RBSE Class 8 Samajik Vigyan (History) Chapter 9 Notes & Model Paper 2027: राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन: 1870 के दशक से 1947 तक
अध्याय 9: राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन: 1870 के दशक से 1947 तक
भारतीय राष्ट्रवाद का उदय, कांग्रेस स्थापना, गांधीवादी जन-आंदोलन, स्वतंत्रता संघर्ष एवं बोर्ड परीक्षा 2027 मॉडल पेपर
नोट: यह अध्ययन सामग्री राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE/RSCERT) के अद्यतन पाठ्यक्रम के अनुसार कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान की बोर्ड परीक्षा तथा शिक्षक भर्ती परीक्षाओं (REET, RPSC) की आधारभूत तैयारी हेतु तैयार की गई है।
1. प्रस्तावना: राष्ट्रवाद का उदय और स्वतंत्रता संघर्ष
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने भारत पर प्रत्यक्ष औपनिवेशिक नियंत्रण स्थापित कर लिया था। परंतु ब्रिटिश आर्थिक नीतियों, संसाधनों के दोहन और नस्लीय भेदभाव ने भारतीयों में यह चेतना जागृत की कि भारत यहाँ के निवासियों का देश है और जब तक औपनिवेशिक नियंत्रण समाप्त नहीं होगा, देश का विकास असंभव है। 1870 के दशक से प्रारंभ हुआ यह वैचारिक जागरण 1947 में 15 अगस्त को भारत की स्वतंत्रता के साथ संपन्न हुआ।
2. भारतीय जनमानस में असंतोष के प्रमुख कारण
- दमनकारी कानून (1878):
- आर्म्स एक्ट (1878): भारतीयों द्वारा हथियार रखने पर कानूनी प्रतिबंध लगा दिया गया।
- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878): देशी भाषाओं के समाचार पत्रों पर कड़ा सेंसरशिप कानून थोप दिया गया ताकि सरकार की आलोचना को दबाया जा सके।
- इल्बर्ट बिल विवाद (1883): वायसराय लॉर्ड रिपन की परिषद द्वारा लाए गए इस बिल में भारतीय जजों को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमों की सुनवाई का अधिकार दिया जाना था। अंग्रेजों के कड़े विरोध के बाद सरकार को बिल वापस लेना पड़ा, जिसने ब्रिटिश नस्लवाद की पोल खोल दी।
3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885)
- गठन: 28 दिसंबर 1885 को बंबई (मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में 72 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में कांग्रेस का गठन हुआ।
- प्रथम अध्यक्ष: व्योमेश चंद्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee)।
- प्रारंभिक नेतृत्व: दादाभाई नौरोजी (जिन्होंने धन की निकासी का सिद्धांत दिया), फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले।
4. नरम दल बनाम गरम दल (उग्रवादी दौर)
| वर्ग | प्रमुख नेता | कार्यप्रणाली एवं उद्देश्य |
|---|---|---|
| नरमपंथी (1885-1905) | दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, सुरेंद्रनाथ बनर्जी | शांतिपूर्ण व संवैधानिक साधन; याचिकाओं (Petitions), लेखों और भाषणों के माध्यम से प्रशासनिक सुधारों की मांग। |
| गरमपंथी / उग्रवादी (1905 के बाद) | लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) | प्रत्यक्ष जन-कार्रवाई, हड़ताल और बहिष्कार। तिलक का उद्घोष: "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।" |
5. बंगाल विभाजन (1905) एवं स्वदेशी आंदोलन
- विभाजन: 1905 में वायसराय लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक सुविधा का बहाना बनाकर बंगाल का विभाजन कर दिया। वास्तविक उद्देश्य राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख केंद्र बंगाल के हिंदू और मुसलमानों में फूट डालना था।
- स्वदेशी आंदोलन: विभाजन के विरोध में व्यापक आंदोलन भड़क उठा। विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गई, देशी कारखानों और राष्ट्रीय शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया। आंध्र प्रदेश के डेल्टा क्षेत्रों में इसे 'वंदे मातरम् आंदोलन' कहा गया।
