-पत्र मेवाड़ महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के समय का है।
2. इसमें प्रहलाद की बेगूं से एक रहँट व भूमि पीवल, माल, बागे आदि के देने का उल्लेख मिलता है।
3. यह ताम्र-पत्र तत्कालीन समाज में प्रचलित 'भूमि विभाजन की प्रथा' पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: बेगूं का ताम्र-पत्र (1715 ई.) महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के शासनकाल से संबंधित है। इसमें प्रहलाद को भूमि व रहँट अनुदान के विवरण के साथ-साथ तत्कालीन भूमि के विभिन्न प्रकारों (पीवल, माल, बागे आदि) का उल्लेख है, जो मध्यकालीन राजस्थान की 'भूमि विभाजन प्रणाली' को समझने का प्रमुख प्रामाणिक स्रोत है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "संग्राम ने बेगूं में जमीन बांटी (भूमि विभाजन किया)।"
प्रश्न 74: राजस्थान के प्रमुख ताम्र-पत्रों के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. रोही ताम्र-पत्र (जालौर, 1002 ई.) - लेखक सूर्यरवि; परमार वंशीय देवपाल (महिपाल) द्वारा भू-दान का उल्लेख।
2. कद्माल गाँव का ताम्र-पत्र (1194 ई.) - मेवाड़ के गुहिल वंशीय शासक पद्मसिंह का प्रथम ताम्र-पत्र।
3. खरोदा का ताम्र-पत्र (मेवाड़, 1437 ई.) - एकलिंग जी में महाराणा कुंभा द्वारा दान में दिए गए गाँवों का वर्णन।
4. मणु आरापैंडा का ताम्र-पत्र (1641 ई.) - मेवाड़ की महारानी कँवर दे (कर्णसिंह की पत्नी) की द्वारिका यात्रा का उल्लेख (जगतसिंह प्रथम का काल)।
उत्तर: (द) 1, 2, 3 और 4
व्याख्या: चारों ताम्र-पत्र ऐतिहासिक दृष्टि से बिल्कुल सही सुमेलित हैं। रोही ताम्र-पत्र परमार शासक देवपाल का है, कद्माल पद्मसिंह का पहला ताम्र-पत्र है, खरोदा कुंभा के गाँव दान का साक्ष्य है, तथा मणु आरापैंडा महारानी कँवर दे की धार्मिक यात्रा की जानकारी देता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "रोही में रवि, कद्माल में पद्म, खरोदा में कुंभा, और मणु में महारानी कँवर दे की यात्रा!"
प्रश्न 75: प्रतापगढ़ का ताम्र-पत्र (1817 ई.) किस महत्वपूर्ण कर (Tax) से संबंधित व्यवस्था की जानकारी देता है?
उत्तर: (ब) महारावत सामंत सिंह द्वारा ब्राह्मणों पर से 'टंकी कर' हटाने का उल्लेख
व्याख्या: प्रतापगढ़ का ताम्र-पत्र (1817 ई.) तत्कालीन कर-सुधार की दृष्टि से बेहद खास है। इसमें स्पष्ट रूप से वर्णित है कि महारावत सामंत सिंह ने ब्राह्मण वर्ग को राहत देते हुए उन पर लागू 'टंकी कर' समाप्त कर दिया था।
💡 याद रखने की ट्रिक: "प्रतापगढ़ के सामंत ने ब्राह्मणों की पानी की 'टंकी' का कर माफ कर दिया।"
प्रश्न 76: राजपूताना की रियासतों के सिक्कों के प्रामाणिक अध्ययन पर वर्ष 1893 में 'द करेंसीज ऑफ दि हिन्दू स्टेट्स ऑफ राजपूताना' नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना किसने की थी?
