RPSC 2nd Grade दर्शनशास्त्र Notes: वेद एवं उपनिषद कालीन दर्शन, भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन | 16 महत्वपूर्ण MCQ प्रश्न एवं विस्तृत व्याख्या

RPSC 2nd Grade • दर्शनशास्त्र

दर्शनशास्त्र 2nd Grade

वेद एवं उपनिषद कालीन दर्शन • भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन • अभ्यास प्रश्न एवं विस्तृत व्याख्या

अध्याय 1: वेद एवं उपनिषद कालीन दर्शन – मूलभूत अवधारणाएँ

अभ्यास प्रश्न एवं विस्तृत व्याख्या
प्रश्न 1 ‘दर्शन’ शब्द की व्युत्पत्ति और अर्थ के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ‘दर्शन’ शब्द संस्कृत भाषा की ‘दृश्’ धातु से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’ अर्थात् जिसके द्वारा देखा जाए या आत्म-साक्षात्कार किया जाए, होता है।
2. भारतीय दर्शन की उत्पत्ति मुख्य रूप से बौद्धिक जिज्ञासा को शांत करने मात्र के लिए हुई है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (A) केवल 1
सरल व्याख्या: कथन 1 पूरी तरह सत्य है क्योंकि दर्शन का अर्थ ‘जिसके द्वारा देखा जाए’ या आत्म-दर्शन है। कथन 2 असत्य है क्योंकि भारतीय दर्शन की उत्पत्ति केवल बौद्धिक व्याख्या या जिज्ञासा से संतुष्ट होना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक असंतोष एवं जीवन के दुखों को दूर करके ‘तत्त्व की अनुभूति’ प्राप्त करना है।
प्रश्न 2 पाश्चात्य परंपरा में ‘फिलासफी’ (Philosophy) शब्द के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए:
सूची-I (शब्द)
1. Philos
2. Sophia
सूची-II (अर्थ)
(अ) ज्ञान
(ब) प्रेम या अनुराग

सही विकल्प का चयन कीजिए:

