न्याय या सिर्फ तारीखें? एक बेबस पिता की चीख और व्यवस्था का सच | युगों का तराजू (खंड 3 — अध्याय 22)

 


महाकाव्य उपन्यास: युगों का तराजू

खंड ३: आधुनिक युग – कंक्रीट के जंगल, थाने और डिजिटल तंत्र
अध्याय २२: तारीखों की छांव में दम तोड़ती उम्मीद

✍️ लेखक: नरेन्द्र पंचारिया


अदालत के उस फैसले के बाद कि सब-इंस्पेक्टर त्रिलोक सिंह को अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा, शहर की फिजा में एक अजीब सा तनाव घुल गया था। आधुनिक युग की इन बड़ी अदालतों के गलियारों में न्याय की प्रक्रिया जितनी लंबी और कागजी होती है, एक पीड़ित के लिए वह उतना ही मानसिक और भावनात्मक कारागार बन जाती है।

अदालत से बाहर निकलते वक्त, सितंबर की उस दोपहर की चिलचिलाती धूप में, रमेश वहीं कचहरी के बाहर एक पुरानी सीमेंट की बेंच पर बेसुध सा बैठ गया। उसके हाथ में उसकी बेटी की वह पुरानी, धुंधली सी तस्वीर थी, जिसे वह बार-बार अपनी कमीज के कोने से पोंछ रहा था। उसकी आँखों से बहते आंसू अब थम चुके थे, लेकिन उसकी सूखी पलकों के पीछे जो दर्द था, वह किसी भी बड़े तूफान से ज्यादा भयानक था।

सुहानी अपने हाथ में फाइलों का बंडल थामे हुए रमेश के पास आई। उसने रमेश के कंधे पर अपना हाथ रखा, जिसका स्पर्श पाकर वह वृद्ध मजदूर भीतर तक टूट गया और फफक-फफक कर रो पड़ा।

रमेश (संत्रस्त और रुंधे गले से): "मैडम सा... भगवान के लिए मुझे इस अदालत के चक्करों से मुक्त कर दीजिए। रोज तारीख पर तारीख मिलती है, पुलिस वाले रास्ते में धमकाते हैं, और विधायक के आदमी घर के बाहर चक्कर काटते हैं। मेरी बेटी का क्या हुआ, वो जिंदा भी है या नहीं... मुझे कुछ नहीं पता! मुझे न्याय नहीं चाहिए, मुझे बस मेरी बेटी जिंदा लौटा दो!"

सुहानी (आंसुओं को रोकते हुए, दृढ़ स्वर में): "रमेश जी, ऐसा मत कहिए! अगर आज हम हार गए, तो प्राचीन काल की उस सुप्रिया और मध्यकाल की उस रेश्मा की हार का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। यह आधुनिक युग है... यहाँ फाइलें और तारीखें भले ही लंबी हों, लेकिन मैं आपकी इस लड़ाई को अपनी सांसों तक लड़ूँगी। अपनी हिम्मत मत टूटने दीजिए।"

किंतु उस सांत्वना के पीछे एक कड़वा और दर्दनाक सच भी था। उसी शाम, जब रमेश शहर से अपने उस सूने और उजाड़ घर की ओर लौट रहा था, तो रास्ते में एक सुनसान मोड़ पर दो अज्ञात मोटरसाइकिलों ने उसकी साइकिल को टक्कर मार दी। रमेश सड़क के किनारे जा गिरा, और उसके हाथ से उसकी बेटी की वह आखिरी तस्वीर छूटकर नाले के गंदे पानी में बह गई।

जब वह रात के अंधेरे में रोते-बिलखते अपने घर पहुँचा, तो उसने देखा कि उसके घर के बाहर एक धमकी भरा पर्चा चिपका हुआ था—"अगर अदालत में अगली तारीख पर मुंह खोला, तो तेरी इस बेटी की तरह तेरा पूरा परिवार भी इस दुनिया से गायब हो जाएगा।"

आधुनिक युग के उस कंक्रीट के जंगल में, जहाँ न्याय के मंदिर दूर से चमकते हैं, एक गरीब मजदूर के घर का वह सन्नाटा इस बात की चीख-चीखकर गवाही दे रहा था कि युग चाहे कोई भी बदल जाए—प्राचीन चौपाल हो, मध्यकाल की हवेली हो, या आज का यह आधुनिक थाना और कचहरी—ताकतवर और रसूखदारों के खौफ के आगे एक बेबस इंसान का दर्द हमेशा हवा में ही घुटकर रह जाता है।

रमेश ने अपने घर की उस टूटी हुई चौखट पर बैठकर आसमान की ओर देखा और फफकते हुए बस यही सोचा—“क्या इस दुनिया में कभी कोई ऐसा सवेरा आएगा, जो किसी गरीब के आंसुओं को पोंछ सके?”


✍️ लेखक का संदेश

"आधुनिक युग की विडंबना यह है कि यहाँ न्याय कागजों की मुहरों और तारीखों के अंतहीन जाल में उलझकर रह जाता है। रमेश जैसी विवशता और उसका यह दर्द इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कानून की किताबें कितनी भी मोटी क्यों न हों, जब तक समाज में गरीबों के प्रति संवेदना और व्यवस्था में भयमुक्त न्याय नहीं होगा, तब तक पीड़ितों की सिसकियां यूँ ही दीवारों से टकराती रहेंगी। यह अध्याय हमें अंदर तक झकझोर कर यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सचमुच न्याय केवल ताकतवरों की जागीर बनकर रह गया है?"

© 2026 नरेन्द्र पंचारिया. सर्वाधिकार सुरक्षित।

कोई टिप्पणी नहीं:

Blogger द्वारा संचालित.