उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र | Uttara Phalguni Nakshatra के रहस्य, सूर्य, अर्यमा देव, 27 पौराणिक कथाएँ, मंत्र, साधना, सत्य, संगठन और उपाय जानें।

नक्षत्र पुराण संहिता — अध्याय १२

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र

सत्य का पलंग और अर्यमा की संगठनात्मक चेतना

Uttara Phalguni Nakshatra | Surya • Aryaman • सत्य • मित्रता • संगठन • कर्तव्य

१. नक्षत्र का मूल परिचय

राशि चक्र में स्थिति:
२६° ४०' सिंह राशि से १०° ००' कन्या राशि तक (यह राशि चक्र का पंचम मुख्य संधिकाल है)।
नक्षत्र स्वामी (ग्रह):
सूर्य — प्रखंड आत्मा, अनुशासन और सत्ता का स्वामी।
अधिष्ठाता देव:
अर्यमा (Aryaman) — पितरों के राजा, समाज के नियमों, मित्रता और संधियों के देवता।
तत्व:
वायु/अग्नि संधिकाल — अत्यधिक व्यावहारिक, दृढ़ और परिणाम-उन्मुख।
वर्ण:
क्षत्रिय — न्याय, शासन और समाज के भरण-पोषण का सूचक।
प्रतीक चिह्न:
विश्राम का पलंग (चारपाई/Bed) के पिछले दो पाए, या शेर की पूंछ।
शारीरिक अंग चेतना:
होंठ, दांत, रीढ़ की हड्डी और पेट का दाहिना भाग।

२. कुण्डली में भूमिका तथा महत्वपूर्ण तथ्य

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र कालपुरुष की जन्मकुंडली का द्वादश श्वास और सामाजिक संगठन की शक्ति है। जब जातक की कुंडली में चंद्रमा या लग्न उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में होता है, तो जीव के भीतर 'अद्भुत नेतृत्व क्षमता', 'वफादारी', 'मित्रता निभाने का प्रचंड साहस' और 'व्यावहारिकता' जाग्रत होती है।

सूर्य और बुध का बुधादित्य संरेखण:
इसका प्रथम चरण सिंह राशि (स्वामी: सूर्य) में आता है, जो जातक को एक कड़ा शासक, राजा या उच्च अधिकारी बनाता है। शेष तीन चरण कन्या राशि (स्वामी: बुध) में आते हैं, जहाँ सूर्य और बुध मिलकर साक्षात् 'बुधादित्य राजयोग' का निर्माण करते हैं। यह जातक को गणित, कूटनीति, समाज कल्याण और व्यावहारिक व्यापार में सर्वोच्च निपुणता देता है।
पलंग के पिछले दो पाए का सिद्धांत:
पूर्वाफाल्गुनी का प्रतीक आगे का झूला (मस्ती) था, परन्तु उत्तराफाल्गुनी का प्रतीक 'पलंग के पिछले दो पाए' हैं, जो विवाह के बाद की 'स्थिरता, जिम्मेदारी और कर्तव्य' को दर्शाते हैं। यह जातक अपने परिवार और समाज की जिम्मेदारी उठाने से कभी पीछे नहीं हटता।
महत्वपूर्ण तथ्य:
ये जातक परम मित्र (Loyal Friend) होते हैं। यदि इन्होंने एक बार किसी का हाथ थाम लिया, तो मृत्यु पर्यन्त उसका साथ निभाते हैं। इन्हें राजनीति, समाजशास्त्र, अंतरराष्ट्रीय संधियों (IFS/Diplomat), मानव संसाधन प्रबंधन (HR Manager), और सरकारी कर विभागों में सर्वोच्च सफलता मिलती है।

३. वेद एवं पुराणों से उद्धृत २७ प्रामाणिक कथाएँ

कथा १: १२ आदित्यों में 'अर्यमा' देव का समाज-रक्षक रूप (विष्णु पुराण से)

देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न १२ आदित्यों में से 'अर्यमा' देव साक्षात् 'सत्य', 'नियम', 'मित्रता' और 'अंतरराष्ट्रीय संधियों' के देवता बने। ब्रह्मा जी ने उन्हें समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य सौंपा। अर्यमा देव ही यह तय करते हैं कि समाज के नियम कैसे चलेंगे, विवाह की संस्था कैसे सुरक्षित रहेगी और दो राजाओं के बीच मित्रता कैसे बनी रहेगी। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र इसी अर्यमा देव की व्यावहारिक और दृढ़ चेतना का साक्षात् प्रतीक है।

कथा २: अर्यमा देव का पितरों का राजा बनना और श्राद्ध का नियम (भागवत पुराण से)

जब यमराज व्यस्त होते हैं, तो अर्यमा देव ही पितृलोक का कार्य संभालते हैं। वे पितरों के प्रधान राजा हैं। पुराणों के अनुसार, जब कोई मनुष्य पृथ्वी पर अपने मित्रों या समाज की मदद करता है, तो अर्यमा देव साक्षात् प्रसन्न होकर उसके पितरों को मुक्त कर देते हैं। यह कथा सिद्ध करती है कि उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का जातक अपने कर्मों से न केवल जीवित समाज का बल्कि अपने मृत पूर्वजों का भी तारणहार बनता है।

कथा ३: महादानी कर्ण और दुर्योधन की अमर मित्रता की कथा (महाभारत से)

सूर्य पुत्र 'कर्ण' की कुंडली में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का प्रचंड प्रभाव था। जब रंगशाला में कृपाचार्य ने कर्ण के कुल पर सवाल उठाया, तो दुर्योधन ने आगे बढ़कर कर्ण को अङ्ग देश का राजा बनाया। कर्ण ने दुर्योधन की इस मित्रता को निभाने के लिए अपने प्राणों की बाहें फैला दीं। उन्होंने जानते हुए भी कि पाण्डव उनके सगे भाई हैं और श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान हैं, दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ा। यह वफादारी (Loyalty) उत्तराफाल्गुनी की पराकाष्ठा है।

कथा ४: श्रीराम और सुग्रीव की अग्नि-साक्षी मित्रता (वाल्मीकि रामायण से)

ऋष्यमूक पर्वत पर जब हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव की भेंट कराई, तो दोनों ने अग्नि जलाकर उसके फेरे लिए और एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देने का वचन दिया (संधि की)। श्रीराम ने बाली का वध कर सुग्रीव को सिंहासन दिलाया और सुग्रीव ने अपनी पूरी वानर सेना लंका विजय में झोंक दी। यह 'अर्यमा देव के नियमों के अनुसार निभाई गई आदर्श मित्रता' की कथा है।

कथा ५: ऋग्वेद की 'अर्यमा सूक्त' चेतना और विवाह के मन्त्र (ऋग्वेद से)

ऋग्वेद के दसवें मण्डल के विवाह सूक्त में अर्यमा देव का विशेष मन्त्र है। विवाह के समय कन्या जब लाजा-होम (धान की खील की आहुति) देती है, तो वह कहती है— "अर्यमणं देवं कन्या यजति..." — अर्थात यह कन्या अर्यमा देव की पूजा करती है ताकि वे इसके पति के कुल में इसे स्थिरता और अखंड सौभाग्य प्रदान करें। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र वैवाहिक जीवन की इसी स्थिरता का सूचक है।

कथा ६: समुद्र मंथन से 'उच्चैःश्रवा' घोड़े का सूर्य देव को सारथ्य हेतु मिलना (पद्म पुराण से)

मंथन से निकले दिव्य उच्चैःश्रवा घोड़े की लगाम जब देवराज इन्द्र ने सूर्य देव को सौंपी, तो सूर्य देव ने उसे अपने रथ में जोता। उस घोड़े का अनुशासन और गति साक्षात् उत्तराफाल्गुनी की व्यावहारिक ऊर्जा है, जो कभी अपने मार्ग से भटकती नहीं है और समय पर लक्ष्य तक पहुँचती है।

कथा ७: इंद्र का राजा मरुत्त के यज्ञ में जाकर नियमों की रक्षा करना (शतपथ ब्राह्मण से)

राजा मरुत्त ने एक ऐसा विशाल यज्ञ किया जहाँ सोने के बर्तन थे। इन्द्र और देवगुरु बृहस्पति नियमों के उल्लंघन के भय से वहाँ नहीं जा रहे थे। तब अर्यमा देव ने मध्यस्थता की, यज्ञ के नियमों को सुधारा और देवताओं को उनका भाग दिलाया। यह 'कानूनी और सामाजिक विवादों को सुलझाने' के उत्तराफाल्गुनी स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा ८: श्रीकृष्ण और अर्जुन का खाण्डव वन में अग्निदेव की सहायता का समझौता (महाभारत से)

जब अग्निदेव ने खाण्डव वन दहन के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन से सहायता मांगी, तो दोनों वीरों ने एक व्यावहारिक संधि (Agreement) की। अर्जुन ने बाणों का छाता बनाया और श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र संभाला। इस संगठनात्मक कार्य से प्रसन्न होकर ही अग्निदेव ने अर्जुन को गांडीव दिया था। यह टीम-वर्क (Team Work) उत्तराफाल्गुनी का ही गुण है।

कथा ९: राजा जनक द्वारा चारों भाइयों का सामूहिक विवाह (रामायण से)

जनकपुर में राजा जनक ने रघुकुल के चारों राजकुमारों का विवाह अपनी चार पुत्रियों (सीता, उर्मिला, माण्डवी, श्रुतकीर्ति) के साथ एक ही मण्डप में नियमों के अनुसार कराया। वह विवाह साक्षात् उत्तराफाल्गुनी की उस 'पारिवारिक और सामाजिक सुदृढ़ता' (Family Bond) का आख्यान है जो दो महान कुलों को हमेशा के लिए एक कर देती है।

कथा १०: उपनिषदों का 'मित्र-वरुण' चेतना रहस्य (श्वेताश्वतरोपनिषद से)

उपनिषद कहते हैं कि मनुष्य के भीतर दो शक्तियाँ हैं—वरुण (जो भीतर की शुद्धि है) और मित्र/अर्यमा (जो बाहर के समाज के साथ संबंध है)। जब ये दोनों संतुलित होते हैं, तभी साधक का 'हृदय चक्र' जागृत होता है। उत्तराफाल्गुनी इसी हृदय चक्र की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।

कथा ११: कार्तिकेय का देवसेनापत्य ग्रहण कर देवताओं से वफादारी की शपथ लेना (स्कन्द पुराण से)

जब कार्तिकेय महा-सेनापति बने, तो उन्होंने ब्रह्मा जी के सम्मुख देवसभा के प्रति पूर्ण निष्ठा और वफादारी की शपथ (Oath) ली। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जब तक मेरे शरीर में रक्त की एक भी बूंद है, मैं देवलोक के नियमों की रक्षा करूँगा। यह कर्तव्यनिष्ठा उत्तराफाल्गुनी को प्रकट करती है।

कथा १२: शिव का 'त्रिपुरांतक' रूप और रथ के पहियों का संगठन (शिव महापुराण से)

त्रिपुरदाह के समय भगवान शिव ने पूरी प्रकृति को एक रथ में संगठित किया था— सूर्य और चन्द्रमा पहिए बने, वेदों के मन्त्र धनुष बने। इस विशाल संगठन (Management) के बल पर ही एक क्षण में असुरों का नाश हुआ। यह कथा दर्शाती है कि उत्तराफाल्गुनी जातक एक बहुत बड़ा मैनेजर (Organizer) होता है।

कथा १३: ध्रुव का राजा बनकर प्रजा के भरण-पोषण के नियम बनाना (विष्णु पुराण से)

जब ध्रुव सम्राट बने, तो उन्होंने कर (Tax) के नियमों को अत्यंत व्यावहारिक बनाया ताकि कोई गरीब दुखी न हो और राजकोष भी भरा रहे। उन्होंने अनाथाश्रमों और अन्न भंडारों की स्थापना की। यह उत्तराफाल्गुनी के 'प्रजा-पालक' (Social Welfare) स्वभाव को दर्शाता है।

कथा १४: श्रीकृष्ण का राजा मुचुकुन्द को जगाकर कालयवन का वध कराना (भागवत पुराण से)

जब कालयवन श्रीकृष्ण के पीछे भागा, तो श्रीकृष्ण चालाकी से उसे उस गुफा में ले गए जहाँ त्रेतायुग के प्रतापी राजा मुचुकुन्द सो रहे थे। कालयवन ने मुचुकुन्द को लात मारी। मुचुकुन्द ने जैसे ही आँखें खोलीं, उनके नेत्रों की अग्नि से कालयवन जलकर राख हो गया। मुचुकुन्द की यह 'सुप्त न्याय-शक्ति' उत्तराफाल्गुनी चेतना है।

कथा १५: गुरु वशिष्ठ द्वारा दशरथ को 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' की व्यावहारिक विधि बताना (रामायण से)

जब राजा दशरथ संतानहीनता के दुख में डूबे थे, तो गुरु वशिष्ठ ने सीधे यज्ञ न करके ऋष्यशृङ्ग मुनि को बुलाने की व्यावहारिक योजना बनाई, जिनके पैर पड़ते ही मरुभूमि में भी बारिश हो जाती थी। मुनि के आने पर यज्ञ सफल हुआ। यह व्यावहारिक बुद्धि (Pragmatism) उत्तराफाल्गुनी का ही रूप है।

कथा १६: शकुंतला का राजा दुष्यंत के दरबार में अपने अधिकारों के लिए शास्त्रार्थ (महाभारत से)

जब दुष्यंत शाप के कारण शकुंतला को भूल गए और उसे स्वीकार करने से मना कर दिया, तो शकुंतला रोई नहीं। वह राजा के दरबार में तनकर खड़ी हुई और उसने धर्म, नीति और पति के कर्तव्यों पर ऐसा ऐतिहासिक भाषण (शास्त्रार्थ) दिया कि पूरी राजसभा दंग रह गई। यह उत्तराफाल्गुनी की स्त्री के 'आत्मसम्मान और न्याय की लड़ाई' को प्रकट करता है।

कथा १७: समुद्र मंथन से कल्पवृक्ष का नन्दन वन में संगठन हेतु जाना (विष्णु पुराण से)

मंथन से निकले कल्पवृक्ष को जब इन्द्र ने स्वर्ग में लगाया, तो उन्होंने उसके चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाया और उसके उपयोग के नियम तय किए ताकि कोई उसका दुरुपयोग न कर सके। यह 'संसाधनों के प्रबंधन' (Resource Management) की उत्तराफाल्गुनी शक्ति है।

कथा १८: राधारानी का चंद्रावली के साथ प्रेम का व्यावहारिक समन्वय (ब्रह्मवैवर्त पुराण से)

वृन्दानव में जब श्रीकृष्ण की दूसरी परम भक्त चंद्रावली के कारण गोपियों में विवाद हुआ, तो राधारानी ने अत्यधिक ईर्ष्या दिखाने के बजाय एक सम्राज्ञी की तरह व्यवहार किया और चंद्रावली के प्रेम को भी सम्मान दिया। यह कूटनीतिक और व्यावहारिक परिपक्वता (Maturity) को दर्शाता है।

कथा १९: राजा भरत का अपने नौ पुत्रों को अयोग्य मानकर 'भूमिन्यु' को राजा बनाना (महाभारत से)

सम्राट भरत के नौ पुत्र थे, परन्तु वे सभी राजपाठ के अयोग्य और विलासी थे। भरत ने वंशवाद (Nepotism) को लात मारकर अपने सगे पुत्रों को राजा नहीं बनाया, बल्कि भरद्वाज ऋषि के आशीर्वाद से प्राप्त एक योग्य पात्र 'भूमिन्यु' को अपना उत्तराधिकारी चुना। यह 'न्याय के लिए परिवारवाद से ऊपर उठने' की उत्तराफाल्गुनी पराकाष्ठा है।

कथा २०: गौतम बुद्ध का संघ (Organization) का निर्माण करना और नियम बनाना (बौद्ध ग्रन्थों से)

ज्ञान पाने के बाद बुद्ध अकेले नहीं रहे। उन्होंने 'भिक्षु संघ' का निर्माण किया। उन्होंने संघ के भीतर अनुशासन, भिक्षाटन और रहने के कड़े व्यावहारिक नियम (विनय पिटक) बनाए, जिसके बल पर बौद्ध धर्म पूरी दुनिया में फैला। यह संगठनात्मक मेधा उत्तराफाल्गुनी की ही चेतना है।

कथा २१: ब्रह्मा जी द्वारा समाज को चार वर्णों में विभाजित करने का सत्य नियम (शतपथ ब्राह्मण से)

ब्रह्मांड के सुचारू संचालन के लिए ब्रह्मा जी ने कर्म के आधार पर समाज का विभाजन किया ताकि हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझे। उन्होंने उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र को इस सामाजिक ताने-बाने (Social Engineering) का मुख्य केंद्र बनाया।

कथा २२: समुद्र मंथन से धन्वन्तरि के साथ 'जड़ी-बूटियों' का वर्गीकरण (वरहा पुराण से)

जब धन्वन्तरि अमृत लेकर आए, तो उनके साथ पृथ्वी की समस्त जड़ी-बूटियाँ भी जाग्रत हुईं। अर्यमा देव ने उन औषधियों का वर्गीकरण (Classification) किया कि कौन सी दवा किस रोग में काम आएगी। यह जातक की 'एनालिटिकल बुद्धि' (Analytical Mind) को दर्शाता है।

कथा २३: गुरु वशिष्ठ द्वारा भरत को दशरथ की मृत्यु के बाद राजधर्म समझाना (रामायण से)

जब दशरथ की मृत्यु हुई और श्रीराम वन चले गए, तो भरत घोर शोक में डूब गए और रोने लगे। तब गुरु वशिष्ठ ने उन्हें बांहों से उठाया और कहा, "भरत! रोने का समय नहीं है। राजा के बिना राज्य नष्ट हो जाएगा, उठो और प्रजा की रक्षा का अपना पैतृक कर्तव्य संभालो।" यह उत्तराफाल्गुनी के 'शोक के समय भी कर्तव्य न भूलने' के स्वभाव को सिद्ध करता है।

कथा २४: अर्जुन और श्रीकृष्ण की गीता के बाद कुरुक्षेत्र में सैन्य व्यूह रचना (महाभारत से)

गीता का ज्ञान सुनने के बाद जब अर्जुन का भ्रम दूर हुआ, तो उन्होंने व्यावहारिक रूप से युद्ध संभाला। उन्होंने धृष्टद्युम्न के साथ मिलकर कौरवों के खिलाफ रोज नए-नए अभेद्य सैन्य व्यूह (क्रौंच व्यूह, मकर व्यूह) बनाए। यह कूटनीतिक और सैन्य संगठन उत्तराफाल्गुनी की कन्या राशि की बुद्धि को प्रकट करता है।

कथा २५: सूफी मत का 'अहद' (वचन/करार) और उपनिषदों का सत्यमेव जयते सूत्र (मुण्डकोपनिषद से)

मुण्डक उपनिषद का अमर सूत्र है—'सत्यमेव जयते' (सत्य की ही विजय होती है)। सूफी मत में 'अहद' का अर्थ है खुदा से किया गया वह वादा जिसे आत्मा कभी नहीं तोड़ती। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र इसी वचनबद्धता और सत्य का साक्षात् रक्षक है।

कथा २६: शेर की पूंछ का उसकी दौड़ के समय संतुलन बनाना (पशु-विज्ञान मत)

एक सिंह जब अपने शिकार के पीछे बिजली की गति से दौड़ता है, तो उसकी पूंछ (Tail) हवा में मुड़कर उसके पूरे भारी शरीर को संतुलन (Balance) प्रदान करती है, जिससे वह फिसलता नहीं है। यह कथा जातक को सिखाती है कि 'व्यावहारिक संतुलन' ही तुम्हारी सफलता का मूल आधार है।

कथा २७: अर्यमा देव का परम सत्य-चेतना में महा-विलीनीकरण (ब्रह्म सूत्र से)

महाप्रलय के समय, समाज और नियमों के देवता अर्यमा ब्रह्मांड की समस्त संधियों, वफादारियों और सामाजिक कड़ियों को समेटकर साक्षात् 'परम सत्य महा-ब्रह्म' में विलीन हो जाते हैं। वहाँ न कोई समाज रहता है, न कोई नियम। केवल एक अखंड, निर्गुण सत्य शेष रहता है। यह उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र की अंतिम मोक्ष परिणति है।