(A) 1-(ब), 2-(अ)
(B) 1-(अ), 2-(ब)
(C) दोनों सही सुमेलित नहीं हैं
✓ उत्तर: (A) 1-(ब), 2-(अ)
सरल व्याख्या: पाश्चात्य शब्द ‘Philosophy’ ग्रीक भाषा के दो शब्दों—‘Philos’ (जिसका अर्थ प्रेम या अनुराग है) और ‘Sophia’ (जिसका अर्थ ज्ञान है) से मिलकर बना है। अतः ‘ज्ञान के प्रति प्रेम या अनुराग ही फिलॉसफी है’।
प्रश्न 3 भारतीय दर्शन और पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति के उद्देश्यों के संबंध में कथनों का परीक्षण कीजिए:
1. भारतीय दर्शन का मुख्य उद्देश्य जीवन के दुखों को दूर करना और आत्म-साक्षात्कार करना है।
2. पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति मुख्य रूप से मनुष्य की उत्सुकता एवं जिज्ञासा को शांत करने के लिए हुई है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: दिए गए दोनों कथन बिल्कुल सत्य हैं; भारतीय दर्शन दुखों के निवारण और तत्त्व की अनुभूति पर बल देता है, जबकि पाश्चात्य दर्शन की जड़ें उत्सुकता एवं जिज्ञासा को शांत करने में निहित हैं।
भारतीय दर्शन का वर्गीकरण
प्रश्न 4 भारतीय दर्शन के वर्गीकरण के आधार पर ‘आस्तिक’ और ‘नास्तिक’ दर्शनों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आस्तिक दर्शन वे हैं जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार करते हैं।
2. नास्तिक दर्शन वे हैं जो वेदों की प्रामाणिकता को स्वीकार नहीं करते हैं।
3. सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत आस्तिक दर्शन के अंतर्गत आते हैं।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
✓ उत्तर: (D) 1, 2 और 3 सभी
सरल व्याख्या: भारतीय दर्शन में आस्तिक और नास्तिक की परिभाषा ईश्वर को मानने या न मानने पर आधारित न होकर वेदों की सत्ता को स्वीकार करने पर आधारित है। वेदों को मानने वाले आस्तिक (जैसे—सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत) और न मानने वाले नास्तिक (जैसे—जैन, बौद्ध, चार्वाक) कहलाते हैं।
प्रश्न 5 ईश्वरवादी और अनश्वरवादी दर्शनों के सही युग्मों का मिलान कीजिए:
सूची-I (वर्गीकरण)
1. ईश्वरवादी दर्शन
2. अनश्वरवादी दर्शन
सूची-II (दर्शन)
(अ) जैन, बौद्ध, चार्वाक, सांख्य, मीमांसा
(ब) योग, न्याय, वैशेषिक, वेदांत
(A) 1-(ब), 2-(अ)
(B) 1-(अ), 2-(ब)
(C) दोनों सही सुमेलित नहीं हैं
✓ उत्तर: (A) 1-(ब), 2-(अ)
सरल व्याख्या: जो दर्शन ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं वे ईश्वरवादी (योग, न्याय, वैशेषिक, वेदांत) हैं, और जो ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करते वे अनश्वरवादी (जैन, बौद्ध, चार्वाक, सांख्य, मीमांसा) कहलाते हैं।
प्रश्न 6 चार्वाक दर्शन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चार्वाक दर्शन को ‘नास्तिक शिरोमणि’ कहा जाता है।
2. यह दर्शन कर्मसिद्धांत, आत्मा, पूर्वजन्म, पुनर्जन्म, ईश्वर और वेद—इनमें से किसी पर भी विश्वास नहीं करता है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: दिए गए दोनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। चार्वाक दर्शन वेदों और ईश्वर के साथ-साथ आत्मा व पुनर्जन्म को भी नहीं मानता, इसलिए इसे नास्तिक शिरोमणि कहा गया है।
प्रश्न 7 भारतीय दर्शन की सामान्य विशेषताओं (चार्वाक को छोड़कर) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. न्याय-वैशेषिक दर्शन कर्मसिद्धांत को ‘अदृष्ट’ कहते हैं, जबकि मीमांसा दर्शन इसे ‘अपूर्व’ कहता है।
2. कर्मसिद्धांत के अनुसार ‘कृतप्रणाश’ एवं ‘अकृताभ्युपगम’ नहीं होता है, अर्थात किए गए कर्म का फल नष्ट नहीं होता और बिना किए फल प्राप्त नहीं होता।
3. कर्मसिद्धांत के तीन प्रकार—प्रारब्ध कर्म, संचित कर्म और संचीयमान/क्रियमाण कर्म हैं।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
✓ उत्तर: (D) 1, 2 और 3 सभी
सरल व्याख्या: दिए गए तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। न्याय-वैशेषिक में कर्म को ‘अदृष्ट’ और मीमांसा में ‘अपूर्व’ कहा गया है। कर्मसिद्धांत के नियम के तहत किए गए कर्म का फल अवश्य मिलता है और इसके तीन रूप (प्रारब्ध, संचित, क्रियमाण) होते हैं।
प्रश्न 8 भारतीय दर्शन में बंधन के कारण और पुनर्जन्म के संबंध में निम्नलिखित कथनों का परीक्षण कीजिए:
1. चार्वाक को छोड़कर सभी दार्शनिक (वैदिक तथा अवैदिक) पूर्वजन्म, पुनर्जन्म तथा आत्मा की सत्ता में विश्वास करते हैं।
2. भारतीय दर्शन में ‘अज्ञानता’ को बंधन का मुख्य कारण माना गया है, जिसके कारण जीव को तत्त्व ज्ञान नहीं हो पाता।
(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: दोनों कथन सत्य हैं। चार्वाक को छोड़कर लगभग सभी भारतीय दर्शन पुनर्जन्म व आत्मा को मानते हैं, तथा अज्ञान के कारण ही मनुष्य अनित्य को नित्य और अयथार्थ को यथार्थ मान बैठता है, जो उसके बंधन का कारण बनता है।
भारतीय दर्शन के मोक्ष संबंधी विचार एवं पाश्चात्य दर्शन की विशेषताएँ
