शारदा तिलक तंत्र एवं कात्यायन श्रौतसूत्र अनुसार: मिट्टी की वेदी निर्माण विधान
(मिट्टी की वेदी का शास्त्रीय स्वरूप, चरणबद्ध हवन विधि एवं अनिवार्य सावधानियाँ)
१. मिट्टी की वेदी कैसी हो? (आकार और स्वरूप)
- सटीक नाप और ज्यामिति (Geometry): वेदी पूरी तरह से चौकोर (Square) होनी चाहिए। सामान्य गृहस्थ यज्ञ के लिए १ हाथ लंबी, १ हाथ चौड़ी और १ मुट्ठी ऊँची (लगभग १८ इंच × १८ इंच और ३ से ४ इंच ऊँची) वेदी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
- शुद्ध सामग्री: वेदी बनाने के लिए किसी नदी, तालाब या स्वच्छ स्थान की शुद्ध पीली या दोमट मिट्टी लाएं। उसमें कंकड़, पत्थर, बाल या अशुद्ध चीजें नहीं होनी चाहिए।
- ईंटों का आधार: ज़मीन पर सीधे मिट्टी रखने के बजाय, नीचे साफ ईंटों को चौकोर क्रम में जमा लें, फिर उसके ऊपर मिट्टी का सुंदर और समतल लेपन करें।
- गोबर से लेपन (कल्याणकारी स्वरूप): वेदी तैयार होने के बाद उसे शुद्ध गाय के गोबर और गंगाजल से अच्छी तरह लीप लें। शास्त्रों के अनुसार, गोबर में साक्षात महालक्ष्मी का वास होता है, जो नकारात्मक तरंगों को रोकती है।
२. मिट्टी की वेदी पर हवन करने की पूरी विधि (चरणबद्ध)
- Step १: वेदी का भूसंस्कार: हवन शुरू करने से पहले वेदी पर पंच-भूसंस्कार (झाड़ना, रेखा खींचना, जल छिड़कना) अवश्य करें, जिसका वर्णन हमने अध्याय १४ में किया है।
- Step २: अष्टदल कमल का निर्माण: वेदी के बिल्कुल केंद्र में शुद्ध कुमकुम या हल्दी से अष्टदल कमल (आठ पंखुड़ियों वाला कमल) बनाएं। यह साक्षात नवग्रहों और देवताओं का आसन माना जाता है।
- Step ३: समिधा विन्यास: अष्टदल कमल के ऊपर आम या पीपल की सूखी लकड़ियों (समिधाओं) को चौकोर आकार में एक के ऊपर एक (जैसे महल बनता है) व्यवस्थित करें।
- Step ४: अग्नि स्थापन: कपूर के माध्यम से अग्नि प्रज्वलित करें और ऋग्वेद के मन्त्र से अग्नि देव का आवाहन कर वेदी के केंद्र में स्थापित करें।
- Step ५: आहुति एवं पूर्णाहुति: निर्धारित मंत्रों से आहुति देने के बाद अंत में सूखा नारियल (श्रीफल) वेदी के मध्य समर्पित कर पूर्णाहुति संपन्न करें।
३. अनिवार्य सावधानियाँ (क्या ध्यान रखें?)