- मुस्लिम लीग (1906): 1906 में ढाका में नवाब सलीमुल्लाह और आगा खां के नेतृत्व में 'ऑल इंडिया मुस्लिम लीग' की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर पृथक निर्वाचिका की मांग की।
6. महात्मा गांधी का भारत आगमन और जन-आंदोलनों का युग
जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधीजी ने देश का व्यापक भ्रमण किया और राष्ट्रीय आंदोलन को आम जनता (किसानों, मजदूरों, महिलाओं) से जोड़ दिया:
- प्रारंभिक सत्याग्रह:
- चंपारण (1917): बिहार में तिनकठिया पद्धति के विरुद्ध नील किसानों का समर्थन।
- खेड़ा (1918): गुजरात में फसल नष्ट होने पर किसानों के लिए लगान माफी की मांग।
- अहमदाबाद (1918): सूती मिल मजदूरों के लिए प्लेग बोनस और मजदूरी वृद्धि हेतु सफल भूख हड़ताल।
- रॉलेट सत्याग्रह एवं जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919):
बिना अपील, बिना वकील, बिना दलील के कैद करने वाले 'रॉलेट एक्ट' के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियाँ चलवाईं, जिसमें सैकड़ों निर्दोष मारे गए। इसके विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश 'नाइटहुड' (Knighthood) उपाधि लौटा दी।
- असहयोग आंदोलन (1920-1922):
खिलाफत आंदोलन और पंजाब के अत्याचारों के विरोध में प्रारंभ। विदेशी कपड़ों, स्कूलों और सरकारी पदों का त्याग किया गया। परंतु फरवरी 1922 में गोरखपुर के चौरी-चौरा में पुलिस चौकी को आग लगाने की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन तुरंत स्थगित कर दिया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं दांडी मार्च (1930):
नमक पर सरकारी एकाधिकार के विरुद्ध गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती से 240 मील पैदल चलकर 6 अप्रैल 1930 को दांडी के समुद्र तट पर नमक बनाकर कानून तोड़ा। इसके साथ ही देश भर में नमक व कर बंदी का सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ हुआ।
- भारत छोड़ो आंदोलन (अगस्त 1942):
क्रिप्स मिशन की विफलता और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने देश को "करो या मरो" (Do or Die) का अंतिम आह्वान किया। यह औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध भारत का सबसे विशाल जन-विद्रोह सिद्ध हुआ।
RBSE कक्षा 8 बोर्ड परीक्षा - 2027
विषय: सामाजिक विज्ञान (इतिहास) • मॉडल प्रश्न पत्र
अध्याय 9: राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन: 1870 के दशक से 1947 तक | पूर्णांक: 25 | समय: 45 मिनट
खंड 'अ' : बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)
-
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
(अ) 1857 ई. (ब) 1885 ई. (स) 1905 ई. (द) 1920 ई.
उत्तर: (ब) 1885 ई. -
बंगाल का विभाजन 1905 में किस ब्रिटिश वायसराय द्वारा किया गया था?
(अ) लॉर्ड कर्जन (ब) लॉर्ड डलहौजी (स) लॉर्ड रिपन (द) लॉर्ड कैनिंग
उत्तर: (अ) लॉर्ड कर्जन -
"स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" का प्रसिद्ध उद्घोष किसने किया था?
(अ) महात्मा गांधी (ब) सुभाष चंद्र बोस (स) बाल गंगाधर तिलक (द) लाला लाजपत राय
उत्तर: (स) बाल गंगाधर तिलक -
जलियाँवाला बाग नरसंहार किस ऐतिहासिक तिथि को घटित हुआ था?
(अ) 10 मई 1857 (ब) 13 अप्रैल 1919 (स) 6 अप्रैल 1930 (द) 9 अगस्त 1942
उत्तर: (ब) 13 अप्रैल 1919
खंड 'ब' : अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 1 अंक)
प्र.5 ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट किस वर्ष पारित किया गया था?
उत्तर: वर्ष 1878 में।
प्र.6 उग्र राष्ट्रवाद के प्रसिद्ध त्रिक 'लाल-बाल-पाल' में कौन-कौन से नेता शामिल थे?
उत्तर: लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक तथा बिपिन चंद्र पाल।
प्र.7 ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की स्थापना किस वर्ष और कहाँ हुई थी?
उत्तर: वर्ष 1906 में ढाका (वर्तमान बांग्लादेश) में।
प्र.8 महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का नारा किस आंदोलन के दौरान दिया था?
उत्तर: 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान।
खंड 'स' : लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 3 अंक)
प्र.9 कांग्रेस के प्रारंभिक काल (1885-1905) के नरमपंथी नेताओं की कार्यपद्धति समझाइए।
उत्तर:
1. नरमपंथी नेता ब्रिटिश न्यायप्रियता में आस्था रखते थे और क्रमिक प्रशासनिक सुधारों के पक्षधर थे।
2. वे अपनी माँगें प्रार्थना पत्रों, प्रस्तावों, शिष्टमंडलों और समाचार पत्रों में लेखों के माध्यम से सरकार तक पहुँचाते थे।
3. उनका प्रमुख योगदान देश में जनचेतना जगाना और ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीय धन के दोहन को उजागर करना था।
प्र.10 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में चलाए गए स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख लक्षण क्या थे?
उत्तर:
1. ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं और वस्त्रों का राष्ट्रव्यापी सार्वजनिक बहिष्कार किया गया।
2. देशी उद्योगों, हस्तशिल्प और राष्ट्रीय शिक्षा संस्थाओं की स्थापना पर बल दिया गया।
3. इस आंदोलन ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम को केवल पढ़े-लिखे वर्ग तक सीमित न रखकर एक सशक्त जन-आंदोलन का रूप दिया।
प्र.11 असहयोग आंदोलन (1920-1922) के प्रमुख रचनात्मक और नकारात्मक कार्यक्रम क्या थे?
उत्तर:
1. बहिष्कार: सरकारी उपाधियों का त्याग, विधान परिषदों, अदालतों, सरकारी विद्यालयों और विदेशी वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार।
2. रचनात्मक कार्य: चरखा और खादी का प्रचार, राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना तथा अस्पृश्यता निवारण।
3. हिंदू-मुस्लिम एकता: खिलाफत आंदोलन को समर्थन देकर साझी राष्ट्रीय एकता स्थापित करना।
खंड 'द' : दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (प्रत्येक प्रश्न 4 अंक)
प्र.12 महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) और दांडी मार्च के ऐतिहासिक महत्व का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
दांडी मार्च: नमक दैनिक जीवन की बुनियादी आवश्यकता था, जिस पर अंग्रेजों ने कर लगा रखा था। गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती से 78 सत्याग्रहियों के साथ 240 मील की यात्रा प्रारंभ की और 6 अप्रैल 1930 को दांडी में प्राकृतिक नमक उठाकर एकाधिकार कानून तोड़ा।
महत्व एवं प्रभाव:
• इस प्रतीकात्मक कदम ने पूरे देश में ब्रिटिश कानूनों के उल्लंघन का ज्वार पैदा किया।
• महिलाओं ने बड़ी संख्या में शराब की दुकानों, विदेशी कपड़ों की पिकेटिंग में भाग लेकर आंदोलन को व्यापकता दी।
• औपनिवेशिक सत्ता की वैधता पहली बार इस हद तक कमजोर हुई कि सरकार को बातचीत हेतु गोलमेज सम्मेलनों का सहारा लेना पड़ा।
प्र.13 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' की पृष्ठभूमि, स्वरूप और स्वतंत्रता प्राप्ति में इसकी भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
पृष्ठभूमि: द्वितीय विश्व युद्ध में भारत को बिना सहमति शामिल करने, आर्थिक संकट और क्रिप्स मिशन की विफलता के कारण जनता में तीव्र असंतोष था।
स्वरूप:
• 8 अगस्त 1942 को गांधीजी के "करो या मरो" आह्वान के बाद सभी शीर्ष नेताओं को बंदी बना लिया गया।
• शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति में यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त बन गया; छात्रों, मजदूरों और किसानों ने संचार तंत्र, रेलवे स्टेशनों और सरकारी थानों पर अधिकार करने का प्रयास किया। कई क्षेत्रों (जैसे बलिया, तामलुक) में समानांतर सरकारें बनीं।
परिणाम: यद्यपि ब्रिटिश दमन अत्यंत कठोर था, किंतु इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि औपनिवेशिक हुकूमत के दिन अब समाप्त हो चुके हैं। इसने स्वतंत्रता संग्राम को अंतिम निर्णायक मोड़ दिया जिसके परिणामस्वरूप 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ।

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