प्रश्न 9 विभिन्न भारतीय दर्शनों में मोक्ष और उनके शाब्दिक अर्थ के संबंध में सही युग्म का चयन कीजिए:
सूची-I (दर्शन)
1. जैन दर्शन
2. बौद्ध दर्शन
3. न्याय-वैशेषिक दर्शन
4. वेदांत दर्शन
सूची-II (मोक्ष का रूप व अर्थ)
(अ) कैवल्य — आत्मा की स्वाभाविक अवस्था
(ब) निर्वाण — बुझ जाना
(स) अपवर्ग — दुःखों के उच्छेद की अवस्था
(द) आत्म-साक्षात्कार — आत्मा का ब्रह्म में विलीन
(A) 1-(अ), 2-(ब), 3-(स), 4-(द)
(B) 1-(ब), 2-(अ), 3-(द), 4-(स)
(C) 1-(अ), 2-(स), 3-(ब), 4-(द)
(D) 1-(द), 2-(ब), 3-(अ), 4-(स)
✓ उत्तर: (A) 1-(अ), 2-(ब), 3-(स), 4-(द)
सरल व्याख्या: सभी भारतीय दर्शन परम पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ को स्वीकार करते हैं और इसके लिए अलग-अलग नाम व अर्थ दिए गए हैं, जो उपर्युक्त सूची के अनुसार पूर्णतः सत्य हैं।
प्रश्न 10 भारतीय दर्शन की अन्य प्रमुख विशेषताओं से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अधिक महत्व दिया गया है तथा नैतिक आचरण पर अधिक बल प्रदान किया जाता है।
2. सभी दर्शनों (चार्वाक को छोड़कर) ने आत्मसंयम पर बल दिया है।
3. भारतीय दर्शन को धर्म और दर्शन का समन्वय कहा जाता है, तथा शंकर और योगाचार को छोड़कर सभी दार्शनिक जगत की सत्यता में विश्वास करते हैं।
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3 सभी
✓ उत्तर: (D) 1, 2 और 3 सभी
सरल व्याख्या: दिए गए तीनों कथन भारतीय दर्शन की मूल प्रकृति को भली-भांति स्पष्ट करते हैं। इसमें नैतिकता, आत्मसंयम और जगत की वास्तविकता पर व्यापक चर्चा मिलती है।
प्रश्न 11 पाश्चात्य दर्शन की विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों का परीक्षण कीजिए:
1. पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति आश्चर्य, उत्सुकता एवं जिज्ञासा को शांत करने के लिए हुई है।
2. पाश्चात्य दर्शन का स्वरूप बौद्धिक है इसलिए वहाँ बुद्धि को ज्ञान प्राप्ति का साधन माना गया है तथा चिंतन में वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग होने के कारण इसमें वैज्ञानिकता अधिक होती है।
(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: दोनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। पाश्चात्य दर्शन मुख्यतः तार्किक जिज्ञासा, बौद्धिक व्याख्या और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होता है।
पाश्चात्य दर्शन की विशेषताएँ एवं सैद्धांतिक स्वरूप
प्रश्न 12 पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति और उसके स्वरूप के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पाश्चात्य दर्शन की उत्पत्ति आश्चर्य, उत्सुकता एवं जिज्ञासा को शांत करने के लिए हुई है।
2. पाश्चात्य दर्शन का स्वरूप बौद्धिक है इसलिए वहाँ बुद्धि को ज्ञान प्राप्ति का साधन माना गया है।
(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: पाश्चात्य दर्शन की जड़ें जिज्ञासा को शांत करने में निहित हैं और इसका स्वरूप बौद्धिक होने के कारण इसमें बुद्धि को ही ज्ञान प्राप्ति का प्रमुख साधन स्वीकार किया गया है।
प्रश्न 13 पाश्चात्य चिंतन और उसकी वैज्ञानिक पद्धतियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों का परीक्षण कीजिए:
1. पाश्चात्य दर्शन में सैद्धांतिक चिंतन व्याख्या मात्र देखा जाता है, क्योंकि वहाँ जिज्ञासा को शांत करने के लिए ईश्वर, विश्व और आत्मा का चिंतन किया गया है।
2. पाश्चात्य दर्शन में वैज्ञानिकता अधिक पाई जाती है क्योंकि इसके चिंतन में वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: दिए गए दोनों कथन सत्य हैं; पाश्चात्य चिंतन में ईश्वर, विश्व व आत्मा को लेकर सैद्धांतिक व्याख्या मिलती है तथा इसमें वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग होने से वैज्ञानिकता अधिक होती है।
दर्शन शास्त्र की शाखाएँ
प्रश्न 14 पाश्चात्य दर्शन की प्रकृति और ‘दर्शन शास्त्र की शाखाओं’ के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पाश्चात्य दर्शन मुख्य रूप से ‘क्यों’ और ‘कैसे’ की व्याख्या करता है तथा यह केवल ‘इह-लोक’ की ही सत्ता में विश्वास करता है।
2. दर्शन शास्त्र की प्रमुख शाखाओं में ज्ञान मीमांसा, तत्त्व मीमांसा और नीति मीमांसा शामिल हैं।
(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: पृष्ठ पर दिए गए विवरण के अनुसार, पाश्चात्य दर्शन ‘क्यों’ और ‘कैसे’ की व्याख्या करते हुए इह-लोक की सत्ता में विश्वास रखता है, और दर्शन शास्त्र की मुख्य तीन शाखाएँ ज्ञान मीमांसा, तत्त्व मीमांसा व नीति मीमांसा हैं।
प्रश्न 15 दर्शन शास्त्र की शाखाओं और उनके वैकल्पिक नामों के सही युग्म का चयन कीजिए:
सूची-I (शाखा)
1. ज्ञान मीमांसा
2. तत्त्व मीमांसा
सूची-II (वैकल्पिक नाम / संबंधित क्षेत्र)
(अ) इसे ‘प्रमाण मीमांसा’ भी कहते हैं, जिसमें ज्ञान प्राप्ति के साधन व प्रामाणिकता की विवेचना होती है।