मिट्टी की वेदी पर हवन करते समय थोड़ी सी भी असावधानी से यज्ञ खंडित हो सकता है, इसलिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करें:
- मिट्टी का गीलापन: वेदी पूरी तरह सूखी होनी चाहिए। यदि मिट्टी अत्यधिक गीली होगी, तो अग्नि प्रज्वलित होने पर मिट्टी फटने लगेगी और उसमें से निकलने वाली भाप (Moisture) अग्नि को मंद कर देगी, जिससे 'धूम्र दोष' (अत्यधिक धुआं होना) उत्पन्न होगा।
- अग्नि का फैलाव: चूँकि यह वेदी ऊपर की ओर खुली होती है (इसमें कुंड की तरह गहरा गड्ढा नहीं होता), इसलिए लकड़ियों को बहुत ऊँचा न उठाएं। हवा के वेग से अग्नि के कोयले वेदी से बाहर नहीं गिरने चाहिए।
- जल का प्रयोग वर्जित: यज्ञ समाप्ति के बाद वेदी की अग्नि को कभी भी पानी छिड़क कर शांत न करें। यह घोर दोष है। अग्नि को अपने आप स्वतः ही शांत (शीतल) होने दें।
- भस्म विसर्जन: अगले दिन जब वेदी पूरी तरह ठंडी हो जाए, तो उसकी पवित्र भस्म (राख) को किसी साफ पात्र में निकाल लें और उसे किसी पौधे या पवित्र नदी में विसर्जित करें। उस पर पैर नहीं पड़ना चाहिए।
अध्याय १६: प्रधान देव आहुति एवं वेदोक्त मन्त्र रहस्य
(देवताओं का चयन, आहुति विज्ञान, उंगलियों की गुप्त मुद्राएं एवं विधिपूर्वक यज्ञ संचालन विधान)
खण्ड १: गहराई से कारण (The Why?)
यज्ञ विज्ञान में प्रधान देवताओं को निश्चित क्रम और संख्या में आहुति देना केवल एक धार्मिक औपचारिकता नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ अपने शरीर के ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जोड़ने की एक परम वैज्ञानिक विधा है।
अग्नि का मुख और देवताओं की तृप्ति: वेदों के अनुसार, “अग्निमुखा वै देवाः” (शतपथ ब्राह्मण) अर्थात् अग्नि ही समस्त देवी-देवताओं का साक्षात् मुख हैं। जिस प्रकार हमारे पेट में स्थित जठराग्नि भोजन को पचाकर पूरे शरीर की नसों और अंगों तक ऊर्जा पहुँचाती है, ठीक उसी प्रकार हवन कुंड की जाग्रत अग्नि हविष्य (सामग्री और घी) को अत्यंत सूक्ष्म परमाणुओं और दिव्य गंध में बदलकर उसे ब्रह्मांडीय तरंगों के माध्यम से संबंधित देवताओं तक पहुँचाती है।
मन्त्र और स्वाहा का अचूक तालमेल: मन्त्र का प्रत्येक अक्षर एक विशेष ध्वनि तरंग (Sound Vibration) उत्पन्न करता है। जब हम मन्त्र के अंत में 'स्वाहा' कहते हैं, तो वह शब्द उस ऊर्जा को 'लॉन्च' (प्रक्षेपित) करने का कार्य करता है। यदि स्वाहा शब्द के उच्चारण से पहले या बहुत बाद में सामग्री डाली जाए, तो ध्वनि और द्रव्य का संपर्क टूट जाता है, जिससे यज्ञ का फल नष्ट हो जाता है।
खण्ड २: अनिवार्य प्रधान देवताओं का क्रम, संख्या और वेदोक्त मन्त्र (The How & Sources)
किसी भी प्रामाणिक हवन को सफल बनाने के लिए निम्नलिखित ९ शक्तियों को क्रमबद्ध आहुति देना वेदों और पुराणों में अनिवार्य बताया गया है:
१. भगवान गणेश (विघ्नहर्ता)
क्यों देनी है: यज्ञशाला में किसी भी प्रकार की आसुरी बाधा, मतिभ्रम या विघ्न न आए, और वातावरण पूरी तरह सात्विक बना रहे।
कितनी आहुति: ५ या ११ आहुति (घी और सामग्री मिश्रित)।