४. नक्षत्र के मूल मन्त्र तथा विधि

वैदिक मन्त्र

ओम् दैव्या व्वध्वर्यू चगतमगुं रथेन सूर्यत्वचा। मध्वा यज्ञगुं समञ्जायन्ता तं प्रत्नथा यं वेधस्वतः॥

पौराणिक मन्त्र

ओम् उत्तराफाल्गुन्याधिपतिं अर्यमाणं देवं नियमरक्षकम्। नेतृत्व-मित्रता-सिद्धिप्रदं देवं नमो नित्यं सूर्यपुत्रस्वरूपिणम्॥

तन्त्र बीज मन्त्र

ओम् टं उत्तराफाल्गुनीनक्षत्राभ्यां नमः॥ या ओम् अं सूर्याय नमः॥

विधि

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र वाले दिन रविवार को प्रातः काल सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में शुद्ध जल लेकर उसमें कुंकुम, अक्षत और लाल फूल मिलाकर सूर्य नारायण को अर्घ्य दें। लाल ऊन के आसन पर बैठकर माणिक्य या रुद्राक्ष की माला से तन्त्र मन्त्र का १०८ बार जाप करें।

५. व्यक्ति अपना जीवन कैसे बदले (नरेन्द्र पंचारिया चेतना मार्ग)

अत्यधिक वफादारी में अंधापन छोड़ें

यदि Blind Loyalty आपको गलत दिशा में ले जाए तो सावधान रहें। कर्ण की तरह गलत लोगों या अधर्मियों का साथ केवल 'मित्रता' के नाम पर निभाना आपके पतन का कारण बन सकता है। वफादारी से पहले हमेशा 'धर्म और सत्य' की कसौटी पर सामने वाले को परखें।

कन्या राशि के संकोच को दूर करें

जब आपका नक्षत्र कन्या राशि (बुध) में जाता है, तो आपके भीतर अत्यधिक मीन-मेख निकालने (Over-analytical) और छोटी-छोटी कमियों पर काम रोकने की आदत आ जाती है। परफेक्शन (Perfection) के चक्कर में बड़े अवसरों को हाथ से न जाने दें।

हृदय को विश्राम दें

पलंग के पिछले दो पाए के प्रतीक के कारण आप समाज और परिवार का इतना बोझ उठा लेते हैं कि मानसिक रूप से थक जाते हैं। प्रतिदिन ५ मिनट मौन ध्यान करें।

६. महा-उपाय: कौन कैसे नक्षत्र बना

इतिहास

जब अर्यमा देव ने श्रीराम और सुग्रीव की अग्नि-साक्षी संधि कराकर लंका विजय और रामराज्य की आधारशिला रखी, तब ब्रह्मा जी ने सिंह और कन्या राशि के संधिकाल पर सूर्य के प्रचंड तेज को व्यावहारिक बुद्धि में पिरोकर 'उत्तराफाल्गुनी' (चमकता हुआ तारा/Denebola) नक्षत्र की स्थापना की और इसका अधिकार अर्यमा देव को सौंपा।

अचूक उपाय

१. वनस्पति उपाय

इसका पूज्य वृक्ष 'पाकड़' (Plaksha - फाइकस प्रजाति का विशाल वृक्ष) है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के दिन पाकड़ के वृक्ष की सेवा करें या जल चढ़ाएं। रविवार को इसके वृक्ष के नीचे बैठकर मन्त्र जप करना साक्षात् सूर्य देव की कृपा दिलाता है।

२. तांबे का महा-उपाय

इस नक्षत्र के दिन अपने गले में तांबे का एक चौकोर सिक्का (Copper Square Coin) लाल धागे में पहनें। यह आपके आत्मविश्वास (सूर्य) और व्यापारिक कूटनीति (बुध) को जाग्रत कर देगा।

३. मित्र सेवा

अपने किसी सच्चे मित्र को रविवार के दिन कोई उपयोगी उपहार (जैसे घड़ी या पुस्तक) देना आपके उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के समस्त दोषों को साक्षात् राजयोग में बदल देता है।

नक्षत्र पुराण संहिता — अध्याय १२
उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र • अर्यमा चेतना • सत्य • संगठन • मित्रता • कर्तव्य
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