(ब) इसे ‘सत्ता मीमांसा’ भी कहते हैं, जिसमें ईश्वर, जगत, आत्मा आदि तत्त्वों की विवेचना की जाती है।
(A) 1-(अ), 2-(ब)
(B) 1-(ब), 2-(अ)
(C) दोनों सही सुमेलित नहीं हैं
✓ उत्तर: (A) 1-(अ), 2-(ब)
सरल व्याख्या: ज्ञान मीमांसा को प्रमाण मीमांसा भी कहा जाता है, और तत्त्व मीमांसा को सत्ता मीमांसा कहा जाता है जिसमें भौतिकता से परे के तत्त्वों की विवेचना होती है।
प्रश्न 16 ‘मेटाफिजिक्स’ (Meta + Physics) शब्द और दर्शन की शाखाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों का परीक्षण कीजिए:
1. ‘मेटाफिजिक्स’ में ‘मेटा’ का अर्थ ‘परे’ और ‘फिजिक्स’ का अर्थ ‘भौतिकता’ होता है, अर्थात् भौतिकता से परे के तत्त्वों की जहाँ विवेचना की जाती है, उसे मेटाफिजिक्स (तत्त्व मीमांसा) कहते हैं।
2. ‘नीति मीमांसा’ दर्शन शास्त्र की वह शाखा है जिसमें नैतिकता से संबंधित शुभ-अशुभ, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य आदि नैतिक आदर्शों की विवेचना की जाती है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(A) केवल 1
(B) केवल 2
(C) 1 और 2 दोनों
(D) न तो 1, न ही 2
✓ उत्तर: (C) 1 और 2 दोनों
सरल व्याख्या: दोनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। मेटाफिजिक्स भौतिकता से परे के जगत का अध्ययन करता है, जबकि नीति मीमांसा मानवीय आचरण, उचित-अनुचित और नैतिक आदर्शों का निर्धारण करती है।

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