उत्तर: (स) डब्ल्यू. डब्ल्यू. वेब
व्याख्या: 1893 ई. में डब्ल्यू. डब्ल्यू. वेब (W.W. Webb) ने तत्कालीन राजपूताना की रियासती मुद्राओं पर गहन शोध करके 'द करेंसीज ऑफ दि हिन्दू स्टेट्स ऑफ राजपूताना' (The Currencies of the Hindu States of Rajputana) नामक ग्रंथ लिखा, जो आज भी राजस्थान के न्यूमिस्मैटिक्स (मुद्राशास्त्र) का आधार स्तंभ माना जाता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "वेब (Web/इंटरनेट) पर राजपूताना की करेंसी (Currencies) सर्च की।"
प्रश्न 77: आहड़ (उदयपुर) के उत्खनन से प्राप्त सिक्कों एवं मुहरों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आहड़ से कुल 6 तांबे के सिक्के तथा इंडो-ग्रीक मुद्राएँ व मुहरों के नमूने प्राप्त हुए हैं, जिनका समय ईसा पूर्व तीसरी सदी से प्रथम-द्वितीय ईस्वी माना जाता है।
2. यहाँ से प्राप्त एक सिक्के पर 'त्रिशूल' का अंकन दिखाई देता है।
3. यहाँ से प्राप्त एक मुहर पर यूनानी देवता 'अपोलो' का अंकन है, जो आहड़ के हिंद-यूनानी (Indo-Greek) शासकों के साथ संबंधों का प्रतीक है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: आहड़ सभ्यता ताम्रयुगीन होने के साथ-साथ ऐतिहासिक काल में भी सक्रिय रही। यहाँ से प्राप्त 6 तांबे के सिक्के, त्रिशूल की छाप और विशेषकर यूनानी देवता अपोलो वाली मुहर यह अकाट्य रूप से प्रमाणित करती है कि आहड़वासियों का हिंद-यूनानी शासकों व व्यापारिक मार्गों से सीधा संपर्क था।
💡 याद रखने की ट्रिक: "आहड़ के तांबे पर अपोलो का त्रिशूल।"
प्रश्न 78: रैढ़ (टोंक) से प्राप्त सिक्कों एवं प्राचीन भारत की सबसे बड़ी मुद्रा निधि के संदर्भ में असत्य कथन पहचानिए:
उत्तर: (द) यहाँ से प्राप्त सेनापति मुद्राओं पर खरोष्ठी लिपि में 'मित्रघोष' अंकित है।
व्याख्या: कथन (द) असत्य है क्योंकि रैढ़ से प्राप्त सेनापति प्रकार की मुद्राओं पर खरोष्ठी नहीं, बल्कि ब्राह्मी लिपि में 'वच्छघोष' अंकित है। बाकी सभी तथ्य बिल्कुल सत्य हैं—रैढ़ को प्राचीन भारत का 'टाटानगर' भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ 3075 पंचमार्क सिक्के (धरण/पण, तौल 57 ग्रेन या 32 रत्ती) एक साथ मिले हैं।
💡 याद रखने की ट्रिक: "रैढ़ में 3075 सिक्कों का ढेर, ब्राह्मी लिपि में वच्छघोष की टेर!"
प्रश्न 79: मालवगण एवं मित्र मुद्राओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों का परीक्षण कीजिए:
1. मालव जाति के सिक्के रैढ़ तथा पूर्वी राजस्थान में हजारों की संख्या में पाए गए हैं।
2. मालव सिक्कों पर 'मालवानां जय' तथा मालव सेनापतियों के नाम जैसे मपय, मजुप, मापेंज्य, मगजश अंकित हैं।
3. मित्र प्रकार की मुद्राएँ ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी की हैं, जिन पर सूर्यमित्र, ब्रह्ममित्र, ध्रुवमित्र आदि नाम अंकित हैं।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: मालवगण के सिक्के ईसा पूर्व दूसरी सदी से ईसा की दूसरी सदी के बीच के हैं। इन पर 'मालवानां जय' और मालव सेनापतियों के नाम मिलते हैं। वहीं मित्र राजाओं के सिक्कों पर सूर्यमित्र, ब्रह्ममित्र और ध्रुवमित्र के नाम खुदे हुए हैं।
💡 याद रखने की ट्रिक: "मालवों ने 'जय' बोली, और मित्रों (सूर्य, ब्रह्म, ध्रुव) ने टोली बनाई।"
प्रश्न 80: राजन्य एवं यौधेय सिक्कों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पूर्वी राजस्थान से प्राप्त 'राजन्य' अंकित सिक्के प्रथम शताब्दी ई.पू. के हैं, जिनके अग्रभाग पर मनुष्य की मूर्ति और उस पर खरोष्ठी लिपि में 'राजन्य जनपदस' तथा पृष्ठ भाग पर नन्दी की आकृति है।
2. यौधेय सिक्के राजस्थान के उत्तरी तथा पश्चिमी भाग से प्राप्त हुए हैं, जिनका समय 400 ई.पू. से गुप्त साम्राज्य के पतन तक माना जाता है।
3. ईसा पूर्व दूसरी सदी के यौधेय सिक्कों पर नन्दी तथा स्तम्भ की आकृति मिलती है और इन पर ब्राह्मी लिपि में 'यौधेयानां बहुधान्यके' अथवा 'बहुधना एवं गण' अंकित है।
उत्तर: (द) 1, 2 और 3
व्याख्या: राजन्य सिक्के पूर्वी राजस्थान के एक गण द्वारा जारी किए गए थे, जिन पर खरोष्ठी में 'राजन्य जनपदस' लिखा है। वहीं यौधेय सिक्के उत्तरी व पश्चिमी राजस्थान से मिले हैं, जिन पर नंदी, स्तम्भ तथा ब्राह्मी लिपि में 'यौधेयानां बहुधान्यके' (अनाज/समृद्धि का प्रतीक) अंकित मिलता है।
💡 याद रखने की ट्रिक: "राजन्य ने खरोष्ठी में राज लिखा, और यौधेयों ने नंदी पूजकर बहुत सारा धान्य (बहुधान्यके) उगाया।"
प्रश्न 41 से 80 पूर्ण
राजस्थान इतिहास — अभिलेख, ताम्र-पत्र एवं सिक्के copyright 2026 Narendra Panchariya

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