कितनी आहुति: ५ या ११ आहुति (घी और सामग्री मिश्रित)।
मन्त्र (स्रोत: यजुर्वेद संहिता २३.१९):
॥ ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम। आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ स्वाहा ॥
॥ ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम। आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥ स्वाहा ॥
२. नवग्रह मण्डल (नौ ग्रह)
क्यों देनी है: हमारे सौरमण्डल के नौ ग्रहों के खगोलीय कंपनों और रश्मियों को अनुकूल करने के लिए, ताकि जातक के प्रारब्ध के कष्ट शांत हों।
कितनी आहुति: प्रत्येक ग्रह के लिए १-१ आहुति (कुल ९ आहुति)।
कितनी आहुति: प्रत्येक ग्रह के लिए १-१ आहुति (कुल ९ आहुति)।
मन्त्र (स्रोत: यजुर्वेद नवग्रह सूक्त):
॥ ॐ सूर्याय स्वाहा, ॐ सोमाय स्वाहा, ॐ मङ्गलाय स्वाहा, ॐ बुधाय स्वाहा, ॐ बृहस्पतये स्वाहा, ॐ शुक्राय स्वाहा, ॐ शनैश्चराय स्वाहा, ॐ राहवे स्वाहा, ॐ केतवे स्वाहा ॥
॥ ॐ सूर्याय स्वाहा, ॐ सोमाय स्वाहा, ॐ मङ्गलाय स्वाहा, ॐ बुधाय स्वाहा, ॐ बृहस्पतये स्वाहा, ॐ शुक्राय स्वाहा, ॐ शनैश्चराय स्वाहा, ॐ राहवे स्वाहा, ॐ केतवे स्वाहा ॥
३. वेदमाता गायत्री
क्यों देनी है: साधक की बुद्धि को जाग्रत, पवित्र करने और शरीर के भीतर सात्विक प्राण ऊर्जा के तीव्र प्रवाह के लिए।
कितनी आहुति: २४ या १०८ आहुति (गायत्री मन्त्र के बिना कोई भी हवन संपूर्ण नहीं माना जाता)।
कितनी आहुति: २४ या १०८ आहुति (गायत्री मन्त्र के बिना कोई भी हवन संपूर्ण नहीं माना जाता)।
मन्त्र (स्रोत: ऋग्वेद संहिता ३.६२.१०):
॥ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ स्वाहा ॥
॥ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ स्वाहा ॥
४. पंच-प्राण आहुति (शरीर की पांच वायु)
क्यों देनी है: हमारे भौतिक शरीर के भीतर स्थित पांच मुख्य प्राणों को यज्ञीय ऊर्जा से ऊर्ध्वगामी, शुद्ध और निरोगी बनाने के लिए।
कितनी आहुति: ठीक ५ आहुति (केवल शुद्ध गाय के घी की)।
कितनी आहुति: ठीक ५ आहुति (केवल शुद्ध गाय के घी की)।
मन्त्र (स्रोत: शतपथ ब्राह्मण):
१. ॐ प्राणाय स्वाहा, २. ॐ अपानाय स्वाहा, ३. ॐ व्यानाय स्वाहा, ४. ॐ उदानाय स्वाहा, ५. ॐ समानाय स्वाहा ॥
१. ॐ प्राणाय स्वाहा, २. ॐ अपानाय स्वाहा, ३. ॐ व्यानाय स्वाहा, ४. ॐ उदानाय स्वाहा, ५. ॐ समानाय स्वाहा ॥
५. अग्नि देव
क्यों देनी है: अग्नि ही यज्ञ के मुख्य संचालक हैं। वे स्वयं पूर्ण रूप से तृप्त होकर ही अन्य देवताओं तक हविष्य पहुँचाने का मार्ग सुलभ करते हैं।
कितनी आहुति: ३ या ५ आहुति।
कितनी आहुति: ३ या ५ आहुति।
मन्त्र (स्रोत: ऋग्वेद संहिता १.१.१):
॥ ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये इदं न मम ॥
॥ ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये इदं न मम ॥
६. इन्द्र देव
क्यों देनी है: इन्द्र ब्रह्मांड के प्रबंधन, वर्षा, वज्र (आत्मबल) और अन्न-जल के स्वामी हैं। प्रकृति के संतुलन के लिए इन्हें आहुति दी जाती है।
कितनी आहुति: १ या ३ आहुति।
कितनी आहुति: १ या ३ आहुति।
मन्त्र (स्रोत: सामवेद संहिता):
॥ ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय इदं न मम ॥
॥ ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय इदं न मम ॥
७. प्रजापति (ब्रह्मा जी)
क्यों देनी है: संपूर्ण जीव-जगत की उत्पत्ति के मूल आधार प्रजापति हैं। इस चराचर सृष्टि के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए।
कितनी आहुति: १ महा-आहुति (शुद्ध घी की)।
कितनी आहुति: १ महा-आहुति (शुद्ध घी की)।
मन्त्र (स्रोत: यजुर्वेद संहिता):
॥ ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये इदं न मम ॥
॥ ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये इदं न मम ॥
८. कुलदेवता एवं क्षेत्रपाल
क्यों देनी है: जिस भूमि या स्थान पर हम यज्ञ कर रहे हैं, उस भूमि के रक्षक (क्षेत्रपाल) और हमारे वंश की रक्षा करने वाले कुलदेवता की प्रसन्नता के लिए, ताकि पितृदोष शांत रहे।
कितनी आहुति: ३-३ आहुति।
कितनी आहुति: ३-३ आहुति।
मन्त्र (स्रोत: पारंपरिक पुराणोक्त विधान):
॥ ॐ कुलदेवताभ्यो स्वाहा, ॐ क्षेत्रपालाय स्वाहा ॥
॥ ॐ कुलदेवताभ्यो स्वाहा, ॐ क्षेत्रपालाय स्वाहा ॥
९. रुद्र (भगवान शिव - स्विष्टकृत आहुति)
क्यों देनी है: यज्ञ के दौरान यदि मन्त्र पाठ, उच्चारण या विधि में कोई अनजानी भूल-चूक हो गई हो, तो महाकाल रुद्र उस दोष को भस्म कर यज्ञ को पूर्णता प्रदान करते हैं। इसे शास्त्रों में 'स्विष्टकृत' आहुति कहते हैं।
कितनी आहुति: ठीक १ आहुति (यह आहुति हमेशा हवन कुंड या वेदी के उत्तर-पूर्व कोने अर्थात् ईशान कोण में दी जाती है)।
कितनी आहुति: ठीक १ आहुति (यह आहुति हमेशा हवन कुंड या वेदी के उत्तर-पूर्व कोने अर्थात् ईशान कोण में दी जाती है)।
मन्त्र (स्रोत: यजुर्वेद - रुद्र अष्टाध्यायी):
॥ ॐ रुद्राय स्विष्टकृते स्वाहा, इदं रुद्राय स्विष्टकृते इदं न मम ॥
॥ ॐ रुद्राय स्विष्टकृते स्वाहा, इदं रुद्राय स्विष्टकृते इदं न मम ॥
खण्ड ३: अनिवार्य सावधानियाँ (क्या ध्यान रखना है?)
मिट्टी की वेदी या कुंड पर यज्ञ संचालन करते समय इन तांत्रिक और वैज्ञानिक नियमों का कड़ाई से पालन करें:
- उंगलियों की मुद्रा (मृगी मुद्रा): आहुति देते समय हमेशा दाएँ हाथ के अंगूठे, मध्यमा (बीच की उंगली) और अनामिका (तीसरी उंगली) का ही उपयोग करें। अंगूठे के पास वाली तर्जनी उंगली (Index finger) का स्पर्श सामग्री से कभी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसे शास्त्रों में 'क्रोध और अहंकार' की उंगली माना गया है।
- शिखा दर्शन नियम: आहुति हमेशा कुंड या वेदी में जलती हुई तीव्र अग्नि की शिखा (लपटों) में ही डालनी चाहिए। केवल सुलगते हुए धुएँ या ठंडे कोयले पर सामग्री डालना वर्जित है; इससे 'धूम्र दोष' उत्पन्न होता है, जो साधक के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है।
- घृत नियम (घी की स्थिति): यज्ञ में उपयोग होने वाला गाय का घी पूरी तरह से पिघला हुआ और हल्का गुनगुना होना चाहिए। जमा हुआ या अत्यधिक ठंडा घी सीधे अग्नि में कभी न डालें, इससे अग्नि मंद पड़ जाती है।
॥ इति षोड़श अध्यायः सम्पूर्णः ॥

कोई टिप्पणी नहीं: